वो सांवली लड़की
वो सांवली लड़की
वो 15-16 साल की सांवली सी, साधारण सी दिखने वाली लड़की थी। पोशाक से ही गरीबी झलक रही थी, फटे हुए कपड़ों की तरह। झोपड़ पट्टी वालों के लिए, वह मुफ्त के मनोरंजन का साधन थी। जैसे गरीब की जोरू,गाँव की भौजाई। कुछ इसी तरह।
छोटे बड़े, स्त्री पुरुष कुछ भी, कभी भी उसे बोल जाते थे, किन्तु वह किसी की बात का बुरा नहीं मानती थी। बस सुनकर मुस्कुरा देती थी किन्तु उसकी आंखों में चमक भी उतनी ही बढ़ जाती थी, जितने कड़वे और मर्यादाहीन शब्द वह सुनती थी। उन आंखों में सुनहरे ख्वाब थे, अपने भाई के लिए, उसके उज्जवल भविष्य के लिए।
वह दवाई दुकान में आकर चुपके से खड़ी होकर,अपनी बारी का इंतजार करने लगी। दुकान में भीड़ लगी थी। भीड़ छंटने के बाद, उसने दुकान की संचालिका से कहा, "मेरी माँ, दो दिनों से बुखार में तप रही है मैडम। उसके लिए गोलियां दीजिये ताकि वह जल्दी सुधर जाये।"
दवाई दुकान की संचालिका को आश्चर्य होता है कि बिना डाक्टर की लिखित पर्ची के कोई, दवा कैसे मांग सकता है। परंतु लड़की को देखते ही वह समझ गयी कि लड़की अशिक्षित है। उसने कहा "अरे डाक्टर को क्यों नहीं दिखाया ? बिना डाक्टर की पर्ची के, किसी को दवा नहीं दी जा सकती है।"
उस लड़की ने अपनी स्थिति स्पष्ट की और कहा "मैडम हम लोग गरीब हैं। डाक्टर के पास जाने और उसकी फीस देने के लिए हमारे पास पैसे नहीं है। मेरी माँ जिस घर में चौके बरतन का काम करती है, वहां की मालकिन ने कहा है कि कल काम पर नहीं आई तो तेरा काम हमेशा के लिए बंद। मैडम मेरा एक छोटा भाई है। मैं भी कुछ घरों में चौंका बर्तन करती हूँ, हमारा बाप दारू पी पीकर खांसते हुए मर गया। उसने हमें पैदा करके छोड़ दिया। मैं और मेरी माँ का एक ही सपना है कि भाई को पढ़ाना है। आजकल बिना पैसे के कहाँ पढ़ाई होती है ? और पैसा कमाने के लिए काम करना पड़ता है।"
"मैडम आप भी तो डाक्टर हो। मां की दवा देकर हम पर एहसान करो। मैं कल आपके पैसे दे दूंगी। गरीब पर भी कभी भरोसा करके तो देखो ?"
दुकानदार को लड़की की बात और उसकी मजबूरी पर दया आ गयी। मैडम ने उस सांवली लड़की से कहा "तुम कहाँ रहती हो।"
उसने कहा "मैडम जी, वो जो सामने झोपड़ पट्टी दिख रही है ना, वहीं रहती हूँ।"
मैडम ने सोचा झोपड़ी, वह भी स्लम एरिया में ? वह तो बदबू, गंदगी से भरी होती है, वहां जाऊं या ना जाऊं ? मैं वहां गयी तो मुझे संक्रमण भी हो सकता है।
मैडम को लगा, लड़की की सहायता करनी होगी। यह उसका मानवीय धर्म है। मैडम ने दुकान के नौकर से कहा, "मैं सामने से कुछ समय में आ रही हूँ। ग्राहक आयें तो दवाइयां देना, ना समझ आये तो उन्हें रूकने बोलना।"
मैडम लड़की के साथ झोपड़ पट्टी की तरफ चलने लगी। बदबू और गंदगी देख नाक में रूमाल रख लिया। उन्हें ऐसा करते देख लड़की की व्यंगात्मक मुस्कान निकल पड़ी। बोली "देखिए मैडम हमारा जीवन ? हम यहां चौबीसों घंटे, बारहों महीने इसी हालात में रहते हैं ? बारिश के मौसम में तो हमें नर्क सा जीवन जीना पड़ता है।"
सुनकर मैडम का चेहरा करूणा, दया से ओतप्रोत हो उठा। तभी लड़की की झोपड़ी आयी और अंदर प्रवेश किया तो मैडम की आत्मा कांप गयी। एक 30_32 वर्ष की कृशकाय महिला लगभग 103 डिग्री बुखार से तप रही थी।
मैडम ने अपने अनुभव से उसे चैक किया और लड़की के साथ अपनी दुकान आ गयी। एकाएक उसे याद आया और बोली "तुम कह रहीं थीं कि तुम्हारा भाई भी है, वह तो नहीं दिखा।" उस सांवली लड़की ने जवाब दिया "मैडम जी उसे सुबह ही तैयार कर स्कूल के लिए भिजवाया है। "मैडम ने कहा "शाबाश तुम अपने भाई को पढ़ाकर अच्छा काम कर रही हो।"
मैडम ने दुकान से, लड़की की मां के लिए उपयुक्त दवाइयां दी। समझा दिया कि किस तरह देनी है। साथ ही अपने साथ फल भी पूरे के पूरे दे दिये। लड़की से कहा, "कुछ खाने के बाद ही दवाइयां देना। शाम तक तुम्हारी माँ ठीक हो जायेगी।"
दूसरे दिन प्रातः दुकान खोलते ही उन्हें वही लड़की दिखी। उसके साथ छोटा लड़का भी था। लड़की ने कहा, "मैडम जी आपकी दवा से मां सुधर गयी है। आपने हम पर कृपा की है। मैं अपने काम पर जा रही हूँ। अपने भाई को भी साथ ले जा रही हूँ। आज इसकी छुट्टी है। कोई नेता मर गया है। नेता के मरने से इसकी आज की पढ़ाई बर्बाद हो गयी है ? आपकी दवाईयों के कितने पैसे देने हैं।"
मैडम "बिटिया अपने भाई को अच्छा पढ़ाओ, बड़ा आदमी बनाओ, पैसे रहने दो। अभी तुम्हें पैसों की जरूरत है, मेरी सहायता की जब भी जरूरत पड़ेगी, बोल देना।" और वह सांवली सी लड़की अपने काम पर चली गयी।
