विवशता
विवशता
दूर से सफेद धोती में आते देखकर लक्ष्मी को समझते देर नहीं लगी कि रामधन आ रहें हैं, लेकिन आज उनके चाल में वह तेजी नहीं दिखाई दे रही थी वह झूमता हुआ आ रहा था। लक्ष्मी आश्चर्य से उन्हें निहार रही थी धीमी चाल को देखकर मन में न जाने कितनी बातें गोते खा रहे थे। मन डूबता जा रहा था और मन को दिलासा भी दिला रही थी कि शायद यह असर जेठ की गर्मी का है जो झुलसा दिया है। तब तक रामधन द्वार पर गड़े चापाकल के पास आ गए थे अपने गमछे से उन्होंने कुर्ते की धूल को झाड़ा फिर पैर हाथ धोने लगे।
लक्ष्मी को यूँ निहारते देख अपने आप को संभालते हुए बोले "क्यों लक्ष्मी आज बड़े प्यार से देखा जा रहा है बड़ी देर से तुम्हारी नज़रे फूल बरसा रही हैं।" लक्ष्मी शर्माते हुए बोली "चुप करो जी बच्चे घर में हैं आप स्नान कर लीजिए मैं चाय बनाती हूँ।" रामधन सिर हिलाते हुए बोला "नहीं नहीं लक्ष्मी आज चाय रहने दो रास्ते में सुखीराम ने रोक कर चाय पिला दी थी। लक्ष्मी मुँह बनाते हुए बोली "वो इसलिए आज इतनी देर हो गई इतना मस्का भी लगाया जा रहा था हाँ –हाँ मैं तो गाय भैंसी हूँ मेरी तो इच्छाएँ हीं नहीं हैं कि साथ में दो घूँट चाय भी नसीब हो।" अभी भी रामधन के मुख पर मुस्कान था लेकिन माथे पर लकीरें उभरी हुई दिख रही थी वह कुछ देर चारपाई पर बैठा फिर स्नानघर की ओर चल दिया।
लक्ष्मी मन हीं मन बुदबुदाई क्या परेशानी है राम जाने तभी से कितनी बातें बोल दी लेकिन एक बात न निकली है लक्ष्मी हाथ जोड़कर "हे प्रभु रक्षा करना मेरे परिवार की", लक्ष्मी खाना बनाने रसोईघर चली गई लेकिन आज मन बार –बार पति [रामधन ]के मन में चल रहे चिन्ता की ओर जा रहा था इस कारण उसके हाथ भी जल गए सुनैना [बड़ी बेटी ]यह बहुत देर से देख रही थी लेकिन पूछने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी, बाहर बच्चों की कोलाहल सुनकर माँ [लक्ष्मी ]ने कहा "देख सुनैना बाबूजी और भाई- बहन को खाना दे दे और तू भी खा ले। " सुनैना ने कहा "और तू नही खाएगी माँ।" [लक्ष्मी] सिर हिलाकर कह दिया "आज भूख नहीं है।"
सबके खाना खाने के बाद वह रामधन से बोली "बच्चे सो गए हैं अब तो बताओ क्या बात है शाम से देख रही हूँ कोई बात है जो तुम्हें अंदर हीं अंदर खाए जा रही है मुझे भी तो कहो जो तुम्हारा दर्द आधा हो।" रामधन बोला "देखो लक्ष्मी घबराना नहीं लेकिन सुनैना के ससुराल वालों ने बांकी के रूपये मंगवाए हैं। सगुन के बाद तो यही बात हुई थी कि बाकी के रूपये छह महीने में दे दूँगा लेकिन अभी कहाँ से संभव है" लक्ष्मी बोली "फसल भी अभी पकी नहीं है जो बेचकर कुछ देकर अभी बात सम्भल जाए।" रामधन बोले "नहीं पगली उन्हें सारा रूपये कुछ दिनों में चाहिए खरीदारी करनी है।"
लक्ष्मी ने सिर पकड़ लिया "हे भगवान क्या होगा रामधन ने कहा इसलिए तो आज सुखीराम से मिलने गया था आखिर विवाह ठीक करने से लेकर सगुन देने तक वह भी तो था बात करने से बात निकलती है देखो कल कुछ न कुछ उपाय निकल जाएगा। "
रात तो निकल गई लेकिन आँखों में नींद कहाँ शांत तन विचलित मन के साथ सुबह का इंतजार सुबह होते हीं लक्ष्मी ने कहा सुनो क्या अपनी ज़मीन को बैंक में लगाकर रुपया का इंतज़ाम हो जाएगा और समस्या का निदान हो जाएगा। रामधन सारे कागज़ लेकर बैंक पहुंच गए, घंटे निकल गए लेकिन मैनेजर से भेंट नहीं हो सकी वह उदास मन से लौट आए। घर में कदम रखते ही लक्ष्मी पूछ बैठी "क्या कोई बात बनी कुछ बोलते क्यों नहीं झुंझलाये रामनाथ ने कहा - "कोई एक गिलास पानी के लिए भी पूछेगा गला प्यास से सूखा जा रहा है" फिर अब तो बैंक की चक्कर और घर पर ज़मीन के ख़रीदार के मेले दस दाम तो दो लगाने वालों का ताँता जो दस का सात –आठ लगा जाता। उस दिन चेहरे पर और घर में थोड़ा चैन मिलता लेकिन दिए गए समय पर वह ख़रीदार नहीं आता उन्हें तो वही दो देने वाले यह कह कर रास्ते से हटा देते थे कि यह ज़मीन में कागजी लफड़ा है अब यह रोज़ का काम अब धीरे- धीरे सिर दर्द और सुनैना के ससुराल के द्वारा दी गई समय अवधि अब समय को पार कर रही थी। लक्ष्मी घर के पीछे जाकर आँसू बहाकर आंचल से पोछते हुए ऊपर ईश्वर को कह बैठती "हे भगवान मेरे ही साथ ऐसा क्यों अब लाज बचा लो।" फिर मुस्कुराते हुए बच्चों के बीच सामान्य व्यवहार करके यह जताती थी मानो कुछ हुआ ही नहीं।
एक दिन गाँव की कुछ औरतें घूमने के बहाने से आकर बैठी "अरे सुनैना तेरी माँ नहीं दिख रही है कहाँ है।" सुनैना ने कहा - "माँ की तबियत खराब थी डाक्टर से दिखाने गई है" औरतों के बीच फुसफुसाहट को सुनैना भांप गई सुमति चाची ने कहा- "क्या करेगी बेचारी अब बेटी को पैदा करना भी पाप है पन्द्रह दिन से दोनों जिन्दा होकर मर रहे हैं। " यह सुनकर सुनैना और सभी बच्चों के कान खड़े हो गए इसी बीच फूली चाची ने कहा- "आह ! बहुत दुख ने डेरा डाल दिए है।" सभी औरतें तो चली गई लेकिन जिस दुख को माँ –बाप अपने बच्चों को नहीं देना चाहते थे वही बीज आज बच्चों के मन को आहत कर रहे थे, सुनैना माँ के आते ही अपनी भावनाओं को रोक नहीं सकी और रोते हुए बोली "जो आप दोनों को इतनी तकलीफ़ दे वह खुशी मुझे नहीं चाहिए।" लक्ष्मी रामधन की ओर देखते हुए कहा "अरे पगली क्या हुआ।" ऋतु[छोटी बेटी ] ने "आज सुमति चाची और सभी बात कर रहे थे हमलोगों ने सुना माँ।" लक्ष्मी ने जोर से कहा "अरे कुछ ऐसा नहीं है बेटी की शादी में तो थोड़ी परेशानी होती है जा रानी [ देवर की बेटी ] पानी ले आ।" माँ ने कहा -"सुनैना चाय नहीं पिलाएगी बेटा थक गई हूँ लम्बी पंक्ति में खड़े –खड़े बैंक में" सुनैना ने कहा "बैंक रामनाथ ने कहा तुम्हारी माँ भी थकान के कारण कुछ भी बोलती है" ऋतु ने कहा "माँ वहाँ बेंच नहीं थी हाँ हाँ थी मेरी माँ।"
अब दोनों ने सोच लिया कि अब ज़मीन का जो दाम दे बेच देंगे इस परिस्थिति से निपटने का यही उपाय है। रामधन ने कहा "आज सोने बैंक में लगाकर जो पैसे आए हैं वह अच्छे से रख दो और कल ज़मीन का जो रूपये देंगे मैं बेचकर समस्या का अंत कर दूँगा।" सुनैना यह बात सुनकर बहुत रोई और माँ –बाप, भाई -बहन के भविष्य सोचकर उसने मन ही मन प्रण किया मैं यह शादी नहीं करूंगी। सुबह होने पर अपना फैसला माँ -बाप को सुनाई। पिता ने हाथ जोड़ लिए "मुझे लज्जित नहीं करो बेटी एक लाचार पिता को कर्तव्य पूरा करने दो," आज पिता के गमछे के हर छेद दिख रहे हैं। सुनैना पिता के चरण पर गिर गई और बोली "नहीं पिता जी आपने एक बेटे जैसा जीवन, पढ़ाई –लिखाई करवाई अब मैं आपको भिखारी नहीं बना सकती हूँ। अगर जिसे मुझसे शादी करनी होगी वह मेरे साथ मेरे माँ –बाप की परेशानी को समझेगा। मुझे कोई दुख नहीं है। "
"आप अपनी परेशानी उन लोगों से कहलवा दीजिए।" लक्ष्मी ने कहा "क्या कह रही हो एकबार शादी टूट गई तो कौन करेगा तुमसे शादी,' सुनैना ने कहा "नहीं माँ इस डर से मैं अपने परिवार का बलि नहीं चढ़ा सकती हूँ।" पिता के आँखों से आँसू बह रहे थे हाथ सुनैना के सिर पर आशीष के रूप में बार -बार फेर रहे थे, यह पिता की हार नहीं थी उनके फटे गमछे में खिले हुए फूल थे जो खुशबू हीं नहीं उन छेद को भी गोरवान्वित कर रही थी ।
सुनैना के इस फैसले के कारण यह हुआ कि विकास [लड़के] ने समस्या समझी और अपने परिवार को भी राज़ी कर लिया कि उनकी समस्या को समझे और उचित समय पर बिना दहेज़ की शादी की । विकास ने कहा "मुझे दहेज़ के रूप में इतनी समझदार पत्नी मिल रही है जो अपने जीवन से ज्यादा दूसरे के जीवन लिए सोचती है।" आज वह परिस्थिती का फ़ायदा उठाने वाले ज़मीन के व्यापारी के मुँह पर ज़ोरदार थप्पड़ था जो बेटी की शादी को भी व्यापार का साधन मानते हैं। आज सुनैना पर माँ पिता जी हीं नहीं उनके गाँव वाले और ससुराल वाले भी गर्व कर रहे हैं ।
