विश्वास की जीत
विश्वास की जीत
अचानक मौसम बदल गया। बादलोंकी गडगडाहट शुरु हुई। बीच-बीचमें बिजली कौंधने लगी। बडी जोर से तुफानी हवाएँ चलने लगी। देखते-देखते बडी-बडी बुंदोसे बारीश होने लगी। धीरे-धीरे बारीश अपना सारा गुस्सा उतारने पर जैसे आमादा हो गई। मुसलाधार बारीश लगातार दो घंटे से हो रही थी जो रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। सब घबरा गए। फिर भी रामदीन कुछ लोगोंके साथ छाता लेकर दामादको लेने नदी किनारे पहुँचा। काफी देर हो गई पर कोई नाव इस किनारे आती हुई नजर नहीं आई। अब तक बाढ़ का पानी खतरेका निशान पार कर चुका था। पल-पल पानी का बहाव बढता ही जा रहा था।
मुल्लाहों की बस्ती में सुबहसे बहुत हलचल थी। आज रामदीन की बिटियाँ चंदनियाँका गौना होना था। बडे धुमधामसे तैयारियाँ हो रही थी। उसके घरवालोंको पल भरकी भी फुरसत नहीं थी। घरमें चंदनियाँ दुल्हनसी सजी , अपने पिया की बाट जोह रही थी। सालभर बाद वह अपने पिया को देखेगी ,यही सोच-सोच कर वह शर्मा रही थी। घर में बहुत रौनक थी। नाच-गाना,पायलकी झंकार,ढोलककी थाप के साथ बीच-बीच में सखियों की खिलखिलाहट से सारा वातावरण नहा चुका था। घरके पीछवाडे पंडालसे स्वादिस्ट पकवानोंकी सुगंध आ रही थी। इससे पहले कुछ नुकसान बार्वचीने सारा खाना घरमें रखवा दिया।
ऐसे में मौसमने अपने तेवर बदले और नया ही रंग दिखाने लगा। पहले मामुली लगनेवाली बारीश बादमें अपना रौद्र रुप दिखाने लगी। सब सोच में पड गए कि अब क्या होगा ? सबको चिंता होने लगी ? पर रामदीनने न बारीश की परवाह की और न तुफान की । उसने अपना धैर्य नहीं खोया। वही नदीके किनारे वो अपने दामादके नावका इंतजार करने लगा। जब कि बाकी के सब डर के मारे अपने-अपने घर चले गए। काफी देरबाद एक सजी नाव आती नजर आई , रामदीनकी आँखें खुशीसे चमक उठी। पर एक बडी लहरने उस नाव को डुबो दिया। ये देखकर रामदीन अपने होश गवाँकर वही ढेर हो बैठा।
जैसे ही घरमें खबर पहुँची, पलमें मातम छा गया। जहां इतनी चहल-पहल थी वहां एक भयानक खमोशी छा गई। जो लोग चंदनियाँको दुल्हन बनाकर विदा करने आये थे वही उसे विधवा बनानेपर जोर देने लगे।पर चंदनियाँ को विश्वास था कि उसका पति उसे लेने जरुर लौटेगा। मगर उसकी किसीने न सुनी। कुछ औरतोंने जबरजस्ती जमीनपर पटककर उसकी चुडियाँ तोड़ दी। सारी रात गम में डूब गई।
दूसरे दिन तूफान थम गया। चारो ओर खामोशी छा गई। नदी की लहरें खामोश हो गई। दूर से एक सादी सी नाव में कुछ लोग आ रहे थे। धीरे –धीरे वो नाव किनारे पर आ गई। नावसे उतरनेके बाद किनारे पर किसी को पडा देख ,वो चौंक गए। करीब जाकर देखा तो पता चला कि वो रामदीन था जो पीछली रात अपने दामाद के इंतजारमें वही था। उतरनेवाले आपसमें बोल रहे थे। "अरे हरिया, ये रामदीन है, तेरे ससुर,कल हमारा इंतजार कर रहे बारीश और ठंडकी वजहसे अकड गए। "
हरिया के पिता ने रामदीन को पहचाना और हरिया से कहा।
सुनकर हरिया दौडकर आया और उसने उसे उठा लिया और घर की तरफ चल पडे। घर पहुँचने पर वहाँ का माहौल देखकर हरियाके घरवाले भी डर गए उनको देखकर चंदनियाँ के तायाजी, घर के बाहर आए। रामदीन को संभालने के लिए कहकर दो खाट बाहर आंगनमें शामियाने में मंगवाए। एकपर रामदीन को लिटाकर पहले उसका इलाज करवाने अपने गांवके बैद को बुलावा भेज दिया और घरके अंदर ले जानेका आदेश दिया और दूसरी खाटपर दामाद और उसके रिश्तेदारों को बिठाकर उनसे बातें करने लगे। कुछ लोगोंको दामाद और उनके परिवार की खातिरदारी में लगा दिया। जैसे ही दुल्हेके घर पहुँचनेकी खबर मिली खुशीकी लहर दौड गई। पता चला कि तुफां के कारण उन लोगों ने पिछली रात सीतापूर गाँव में बिताई। जिस नाव में वो बैठे थे उसमें पानी रिसना शुरु हुआ इसलिए कहीं तूफान में नाव डूब न जाए इस आशंका से नाव बदल ली थी । दूसरे दिन तुफान थम जानेपर वो दूसरी नाव से नंदगाँव आये। तब यह भी खुलासा हुआ कि रामदीन सजी नाव को डूबते देख बेहोश होकर वही गिर पडा। उसके पास कोई न था।यह देखकर हरिया और उसके घरवाले उसे अपने साथ ले आए।
चंदनियाँ का विश्वास जीत गया, उसकी बात सच साबित हुई। वो सुहागन थी और सुहागन रही।
