मधु मिshra 🍃

Tragedy


4.5  

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विश्वास घात

विश्वास घात

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शालू को आज एक शादी में शामिल होने के लिए माँ के साथ नागपुर जाना था l ट्रेन का समय हो रहा था, शालू लोग जब स्टेशन पहुँचे तो ट्रेन प्लेटफार्म में आ चुकी थी.. शालू ने घड़ी की तरफ़ देखा... अभी ट्रेन छूटने के लिए पाँच मिनट ही बाकी थे, सेकेंड क्लास में रिज़र्वेशन तो है, इसलिए वो निश्चिंत थी l पर निर्धारित डिब्बे के पास पहुँचने पर उसने देखा.. दरवाज़े के पास बहुत से लोग खड़े हैं.. Iतभी इन्हें डिब्बे में चढ़ते देख एक सज्जन से दिखने वाले एक व्यक्ति ने शालू से कहा - "लाओ बेटा, तुम्हारा बैग मुझे दो, तुम माँ जी को आराम से चढ़ाओ.."

शालू ने उनकी आत्मीयता देख बैग उन्हें पकड़ा दिया..!

और जैसे ही ट्रेन में माँ को चढ़ाने लगी तो उस भद्र व्यक्ति ने शालू से पूछा - "सीट नंबर क्या है बेटा .?"

"35.. 36" शालू ने कहा..

"ठीक है, बैग मैं वहीं रख देता हूँ l" कहकर वो आगे बढ़ गये l

डिब्बे में चढ़ते ही शालू ने अपनी सीट पर नज़र दौड़ाई ,वहाँ पर बैग को रखा हुआ देखकर उसे तसल्ली हो गई कि बैग सही जगह पर पहुँच गया.. पर, जिन्होंने बैग रखा वो सज्जन व्यक्ति कहीं आसपास नहीं दिखे..तो शालू अफ़सोस करने लगी कि उक्त भद्र व्यक्ति को उसने धन्‍यवाद भी नहीं दिया l

और अब अपनी-अपनी सीट पर तसल्ली से शालू लोग बैठ गए.. ट्रेन अपने गंतव्य की ओर चलने लगी.. कुछ देर में खाना खाने के बाद शालू ने माँ की दवा निकालने के लिए बैग खोलना चाहा... तो ये क्या.. बैग का लॉक टूटा हुआ है , हड़बड़ा कर जब उसने बैग खोला तो पता चला कि उसके अंदर रखी गई कीमती साड़ी, कुछ कपड़े, ज़ेवर और रुपयों का पर्स उसमें से ग़ायब हो चुके हैं ..! तत्क्षण शालू की आँखों के सामने उक्त भद्र व्यक्ति की तस्वीर झूलने लगी.. हैरान परेशान शालू ने तुरंत रेल्वे पुलिस को रिपोर्ट की और उक्त व्यक्ति की पहचान भी बताई ..!

पर अब शालू को हैरानी इस बात की होने लगी कि गुम हुए सामान की वापसी तो संभव है नहीं , पर इंसान की इंसानियत को आख़िर पहचाना कैसे जाये.. क्योंकि गुंडे मवाली को देख उन पर सहज विश्वास की उम्मीद तो हम कभी कर भी नहीं सकते .!!





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