STORYMIRROR

Archna Goyal

Inspirational

4  

Archna Goyal

Inspirational

विजय ,,,,खुद पर

विजय ,,,,खुद पर

5 mins
696

सारी दुनिया जीत कर भी सिकंदर अकेला रह गया था। अब तक सिर्फ सुना था, आज उसकी जगह में खड़ी हूँ अकेली। जैसे निर्जन वन में हूँ चारों ओर अंधियारा सा छाया हुआ है।

एक अजब सी चीखें गुंज रही थी, दुर दुर तक कोई नहीं दिख रहा है, बस सन्नाटा ही सन्नाटा, घुटन ही घुटन, लज्जित सी महसुस करती मैं आंगन के एक कोने में दीवार के सहारे पीठ लगाए रोए जा रही थी। कोई चुप कराने वाला नहीं था, ना ही गले लगाने वाला, ना कोई ये कहने वाला कि चुप हो जा जो हुआ सो हुआ, सब भूल कर एक नई शुरुआत कर।

ग़लती तो मेरी ही है, मैने किसी की इज़्ज़त नहीं करी, अपना रुत्बा अपनी दौलत अपना शोहरत के नशे में ऐसे चूर रही जैसे इसके अलावा तो कुछ और है ही नहीं। बस पैसा पैसा पैसा।

इनके अलावा भी एक और चीज ज़रुरी है , परिवार और परिवार का प्यार। पर मैंने इन सबका मोल ही नहीं जाना, आज जब ये सब मुझसे छिन गया तब इनकी कीमत का एहसास हुआ है । पैसों के लिए मैं हर वक्त सास-ससुर व पति ध्रुव को नीचा दिखाती रहती थी ,।

उनकी तनख्वाह बहुत कम थी मेरे मुकाबले। ऐसा नहीं था कि वो मुझसे कम पढ़े लिखे थे, या उनको अच्छा पद नहीं मिल सकता था। उनको उच्च पद का प्रस्ताव भी आया था , पर अपने माता-पिता की बीमारी के कारण उन्होने ठुकरा दिया था। क्योंकि उनको विदेश जाना पड़ता। और ये बहुत दूर जाकर रहना नहीं चाहते थे। मैं भी जब शादी होके आई थी तब भी एक अच्छी नौकरी का प्रस्ताव आया था, मैंने कहा भी कि कर लो स्वीकार, पर ध्रुव ने ये कह कर मना कर दिया , कि मैं तुम्हें ऐसी हालत में छोड़ कर नहीं जा सकता, तुम मेरे बच्चे की माँ बनने वाली हो। कही तुम्हें कुछ हो गया तो पिछे से। माँ पापा के भी बस की बात नहीं ये सब संभालना। तनख्वाह तो अभी भी इनकी अच्छी ख़ासी थी। पर मुझसे कम थी। बस इसी बात का गरुर था, IS की पदवी छोटी नहीं होती।

एक मैं हूँ जो किसी की परवाह नहीं करती, बस अपना अपना सोचती हूँ । दूसरे वो जो औरों के सुख के लिए अपनी इच्छा पैसा पद सब छोड़ दिया। चाहते तो मेरी शादी के बाद जा सकते थे विदेश पर पर मेरी ख़ातिर नहीं गए।

ज़रा सी तो बात थी आज भी पर पता नहीं क्यों वो आज इतना बिखर गए मुझपर। बस यही तो कहा था कि मैं चाय नहीं बनाउंगी, ऐसा तो मैं कई बार कह चुकी थी पहले भी पर आज ऐसा क्या हुआ, जो इतनी सी बात पर सब तहस नहस हो गया। सोचते सोचते वो जवाब तक पहुँच ही गई ।

ओओओ अब समझी अब तक मेरी हर गलत सही बात को वे लोग झेलते ही तो आए थे, शायद अब जागरुकता आ गई थी। एक ठंडी सी साँस छोड़ते हुए बोली ::::आखिर कब तक कोई अन्याय सहेगा, एक दिन तो आवाज़ उठेगी ही। आज नहीं सुनी मेरी किसी ने। मैंने जो भी कमाया खुद पे और बच्चों पर ही तो खर्च किया है। कभी पाँच पैसे भी नहीं मांगे ध्रुव ने। ना ही कोई घर का काम करवाया, बस ऑफ़िस से आकर वो मेरे हाथ की चाय पीना चाहते थे , आधी बार तो वो खुद ही या कामवाली ही बना दिया करती थी, फिर भी जब तब मैं उन्हे खरी खोटी सुना दिया करती थी एक चाय के लिए ,और एहसान अलग से पटकती। लेकिन फिर भी ध्रुव हँस कर टाल देते। मुझे शॉपिंग भी बहुत करवाते, और मैं खुद भी अलग से ख़रीददारी करती वो और। मुझसे वो बहुत प्यार करते है.... हाँ पर कोई अपना कब तक तिरस्कार कराएगा। एक दिन तो वापस जाएगा ही।

यही सब सोचते सोचते कब झपकी आई पता ही न चला..और लुढ़क गई मैं ।

आँख खुली तो अपने को ध्रुव की बाँहों में पाया, मैं बहुत खुश हुई....अब तक मैं ग़म के आँसू रो रही थी, ध्रुव को देखते ही खुशी के रोने लगी। अपने आप ही बड़बड़ाने लगी। अपने सारे गुनाह गिनवाने लगी, मैं अविराम बोले ही जा रही थी, तभी ध्रुव ने मेरे मुहँ पर हाथ रखा और मेरे आँसू पोंछे और गले लगा लिया। मैं भी अब खुद को सहज महसूस कर रही थी।

गर्दन उठाई तो देखा सामने पापा मम्मी खड़े मुस्कुरा रहे थे। उनको देख मैं भी मुस्कुराई, मेरे चेहरे पर खुशी और पछतावे के मिले जुले भाव थे।

सोचने लगी मैने सिर्फ जीत ही हासिल की है घर भी बाहर भी आज तक। सच कहूँ तो सही मायने में आज हुई है मेरी विजय। मेरी विजय हुई है अपने अभिमान पर अपने फितरत पर।

दस साल बाद--- 

मैंने कई संस्थानों में अपना योगदान दिया। वहाँ मैं समाज-सेविका के तौर पर कार्यरत हूँ। बदल गई हूँ मैं, पहले जैसी नहीं हूँ अब। जीने लगी हूँ मैं अपने अलावा औरों के लिए भी। ये है मेरी असली विजय!

कहते कहते मैं रोने लगी। एक अबला नारी के सामने, उसकी आप बीती सुन मेरे से भी रहा नहीं गया। और अपनी व्यथा भी बता दी। और फिर मुस्कुराते हुए भींगी आँखों से हम दोनो ने विदा ली ।


       



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Inspirational