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Sandeep Sharma

Tragedy

4  

Sandeep Sharma

Tragedy

उर्मिला की मौन व्यथा

उर्मिला की मौन व्यथा

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अश्रुपूर्ण विदाई के समय अयोध्या में एक नारी ऐसी भी थी जिसके अश्रु ठहर गये थे। एक प्रश्न था नेत्रों में कि "कोई तो कहे कि उसे किस अपराध का दंड मिल रहा है ? जो अपराध हुआ ही नहीं उसका दंड क्यों ? हाथों की मेंहदी का रंग इतनी शीघ्रता से बे-रंग होकर विरह, वियोग और विल्क्षण संयोग का प्रति फल प्रदान करेगा, कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था।

 मां ने कहा था - "विरह के चौदह वर्ष की रात्रियों का भयावह अंधकार तू कैसे सहेगी ? तू चल मेरे साथ। वहां तेरी बाल सखियां हैं। तेरे हृदय वियोग की अग्नि शांत रहेगी।"

उर्मिला ने नेत्रों को नीचे करके अपनी मां को उत्तर दिया - "मां! तुम्हारे आंचल का सुख जितना मिलना था, मैंने भोग लिया। भोग के उपरांत विरह रोग को मैं सहन करने के लिए सक्षम हूं। उसे न तो सखाओं में विभक्त किया जा सकता है और न शांत किया जा सकता है।...विदा करते समय तुम्हारे ही वचन थे - 'दो परिवारों की सांस्कृतिक धरोहर है तू। संस्कार तेरे आचरण के साक्षी बनेंगे। मैंने तो केवल जन्म दिया है लेकिन मोक्षाग्नि तो पति-पुत्र से ही संभव है।'....अब तुम ही बताओ यदि मायके में मोक्षाग्नि का पल उत्पन्न हो गया था तो….।"

 मां निरूत्तर हो गई। आज मां को ज्ञात हुआ कि नारी होना कितनी बड़ी तपस्या है ? इस तप का कोई मोल नहीं है। बेटियां केवल तन से ही नहीं अपितु मन से भी परिपक्व कब हो जाती हैं, मां भी नहीं जान पाती।

 मौन व्यथा के चौदह सावन बिना बरसे ही गुज़र गए। एक बूंद भी नहीं टपकी नेत्रों से। श्रृंगार प्रसाधन भी उर्मिला के कक्ष की चौखट लाँघ नहीं पाये। राजप्रासाद की घुटनभरी जिंदगी में उल्लास तो था ही नहीं। केवल अंतिम स्वांस की अभिलाषा मृत्युवरण से रोक रही थी। समय निश्चित गति से गतिमान था और इच्छाएं उसी तीव्रता से दमन के आगोश में समा रहीं थीं। 

"उर्मिला पुत्री!" वयोवृद्ध दासी का संबोधन सुनकर उर्मिला चौंक गयी। "पुत्री उर्मिला! लक्ष्मण जानकी का संदेश है कि विरह-वियोग की भयावह स्थिति समाप्त हो गई है। पुत्र राम अपनी अर्धांगिनी सीता और भ्राता लक्ष्मण के साथ तृतीय प्रहर राजप्रासाद में पदार्पण करने जा रहे हैं।"

उर्मिला को विश्वास हुआ ही नहीं कि चौदह वर्ष की विरह पीड़ा का अंत इतनी सहजता से हो जाएगा। पति-पुत्र वियोग से ग्रसित एक नारी पति की गति को भूलकर पुत्र के स्वागत के लिए उद्धत हो जाएगी ? एक मैं हूं और एक मां हैं, दोनों में कितनी भिन्नता है ? क्या पुत्र दर्शन पति-वियोग को भी निर्मूल करने में सक्षम है ? एक नारी पिता, पति और पुत्र में सर्वोच्च स्थान पुत्र को देती हैं ? वात्सल्य का सुख पान करने वाला पिता तो संभवतः उसी पल पराया हो जाता है जब पुत्री को वह सुखद भविष्य के लिए विदा करता है। सांसारिक सुखों का भोग करने वाला जीवन संगी उस समय से ही उपेक्षा की गति को प्राप्त होने लगता है जब एक नारी मां बनकर अपने आंचल में पुत्र को देखकर प्रफुल्लित होती है।... जीवन की अंतिम पायदान पर, जहां पति से सभी अपेक्षाएँ मृतप्राय हो जाती है तब पुत्र-प्रपोत्र की सुखद अनुभूति प्राण हरने नहीं देती। यह जीवन की नियति है या मानव का स्वभाव कोई नहीं जानता।

उर्मिला पर्यंड्क से उठी और कंपित हाथों से श्रृंगार शुरू ही किया था कि दासियों ने उसे घेर लिया। दर्पण सत्य का श्रेष्ठ माध्यम है। कुछ पल दर्पण देखने के उपरांत उर्मिला ने दासियों की ओर देखा। मानो कह रही हो- 'श्रृंगार से तन को तो संवारा जा सकता है। हृदय को नहीं। हृदय भाव मुख पर अंकित हो ही जाते हैं।' 

 मौन मनोभाव को समझकर पुनः श्रृंगार प्रक्रिया प्रारंभ हुई। अधिक तो नहीं अल्प ही सही उर्मिला के मुख पर चौदह वर्ष की विरानियां ढ़क गई थीं। द्वाराचार के समय उर्मिला ग्रीवा और नेत्र दोनों ही झुकाए खड़ी रही थी। लक्ष्मण कब राजप्रासाद में प्रवेश कर गए उसे पता ही नहीं चला। हां, आज, चौदह वर्ष के अंतराल के उपरांत नेत्र सभी तट बंध विच्छेदित कर गये थे। कौशल्या ने अपने वक्षस्थल से लगा कर उर्मिला के नेत्रों को बाधित नहीं किया था।

रात्रि के प्रथम प्रहर से पूर्व दासियों ने एक बार पुनः उर्मिला का श्रृंगार किया। बह निकली विरह जल धारा के उपरांत उर्मिला के मुख पर पिया मिलन की कामना जागृत हो गई थी। एक द्वंद की अभिलाषा लिए उर्मिला श्यन कक्ष में प्रविष्ट हुई। अपने सामने उर्मिला को पाकर लक्ष्मण ने घुटनों के बल बैठ कर करबद्ध निवेदन किया - "दोषी हूं अपनी प्राण प्रिय का। सदैव ऋणी रहूंगा तुम्हारे त्याग और समर्पण का। हो सके तो अपने प्रेम के बल से मुझ तुच्छ मनुष्य को उऋण कर देना।"

उर्मिला के हृदय में उठा द्वंद युद्ध की पराकाष्ठा से पूर्व ही ध्वस्त हो गया। घुटनों के बल बैठकर उर्मिला ने कंपित स्वर में कहा - "चौदह वर्ष की ऊसर भूमि पर पुनः अकाल मत उत्पन्न करना स्वामी। अन्यथा इतिहास से कभी भी उऋण न आप हो पायेंगे और न मैं।" इतना कहकर उर्मिला लक्ष्मण के वक्षस्थल से लिपटकर कब तक रोती रही कोई नहीं जानता। इतिहास भी नहीं।


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