तुम बने हो सेतु !
तुम बने हो सेतु !
उपाध्याय जी को अब यह पूरा विश्वास हो चला था कि जो दीवार परिवार में उनके और बहू बेटे के बीच खडी हो गई है वह ढहने वाली कत्तई नहीं है।अरे कहीं ऐसा होता है कि एक बहू अपनी सास को यह धमकी दे डाले कि बुढिया तूं अपनी आदतें सुधार ले नहीं तो तुझे जेल भिजवा कर रहेंगे।अभी पिछले साल की ही तो बात है।एक दिन बहू के मायके वालों ने अपने किसी रिश्तेदार की शादी में लड़कियों द्वारा किये गए नाच गाने की सचित्र पोस्ट सोशल मीडिया पर जब डाल दी थी तो मिसेज उपाध्याय को यह बात अच्छी नहीं लगी थी और उन्होंने साफ - साफ अपनी यह प्रतिक्रिया दे डाली थी कि मुझे तो नाचने गाने वालियों से सख्त नफरत है।उनकी इस प्रतिक्रिया ने पहले से नाराज़ चल रही उनकी बहू के लिए विस्फोटक का काम कर दिया।छोटे शहर में रहने वाली उनकी बहू भी शादी के बाद एकबारगी को खुला आसमान देखी थी और देसी वस्त्रों से बहुत दूर जा चुकी थी। उसने तुरंत फोन उठाया और अपनी सासू मां को धौंस दिखाते हुए कहा कि वे अपनी कीमती सलाह अपने पास ही रखें।
शायद अति आत्मविश्वासी मिसेज उपाध्याय को इससे ज्यादा घाव अभी तक किसी ने नहीं दिया था।वह भी किसी परिवार की बहू रहीं हैं और उनकी भी अपनी सासू माँ से एक नहीं कई कई बार ठन चुकी थी।लेकिन यह नौबत नहीं आने पाई थी कि कोई एक दूसरे को जेल भिजवाने की धमकी दे डाले !उनको मारो काठ मार गया था और फोन रखते ही वह निढाल होकर गिर पड़ी थीं।
शाम को जब मिस्टर उपाध्याय आफिस से थके हारे आये तो उन्हें कोप भवन सरीखे उनके बेडरूम में गिरा पाया।वे पहले चौंके और फिर पूछ ही बैठे-
"क्या बात है डार्लिंग ! आज कुछ मूड आफ लग रहा है ? "
किसी प्रकार की कोई प्रतिक्रिया नहीं होते देखकर वे पत्नी के पास पहुंचे ही थे कि मानो मिसेज उपाध्याय की आँखों से ठहरे हुए बांध का पानी बह निकल पड़ा हो।
चीखते हुए वे बिफर पड़ी थीं - "वह .... वह जो तहसीलदार की बेटी को तुम मेरी दुश्मन बना कर घर में लाये हो , उसने आज मुझसे बड़ी ही बदतमीजी से बात की है। हाँ हाँ उसने यहाँ तक धमकी दे डाली है कि वह मुझे जेल भिजवा कर रहेगी। " उपाध्याय जी तो सन्न हो गए !तुरंत बेटे को फोन लगाना चाहा तो फोन नहीं लगा।बहू से बात करनी ही बेकार थी क्योंकि जब उसके सर पर भूत सवार था तो लगे हाथ कहीं वह उनसे भी ना निपट ले !
उन्होंने मिलकर अब इस रोज़ र्रोज़ की खिच खिच को " दि एंड" ही दे डालने की सोची। उसी शाम एक नामी गिरामी वकील के यहाँ गए और वकील साहब की सलाह के मुताबिक़ जान माल की धमकी देने के लिए बेटे और बहू के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवा दी।
उम्र की पचासवीं सीढी पर पहुँच चुकी मिसेज उपाध्याय के लिए यह दूसरा सबसे बड़ा घाव बन गया था। अभी चार पांच साल पहले इस विवाह के तुरंत बाद एक हादसे में उनके छोटे बेटे का देहांत हो गया था।कुछ लोगों के कहने सुनने पर उस घटना को एक अपशकुन के रूप में भी उपाध्याय दम्पति देखने लगे थे हालांकि उन्होंने बहू या बेटे को इस बात से कभी भी उलाहना नहीं दिया था। गाँव गिरांव होता तो अब तक कब का ऎसी बहू घर के लिए अप शकुनी मानकर घर से निकाला मिल गया होता।अफार नहीं भी निकाला हो पाटा तो अत्यंत उपेक्षा का शिकार तो अवश्य ही होकर घर के एक किनारे पड़ी रही होती। लेकिन इस तथाकथित प्रगतिशील समाज में अब यह कहाँ होने वाला था ! बेटे को भी उसने ऐसा मन्त्र मारकर अपने बस में कर डाला था कि वह ऐसे मौकों पर चुप्पी लगा लेता। मां के रूप में मिसेज उपाध्याय को बेटे यह व्यवहार और भी खलने लगा था।
थाने पर और डी.एम.के यहाँ मिसेज उपाध्याय की यह नोटिस जा चुकी थी और उस पर तेजी से कार्यवाही होते हुए बेटे और बहू को सम्मन जारी हो गया था।थाने से एक दिन एक इंस्पेक्टर जब घर आया तो उपाध्याय जी ने उसे सारे घटनाक्रम से अवगत करा दिया।
" क्या कीजिएगा जनाब ,यह जो नई जेनरेशन हैं ना ..वह जाने कहाँ जा रही है।मैं तो खुद ही अपनी बेटी को लेकर टेंशन में हूँ| उसने जीना हराम कर रखा है।एक लौंडे से इश्क फरमा बैठी है| देर रात तक घूमती है और जब हम डांटते डपटते हैं तो घर छोड़कर भाग जाने की धमकी देती है।" जांच पड़ताल में आये इन्स्पेक्टर खान बोले जा रहे थे।उपाध्याय जी के पास हाँ में हाँ मिलाने के अलावे और कोई रास्ता भी तो नहीं था !
इस घटना के वर्षों बाद तक बहू बेटे से उपाध्याय परिवार का संवाद बंद रहा।एक दिन बेटे ने उपाध्याय जी को जब बार बार फोन किया तो आखिर उपाध्याय जी ने लगभग झल्लाते हुए फोन उठा ही लिया।उधर से राहुल , उनका बेटा बोल रहा था।
" डैडी ! आप तो समझदार हैं। आप तो मेंरी दशा समझिये। असल में वनिता डिप्रेशन का शिकार है और वह .. वह तो मुझसे भी इसी तरह बात करती है।..कभी कभी नींद की ढेर सारी गोलियां गटक लेती है|..कभी कभी घंटों घर से बाहर शापिंग करती रहती है|...एक दिन तो वह मेरे घर ए मेरे बस से भी बदतमीजी कर बैठी थी।डैडी..डैडी प्लीज़ आप सुन रहे हैं ना .."मेरे हाँ कहने पर उसने आगे ढेर सारी बातें बताते हुए यह सिद्ध करना चाहा कि उसकी पत्नी बेवकूफ है और डिप्रेशन के प्रभाव में आने पर कुछ भी कर बैठती है।इसलिए उनको एक अवसर और मिलना चाहिए सम्बन्धों को सुधारने का।मैंने हामी भर दी।
इस बार दीवाली में वनिता , राहुल और उनका सात वर्ष का बेटा हर्ष जब भागलपुर अपने घर आये और लगभग दस दिन तक एक साथ रहे तो हर्ष ने अपनी बाल प्रवृत्ति से दादा दादी को मानो मंत्रमुग्ध कर दिया।वह उस दरमियान सिर्फ दादा और दादी का बेटा बनकर रहा।रात के एकांत क्षणों में जब अक्सर बच्चे भूत प्रेत या परियों की कहानियाँ सुनना चाहते हैं वह अपने दिवंगत चाचू के बारे में दादी की गोद में मुंह घुसा कर बातें करता था।उसकी बातें कभी कभी उनकी दादी को यह भी एहसास करा दिया करती थी. कि मानो अब वह उनका पौत्र नहीं बल्कि उनके और उनके बेटे - बहू के बीच बिगड़ते जा रहे सम्बन्धों रूपी भयंकर नदी को पार लगाने के लिए सेतु का काम कर रहा है।क्या हर्ष अपने मक़सद में कामयाब हो पायेगा ?...और क्या उपाध्याय परिवार इस सदी में परजनों के बीच बढ़ती जा रही वैचारिक विभिन्नता और उसके दुष्परिणाम के उठाने रूपी विभीषिका से उबर पायेगा ? इस प्रश्न का उत्तर तो समय हो दे पायेगा !
