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Jhilmil Sitara

Tragedy

4  

Jhilmil Sitara

Tragedy

तीसरी पत्नी

तीसरी पत्नी

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मधुरिमा से मेरी मुलाकात लगभग नौ दस सालों बाद हुई थी । वह भी मुमकिन हो पाया मेरे छोटे भाई की शादी में। उसे देखकर मैं अवाक् सी रह खड़ी रह गई दरवाजे पर ही। उसका सुन्दर सलोना चेहरा जिसे इतने सालों से मैंने अपने ज़हन‌ में संजो कर रखे थे स्कूल के सुनहरे पलों के साथ, उससे विपरीत वह लग रही थी मुरझाई और थकी हुई सी। फिर भी मेरी खुशी का ठिकाना नहीं था। मैं तेज कदमों से मधुरिमा की तरफ बढ़ी और उसके सामने जा खड़ी हुई। मेरी ओर कुछ पल वह पराई दृष्टि से देखती रही और मेरी मुस्कान भरी आंखों की चमक ने मेरा परिचय जाहिर कर ही दिया। फिर क्या था हम दोनों ने एक - दूसरे को बाहों‌ में भर लिया और चिर परिचित स्पर्श से विभोर हो गए। 


प्रियल तुम नहीं जानती मैं यकीन नहीं कर पा रही तुमको अपने सामने पाकर ( मेरे बहते हुए खुशी के आंसू अपने हाथों से पोंछते हुए मधुरिमा ने कहा )।

मैंने जैसे ही अपने घर में प्रथम ( मेरा छोटा भाई) की शादी का कार्ड देखा मुझे यकीन नहीं हुआ। फिर सबके नाम पढ़े तब जाकर तसल्ली हुई और मैं बगैर देर किए चली आई। मैं तीन महीने पहले ही इस शहर में आई हूँ । पापा के रिटायर्ड होने के बाद वो यहां रह रहे हैं दादा जी के पुश्तैनी मकान में। मुझे तो पापा ने बताया ही नहीं अंकल जी ( मेरे पापा ) भी सालों बाद वापस इसी शहर में रहने लगे हैं। असल में उम्र का तकाज़ा भी है और पापा अब भूलने भी लगे हैं बातें। मां होती तो शायद पापा की ऐसी दशा नहीं होती। 

( मधुरिमा मेरे कमरे में पहुंचने तक इतना सब कुछ बता चुकी थी) 


मैंने कहा " मेरी प्यारी मधु आओ बैठो आराम से बहुत सी बातें करनी हैं तुमसे और अपना सामान भी मंगवा लो भाई की शादी तक तुम मेरे साथ रहोगी बस कोई बहाना नहीं चलेगा। हां, जीजा जी और बच्चे साथ हैं तो उनको भी बुला लेते हैं। 


मधुरिमा बोली " नहीं यहां रहना मुमकिन नहीं हो पाएगा मैं हर दिन आती रहूंगी शादी की सारी रस्मों में तुम्हारे साथ रहूंगी। वहां बेटा और मेरे पापा अकेले पड़ जाएंगे। इस माहौल में उनकी देखभाल और आराम को लेकर भी परेशानी होगी और दूर तो है नहीं तीन किलोमीटर तो तुम बिल्कुल मत सोचो कि, मैं भाई की शादी के कामों से और मस्ती से पीछा छुड़ाना चाहती हूं समझी प्रियल रानी। हम एक - दूसरे की शादी में भले ना आ पाए लेकिन, अब उसका हिसाब भी मिलकर चुका लेंगे। बुलाओ अपने पतिदेव को बोलो मेरी मधुरिमा आई है।" मैं मुस्कुरा उठी। और उसे फिर से गले लगा लिया मैंने।


हां, ये सच है सालों से हमें कोई खबर‌ नहीं थी। कब उसकी शादी हुई, कहाँ हुई, किससे हुई ? कुछ नहीं पता था हम दोनों को एक - दूसरे के बारे में। मैंने बताया चार साल पहले मेरी शादी हुई है और पति व्यवसाय करते हैं और एक दो साल की बेटी भी है जो इस समय अपने पापा और मामा के साथ बाजार गई है। अब मैंने मधुरिमा से उसकी शादी के बारे में पूछा" पहले तो वह शांत हो गई और फिर आंसू की बूंदों ने आंखों में देखते - ही - देखते जगह बना ली। मेरी धड़कने बेचैन होने लगी मधुरिमा के आंखों से बहते आंसू देखकर। लेकिन, मेरे कुछ पूछने से पहले ‌ही उसने बताना शुरू किया। 


"तुम नहीं जानती प्रियल, मैं शादी जैसे रिश्ते को लेकर जितने सपने देखे थे, जो अरमान सजाए थे वो सब टूट गए। सब बनावटी और दिखावे के बनकर‌ रह गए प्रियल। तुम सुनोगी तो सच मानो यकीन नहीं कर पाओगी की मैं अपने पति की तीसरी पत्नी हूँ। हां, तीसरी पत्नी।" 


मैं उसकी तरफ अपलक देखती रह गई। उसने ‌मेरा हाथ कसकर पकड़ रखा था और‌ अपना हाल बता रही थी। 


"मेरे पति की पहली पत्नी की तीन बेटियां हैं। स्वभाव से वो बहुत अच्छी हैं, मैं उन्हें दीदी कहती हूं " रंग सांवला है और चेहरे की बनावट आकर्षित नहीं करता। स्कूल खत्म होने से पहले ही इनकी शादी गांव के सरपंच की बेटी से करा दी गई थी। तीन बेटियों के होने के बाद इनको नौकरी लगी और ये शहर‌ आ गए। गांव के स्कूल में तीनों बेटियां पढ़ने लगीं। दीदी की सूरत और ऊपर से तीन - तीन बेटियां इनको खटकने ‌लगी अब। वो एक सुन्दर पढ़ी लिखी पत्नी की कल्पना करने लगे जो सबके सामने आने पर इनका मान कम ना होने दे लोगों की नज़रें उसपर टिक जाए ऐसी पत्नी की चाह में इन्होंने दीदी को बिना बताए अपने ही दूर की पहचान वाली से चुपचाप शादी कर रहने लगे। दीदी को आखिर पता चल गया मगर, पति की बदनामी और उनकी नौकरी जाने के डर से वो चुपचाप रह गईं। 


इनकी दूसरी पत्नी आठ महीने गर्भ से थी। तभी उसके एक चाहने वाले ने गोली मारकर उसकी हत्या कर दी भरे बाजार में और पुलिस के हवाले कर दिया खुदको। इस घटना ने बहुत दिनों तक इनकी नींद उठाए रखा और जब ये सामान्य महसूस करने लगे फिर से दुल्हा बनकर तैयार हो गए। इस बार मैं थी इनकी पसन्द प्रियल। मैं नहीं जानती थी इनकी पिछली जिन्दगी की सच्चाई। दूसरे शहर से पढ़कर लौटी और इनसे नज़रें मिल गई और इनके रूप - रंग , कद - काठी पर मैं मोहित होकर आज यहां पहुंच गई। सच बताना इन्होंने कभी जरुरी नहीं समझा और जब सच मेरे सामने आया उसे अपनाने के अलावा मैं कुछ कर नहीं पाई। अब तो हमारा एक तीन साल का बेटा भी है और दीदी के साथ अच्छे सम्बन्ध भी। उनकी बेटियां मुझे छोटी मां कहती हैं।" यह कहकर मधुरिमा ने मुस्कुरा दिया और मैं उसे देखती रह गई।


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