स्वर्ग एक आंतरिक यात्रा( 9)
स्वर्ग एक आंतरिक यात्रा( 9)
जैसे ही हम पार्क के गेट के पास पहुंचे, मैंने देखा कि आकाश का रंग और गहरा हो चुका था। आसमान पर सितारे टिमटिमाने लगे थे, और ठंडी हवा का झोंका हल्के-हल्के बहने लगा था। पार्क के पेड़ और झाड़ियाँ अब साये की तरह नज़र आने लगी थीं, और पूरा माहौल एक अजीब से सुकून में ढल चुका था। आशी की छोटी-छोटी बातों ने मेरे मन के भीतर जो उथल-पुथल मचाई थी, वह अब धीरे-धीरे शांत हो रही थी।
"तो अब तुम्हें घर जाना चाहिए, आशी," मैंने कहा, उसकी ओर देखते हुए। "तुम्हारे मम्मी-पापा इंतजार कर रहे होंगे, और शायद वे परेशान भी होंगे।"
आशी ने मेरी ओर देखा, और फिर हल्की मुस्कान के साथ बोली, "हाँ, मुझे घर जाना चाहिए। मम्मी पापा परेशान होते हैं जब मैं देर कर देती हूँ। लेकिन मैं कल फिर आऊंगी। आप भी आइएगा, हम फिर से गुड़िया ढूंढेंगे।"
मैंने उसके चेहरे पर वही मासूमियत और उम्मीद देखी, जो बच्चों में होती है—एक उम्मीद कि कल फिर से सब कुछ ठीक हो जाएगा, और जो खोया है, वह मिल जाएगा। मैंने सहमति में सिर हिलाया और कहा, "हाँ, आशी, मैं कल जरूर आऊंगा।"
वह तेजी से पार्क के गेट की ओर भागी और फिर एक पल के लिए मुड़कर मुझे देखकर हाथ हिलाया। उसकी वह मासूम मुस्कान मेरे दिल में घर कर गई थी। वह चली गई, और मैं वहीं खड़ा रहा, जैसे किसी विचार में डूब गया हो।
मुझे अचानक अहसास हुआ कि आशी के साथ बिताए कुछ घंटे मुझे ज़िंदगी की उन छोटी-छोटी खुशियों का मतलब समझा गए, जिन्हें मैं कभी महसूस नहीं कर पाया था। उसकी गुड़िया खो गई थी, लेकिन उसके चेहरे पर कोई शिकन नहीं थी। उसने उसी सरलता से उसे स्वीकार कर लिया था और नई शुरुआत करने की बात कही थी। यह बच्ची, जिसे शायद ज़िंदगी के संघर्षों का कोई अंदाज़ा नहीं था, उसने मुझे जीवन की सबसे बड़ी सच्चाई सिखा दी थी—जीवन चलता रहता है, चाहे कुछ भी हो। खोई हुई चीज़ों के पीछे भागने से बेहतर है नई शुरुआत करना, जैसे आशी ने कहा था, "अगर नहीं मिली, तो मैं नई गुड़िया बना लूंगी।"
मैंने पार्क से बाहर निकलते हुए सोचा कि मेरे पास अब गिने-चुने दिन ही बचे थे। लेकिन इन कुछ दिनों को मैंने कैसे जीना है, यह मेरे हाथ में था। और आशी के साथ बिताए गए इन कुछ घंटों ने मेरे भीतर एक नई चेतना जगाई थी।
अब मुझे समझ आ गया था कि मेरे पास जितने भी दिन हैं, मुझे उन्हें नए नजरिए से जीना है—खोई हुई चीज़ों के ग़म में नहीं, बल्कि हर दिन को एक नई उम्मीद और खुशी के साथ। और अगर किसी चीज़ की तलाश अधूरी रह जाए, तो उससे निराश होने की बजाय, उसे एक नए दृष्टिकोण से देखना चाहिए।
आशी अब मेरी आँखों से ओझल हो चुकी है। उसकी छोटी-छोटी मुस्कान और मासूमियत मेरे मन में एक गहरी छाप छोड़ गई हैं, पर अब वह जा चुकी है। मैं एक गहरी सोच में डूब गया हूँ। मुझे अहसास हो रहा है कि शायद अब मैं उसे कुछ ही दिन देख पाऊंगा। मेरे जीवन के बचे हुए दिन अब बहुत कम रह गए हैं। यह ख्याल मेरे मन में गहराई से बैठ गया है, और मैं एक भारी मन से होटल की ओर लौटने लगा हूँ। शाम धीरे-धीरे गहरी होती जा रही है, और उसकी उदासी मेरी तन्हाइयों को अपनी बाहों में भरने लगी है।
यह पहली बार है जब मुझे ऐसा गहरा पछतावा हो रहा है। ऐसा लग रहा है कि जिंदगी को बहुत सावधानी से खर्च करना चाहिए था, जैसे यह कोई कीमती संपत्ति हो, जिसे कभी भी खो दिया जा सकता है। जैसे यह कल ही खत्म हो जाएगी। मैंने हमेशा जीवन को एक अनंत स्रोत समझा, लेकिन आज इस सत्य का बोध हो रहा है कि यह अनंत नहीं है।
होटल की ओर जाते हुए, मैंने अचानक आसमान की तरफ नजर उठाई। पहाड़ों के पेड़ों के झुरमुट के बीच से एक तरफ सूर्य धीरे-धीरे अस्त हो रहा था। उसकी लालिमा धीरे-धीरे मिट रही थी, जैसे किसी ने रंग की परत को धीरे से मिटा दिया हो। दूसरी ओर, चंद्रमा धीर-धीरे अपना आकार ग्रहण कर रहा था, मानो वह रात के अंधकार को अपनी शीतल रोशनी से समेट रहा हो। यह दृश्य इतना शांत और गहरा था कि मेरे मन में जीवन और मृत्यु की सच्चाई स्पष्ट हो गई।
सूर्य का अस्त होना और चंद्रमा का उदय होना, यह दोनों एक ही प्राकृतिक प्रक्रिया के दो पहलू हैं। एक का जाना, दूसरे का आना सुनिश्चित करता है।। सूर्य धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे छिपता जा रहा था, उसकी अंतिम किरणें दूर तक फैली हुई थीं, जैसे वह कह रहा हो, "कल फिर मिलेंगे।" और दूसरी ओर, चंद्रमा अपनी शीतल चमक बिखेर रहा था, जैसे अंधकार को अपने आगोश में ले रहा हो।
जैसे जीवन और मृत्यु भी एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। एक जीवन का अंत, दूसरे के जीवन की शुरुआत की निशानी है। यह अटूट चक्र निरंतर चलता रहता है, और हमें इस चक्र का एक हिस्सा बनना होता है।
मुझे कृष्ण और अर्जुन के बीच हुए संवाद की याद आ गई, जब भगवद गीता में भगवान कृष्ण ने अर्जुन को सिखाया था कि जीवन और मृत्यु एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। आत्मा अमर है, और शरीर केवल एक साधन। मृत्यु का डर या पछतावा व्यर्थ है, क्योंकि यह जीवन चक्र का अभिन्न हिस्सा है।
मैंने खुद को समझाया, "आशी भी शायद इस जीवन चक्र का एक प्रतीक है—वह मेरे जीवन में आई और अब चली गई। यह उसका प्राकृतिक क्रम था, और मेरा भी। मुझे भी जीवन के इस चक्र को स्वीकार करना होगा।"
अब जब रात गहराने लगी थी और चंद्रमा अपने पूरे तेज़ में निकल आया था, मैंने एक गहरी साँस ली। पहाड़ों की ठंडी हवा मेरे चेहरे पर हल्के से लगी, और मुझे एक अजीब सी शांति महसूस हुई। जीवन का यह आखिरी अध्याय, जो मैंने कभी नहीं सोचा था, अब अपने अंतिम पन्नों की ओर बढ़ रहा है।
आशी अब मेरी ज़िंदगी से जा चुकी थी, और मैं एक गहरी सोच में डूबा हुआ होटल की ओर लौट रहा था। पहाड़ों की ऊँचाइयों पर बहती हवा मेरे चेहरे को छू रही थी, जैसे जीवन का कोई अंतिम संदेश देने आई हो। मेरी तन्हाई अब और गहराती जा रही थी, और हर कदम के साथ मेरा मन पहले से ज्यादा भारी होता जा रहा था। ऐसा महसूस हो रहा था कि जैसे समय धीरे-धीरे मुझसे फिसलता जा रहा है।
पहली बार, मैंने इस गहराई से सोचा कि जीवन कितना नाजुक और अस्थिर है। आशी के साथ बिताए वे कुछ क्षण, उसकी मासूम बातें और उस गुड़िया को ढूंढ़ने की कोशिशें, वे सभी पल अब एक धुंधली याद बन चुके थे। लेकिन उन पलों ने मुझे जीवन की अहमियत का एहसास कराया था।
