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V. Aaradhyaa

Action Inspirational

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V. Aaradhyaa

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स्वाभिमान की क़ीमत पर नहीं

स्वाभिमान की क़ीमत पर नहीं

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आज काम से लौटने में उसे अन्य दिनों की अपेक्षा कुछ देर हो गई थी। हमेशा से मितभाषि गरिमा अब और भी चुप रहने लगी थी। उसके चुप रहने का एक और फायदा यह होता कि लोग उससे आगे बढ़कर बात करने या परसनल सवाल करने में हिचकते थे और साथ ही गरिमा को ज़्यादा टोकाटोकी भी नहीं करते थे।


आज भी गरिमा को ट्रेन में खाली सीट मिल गई तो आदतन वह चुपचाप अपने बैग से किताब निकालकर पढ़ने लगी। उसे अब अपनी क्वालिफिकेशन बढ़ाना था और अपने पैरों के नीचे की ज़मीन और भी पुख्ता करनी थी तभी तो वह सिर उठाकर सम्मान से जी सकती थी।


इधर गरिमा को मायके आए हुए काफ़ी समय हो गया था। आस पड़ोस वाले भी अब यह सवाल मुखर होकर पूछने लगे थे कि वह ससुराल कब जाएगी।


इधर घर में भी उसे कई तरह के तर्क कुतर्क का जवाब देना पड़ रहा था।


"एक बार फिर से सोच लो गुड्डो !आज भी इस समाज में अकेली स्त्री के लिए आगे जीवन जीना बहुत मुश्किल है!"


"और नहीं तो क्या स्त्रियां हमेशा से कमजोर मानी जाती रही हैं और यह समाज एक तलाकशुदा स्त्री को कमजोर मानने के साथ-साथ कई बार चरित्रहीन भी मान लेता है। या फिर यह मान लेता है कि अगर इस स्त्री ने आगे बढ़कर तलाक की मांग की है तो यह कहीं भी सामंजस्य बैठाकर नहीं रह सकती है। माँ ठीक कह रही हैँ गुड्डो! एक बार फिर से तुम्हें अपने इस निर्णय पर सोचना होगा!"


गुड्डो यानि गरिमा की बड़ी दीदी प्रतिमा ने उसे समझाने की कोशिश की जो खुद एक सफल वैवाहिक जीवन जी रही थी। कदाचित उसे गरिमा के दर्द का पता तो था लेकिन एहसास नहीं था। जो दर्द गरिमा झेल रही थी , वह दर्द बोलकर बताने से भी कोई ठीक से कभी नहीं समझ सकता था।


गरिमा ने दोनों की बात ध्यान से सुनी फिर धीमे लेकिन किंचित दृढ़ स्वर में कहा,


"मैं हमेशा से यही बातें सुनती आई हूँ और आप दोनों की बात मानती भी आई हूँ। पर अब मैं आपको अपना दर्द खुलकर बताना चाहती हूँ। गौरव के घर में मेरा अस्तित्व लगभग गौण हो चुका है। मैं पहले बहुत कमज़ोर थी इसलिए उनके चिल्लाने से या धमको देने से डर जाती थी। पर अब मेरा स्वाभिमान बहुत आहत हो चुका है। इसके अलावा अब मेरा एक अस्तित्व है जो मेरी सबसे बड़ी ताकत है। अब अगर मैं और अपमान सहती रही तो यह मेरा खुद के प्रति अन्याय होगा!"


गरिमा की बात सुनकर उसकी माँ तो चुप रह गईं क्योंकि उन्हें अपनी छोटी बेटी के दुख का अंदाजा था पर प्रतिमा ने गरिमा से एक बार फिर पेशकश की,


"ऐसा क्या हो गया इस बार गुड्डो, जो तुने एकदम से गौरव से अलग रहने का फैसला कर लिया। झगड़े, मनमुटाव तो हर पति पत्नी में होते हैं पर हर कोई तलाक तो नहीं ले लेता। तुझे शायद पता नहीं तलाक लेने के बाद लड़कियां आपने मायके में भी इज़्ज़त से नहीं रह पाती और समाज भी उन्हें सम्मान की दृष्टि से नहीं देखता है!"


"प्रतिमा दी! क्या पति पत्नी में झगड़े ऐसे होते हैं कि बार बार पति अपने घरवालों के सामने अपमान करता रहे। यहाँ तक कि उसपर हाथ भी उठा दे…और वो भी एक बार नहीं कई बार!"


बोलते हुए गरिमा की आवाज़ भर्रा गई और वह लगभग रोते हुए बोली,


"ये देखो दी...!"


"ओह... कोई इतनी बेरहमी से अपनी पत्नी को कैसे मार सकता है?"


गरिमा की पीठ, बाँह और यहाँ तक कि शरीर के ढके रहनेवाले हिस्सों जैसे जाँघ पर भी मार के चोट के गहरे निशान देखकर चौंक गई प्रतिमा और भावातिरेक में आगे बढ़कर अपनी बहन को गले से लगा लिया।


थोड़ी देर तक दोनों बहनें यूँ ही एक दूसरे से लिपटी रहीं निःशब्द...!


दरअसल गरिमा का विवाह दो साल पहले हुआ था।


गरिमा का पति गौरव उसे हर तरह से परेशान करता था और उसका बहुत अपमान भी करता था। वह यह सब इसलिए सह रही थी क्योंकि उसे लगता था कि वह कमजोर है। और अगर उसने इस चीज का विरोध किया और गौरव से अलग होने का सोचा तो उसे आगे जीविकोपार्जन के लिए बहुत मुश्किल होगी। क्या पता उसे आगे नौकरी मिले ना मिले। भला इस समाज में सिर्फ ग्रेजुएट को कौन सी नौकरी मिलेगी?


पर जब उसने घर से बाहर कदम रखा तब उसे अपनी ताकत का एहसास हुआ कि क्वालिफिकेशन कम हो लेकिन फिर भी अगर डेडीकेशन हो और इंसान में मेहनत और लगन हो तो उसे उसकी पहचान जरूर मिलती है।


हाँ, शुरुआत में हो सकता है उसकी प्रतिभा को लोग ना पहचाने और उसे कम सैलरी की नौकरी मिले लेकिन बाद में उसकी कार्यक्षमता और ईमानदारी एक तरह से उनकी पहचान बन जाती है और और ताकत भी।


गरिमा ने एक प्राइवेट कंपनी के रिसेप्शनिस्ट पद के लिए आवेदन दिया था। और उसकी ख़ुशी और आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा था ज़ब उसे वहाँ जॉब मिल गई थी। दरअसल स्टार्टअप कंपनी थी इसलिए उन्हें मेहनती और ईमानदार स्टाफ की ज़्यादा ज़रूरत थी। सैलरी ज़रूर कम थी। पर काम करने का माहौल बड़ा अच्छा था और परस्पर सीखने को भी बहुत कुछ मिल रहा था। इसलिए गरिमा बहुत ख़ुश थी।


गरिमा ने घर से बाहर काम करके अपनी उस छुपी हुई ताकत का पता लगा लिया था अब वह समझ गई थी कि उसे किसी से डरने की जरूरत नहीं है। और ना तो गौरव के साथ रहकर जबरदस्ती मार खाकर अपने अस्तित्व को दांव पर लगाने की जरूरत है।


इतना ही नहीं उसने यह भी महसूस किया कि बाहर निकल कर नौकरी करते हुए लोगों की बातों से डरने की जरूरत नहीं है। लोग तो हमेशा बात बनाएंगे जब वह घर में रहकर मार खाती थी तब उसे कमजोर अबला कहते थे अब वह जब नौकरी करने लगी है तो यह कहने लगे हैं कि यह ऐसी लड़कियां घर नहीं चला सकती गरिमा ने दोनों करके देख लिया अब वह समझ गई है समाज में जीना है तो अपने लिए जीना है और अपनी ताकत के भरोसे ही जीना है।


कुछ सोचकर गरिमा ने मां और दीदी की तरफ देखा और कहा ,


"मैं पहले संकोची थी पर अब मैं नहीं हूँ । क्योंकि अब मुझे अपनी ताकत का अंदाजा लग गया है कि मैं क्या कर सकती हूं। इसलिए अब मैं इस बात से नहीं डरूंगी कि मैं एक गलत इंसान के साथ रहने रहने के बजाय उससे तलाक लेकर अलग रहने का निर्णय ले रही हूं!"


गरिमा के स्वर की दृढ़ता उसके निर्णय को और भी मजबूत कर रही थी जिसे उसकी मां और दीदी ने समझा और उसका साथ देना देने का निश्चय किया।


उसके पिता गिरधारी जी ने भी अपनी बेटी के इस कदम को कदम की सराहना की और उन्होंने कहा मैं ऐसा चाहता था तुम्हारे लिए कि तुम ऐसा निर्णय लो लेकिन मैं चाहता था यह ख्याल तुम्हारे मन के अंदर से आए कि तुम्हें अपनी पहचान बनानी है और जब कोई इंसान स्त्री हो या पुरुष अपनी पहचान बनाने की ठान लेता है तो फिर उसको उसके अंदर की ताकत और उसके अंदर की हिम्मत उसका बहुत बड़ा हौसला बन जाती है।


"मुझे तुम पर गर्व है बेटी, कि तुम एक गलत रिश्ते से बाहर निकलने की हिम्मत रखती हो और अपनी पहचान खुद बनाने का जुनून है तुम में। तुम जरुर सफल होगी और जीवन के इस क्षेत्र में भगवान करे तुम्हें आगे एक अच्छा जीवन साथी भी मिले!"


गरिमा के ऊपर उसके पिता जी के आशीर्वाद की वर्षा हो रही थी और उसकी मां ने आगे बढ़कर उसे गले से लगा लिया था कि आज इतना कष्ट सहने के बाद आखिर मेरी बेटी खुली हवा में सांस लेगी और यह उसका अपना निर्णय है।


प्रिय पाठकों,

कई बार रिश्ते गलत जुड़ जाते हैं और निभाना मुश्किल हो जाता है। बात जब स्वाभिमान पर आती है या कोई पुरुष स्त्री पर हाथ उठाता है यह कहीं से भी तर्कसंगत नहीं होता है...!


क्योंकि...अपशब्द कहना अपमानजनक शब्द कहना भी उतना ही बड़ा अपराध होता है...जितना कि किसी को थप्पड़ मारना या किसी पर हाथ उठाना।


हां तो... गरिमा शाब्दिक अपमान के साथ शारीरिक कष्ट भी कह रही थी लेकिन अपनी हिम्मत और ताकत के बल पर उसने अपनी एक अलग पहचान बनाने की ठान ली थी।

अब तो उसका पूरा परिवार उसके साथ था।


और...एक नई सुबह बाहें फैलाए गरिमा का इंतजार कर रही थी। एक स्वाभिमान भरी जिंदगी...जिसमें गरिमा अपने निर्णय खुद लेनेवाली थी और अपने हिस्से का आसमान उचककर छू लेने वाली थी ।


(समाप्त)


नमस्कार

कैसी लगी आपको यह रचना ?

कृपया अपनी प्रतिक्रिया अवश्य दें। आपकी राय मेरे लिए बहुत मायने रखती है।


और आपके सौजन्य और प्रोत्साहन से मेरी लेखनी चलती रहे निर्बाध.... निरंतर...!



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