सुपरहीरो
सुपरहीरो
क्या सुपरहीरो हमेशा केप पहनकर ही आते हैं? और उनकी आँखों में जो नकाब रहता है-- ये सभी भी आवश्यक हैं?
नकाब का तो पता नहीं जनाब,परंतु कभी-कभी उसके पीछे का चेहरा बड़ा ही आम होता है। वह भी इतना अधिक कि हम रोज़ उनको देखते तो हैं परंतु तब तक पहचान नहीं पाते है।और यही नहीं, शायद वह सुपरहीरो आप या हम में से कोई भी हो सकता है।
और इस तरह के सुपरहीरो अपने चेहरे के लिए नहीं बल्कि अपने सुपर कारनामें के लिए जाने जाते हैं। कई बार वे दूसरों की मदद के खातिर कुछ ऐसे अतिमानवीय कारनामे कर जाते हैं-- तभी हमारी नज़र उन पर जाती है और हम क्या करते हैं? झट से वह" सुपरहीरो" वाला लेबल उन पर चिपका देते हैं।
बहरहाल, जाने दीजिए-- ये सब बड़ी- बड़ी ज्ञान की बातें। चलिए आपको एक कहानी सुनाती हूँ। कहानी तो क्या है, बल्कि असली घटना है। आपबीती भी कह सकते हैं आप इसे!
बात कोई चार- पाँच बरस पहली की है।
एक दिन मेरे ससुर जी जब सुबह की सैर करके घर लौट आए थे, तो किसी से बिना कुछ बोले अपने कमरे में चले गए। उनकी बार- बार चाय पीने की आदत थी इसलिए सासु माँ ने उनकी चाय बनाकर मुझे देते हुए कहा,
" रानी, यह चाय अपनी बाबा के कमरे में रख आओ। जब मन करेगा वे पी लेंगे। अभी मुझे खाना चढ़ाना है, फिर चाय न बना पाऊँगी।"
जब मैं चाय लिए बाबा के कमरे में पहुँची तो क्या देखती हूँ कि मेरे बाबा चुपचाप अपने पलंग पर बैठे हुए हैं। वैसे तो कितने ही दफा उनको देखा है ऐसे बैठे रहते हुए, परंतु आज कुछ अजीब सा लगा। ध्यान से देखने पर उस शक की और पुष्टि हो गई कि कुछ तो गड़बड़ अवश्य है।
मैंने पूछा-
" बाबा, कुछ हुआ क्या? सब ठीक तो है न?"
" अरे, रानी माँ, तुम चाय ले आई, वहाँ पर रख दो।" मुझे देखते ही एक फीकी मुस्कान के साथ वे बोले।
चाय रखकर मैंने अपना प्रश्न दोहराया--" बाबा, सब ठीक तो है न?"
" नहीं रे, कुछ नहीं हुआ। ज़रा थक गया हूँ।" कह कर वे बिस्तर पर लेट गए थे।
मैंने उनसे और कुछ नहीं कहा, परंतु रसोईघर में जाकर सासु माँ को बताया कि बाबा का चेहरा कुछ ठीक नहीं लगा मुझे। आप एकबार उनसे पूछ लें।
सासुमाँ ने पूछा तो, बाबा ने उन्हें बताया कि उनके सीने में कुछ दर्द सा है। शायद एसीडीटी होगा। परंतु मैंने तुरंत डाॅक्टर को काॅल किया। डाॅक्टर हमारे पड़ोसी थे और बाबा को भलीभाँति पहचानते थे। उन्होंने कहा,
" एक सारबीट्रेट मँगवा लीजिए और उनसे कहिए कि अपनी जुबान के नीचे उसे रख लें। मैं अभी आता हूँ।"
डाॅक्टर जब घर आए तो, बाबा को जाँचकर उन्होंने उन्हें तुरंत अस्पताल ले जाने की सलाह दी।
जी हाँ, उनका शक सही था। बाबा को हार्ट अटैक आया था। अब अस्पताल में भर्ती करवाने के लिए पैसे चाहिए थे। तो सासु माँ ने आकर मुझसे कहा,
"रानी, उस दिन,मैंने जो पैसे तूझे अलमारी में रखने को दिए थे, वे दे दे।"
मैंने बहुत ढूँढा, परंतु पैसे यूँ गायब थे जैसे चील के घोंसले से माँस गायब हो जाते हैं।
मुझे परेशान देखकर जब सासु माँ ने पूछा कि मामला क्या है तो मैंने उनको बताया कि जिस नीली पाॅलीथीन के बैग में मैंने सारे नोट रखे थे, वे तो मिल ही नहीं रहे हैं।
" नीली पाॅलिथिन?!! कैसा दिखता था।"
मैंने उसका पूरा ब्यौरा बताया।
सासुमाँ ने सुनकर अपना सिर पीट लिया। उन्होंने फालतू समझकर उस बैग को एक दिन पहले ही कूड़े में डाल दिया था। पाॅलिथिन से लिपटा एक गत्ते के बक्से में पूरे दो लाख कैश थे! हे भगवान! सुन कर हम सबने सिर पीट लिया।
खैर, जैसे- तैसे हमने और पैसे जुगाड़कर उस रात को ही बाबा का दाखिला अस्पताल में करवा दिया।
अगले दिन उनको ऑपराशन के बाद खून देने की आवश्यकता हुई तो उस समय अस्पताल के ब्लड बैंक ने बताया कि बाबा के ग्रुप का खून उनके पास है ही नहीं। ब्लड डोनर की आवव्यक्ता है। हम में से किसी का भी ब्लड ग्रुप बाबा के ग्रुप से मैच नहीं करता था।
तभी अस्पतालवालों ने हमें समझाया कि डोनर का ग्रुप कोई भी हो सकता है। दरअसल, बात यह थी कि आजकल सारे अस्पतालों में यह नियम है कि मरीज़ के घर वाले ( या डोनर) एक यूनिट ब्लड डोनेट करेंगे तो अस्पताल के बैंक से एक यूनिट बल्ड निकाला जाएगा। वैसे जितने यूनिटों की ज़रूरत हो उतने ही यूनिट डोनेट करना होगा, जिससे कि ब्लड बैंक में हमेशा ब्लड रिजर्व रहें।
अब हम सब ने बारी- बारी से खून दिया। लेकिन आठ यूनिट ब्लड की जरूरत थी। इसलिए सबके खून देने के बाद भी दो- तीन यूनिट कम पड़ रहा था।
हम सोच विचार में पड़ गए कि अब डोनर कहाँ से लाया छाए।
सासु माँ तो पैसे देकर भी डोनर खरीदने को तैयार थीं।
इसी समय एक लड़का वहाँ पर हम लोगों को खोजता हुआ आया।
जब वह हमारे पास पहुँचा तो हम उसे एकायक पहचान न पाए। फिर उसने हमें बताया कि वह सूरज है जो हमारी सोसायटी में रोज़ कूड़ा उठाने आता है।
हम तो उसे देख कर हैरान हो रहे थे कि रोज़ जो मैले- कुचले बनियान और अंगोछा पहने कूड़ा लेने हमारे घर आता है, वह अभी हमारे सामने खड़ा है। दरअसल ,हमने कभी सोचा ही नहीं था कि उसके पास साफ कपड़ें भी हो सकते हैं! हम उसे उसी वेश में देकने को आदी हो चुके थे।
सासुमाँ नाराज़ होकर बोली--
" सुरज अभी तुम जाओ, हम ज़रा परेशान है। तुमसे बाद में बात करते हैं।"
सूरज ने सकुचाते हुए कहा--" माता जी, एक बार मेरी बात तो सुन लीजिए, ज्यादा समय नहीं लूँगा आपका।"
" हाँ बोलो सूरज। मगर जल्दी।" सासुमाँ आखिर बोली।
" माता जी, मैं आपके घर गया था। वहाँ पर मालूम हुआ कि आप लोग यहाँ पर है--!"
" अरे तुमको हमसे काम क्या है-- वह बोलो न! यह सब सुनने का समय नहीं है हमारे पास!" सासुमाँ अपना धैर्य खो चुकी थी।
सूरज ने अपने बैग में से एक पाॅलीथीन की थैली निकाली। यह वही थैली थी जिसमें मैंने कैश लपेट कर रखा था। हमारी आँखें फटी की फटी रह गई।
" गिन लो, पूरे पैसे सही सलामत है!" विजयी मुस्कान के साथ सूरज बोला।
हमने उसे बहुत धन्यवाद दिया । साथ ही कुछ पैसे उसे इनाम में देने की कोशिश भी की। पर उसने मना कर दिया।
फिर उसने हमसे आग्रह किया कि वह बाबा को खून देना चाहता है।
जब उसने सुना कि उनको खून की जरूरत है, तो वह तुरंत चला आया। और साथ में वह अपने दो तीन दोस्तों को भी लेकर आया है। कहीं किसी काम की जरूरत पड़ जाए तो।
उस दिन उस सूरज की वजह से ही हम बाबा को वापस घर लेकर आ पाए थे। उनका ऑपरेशन भी बहुत सही तरीके से हो गया था।
सासु माँ जाने क्यों सूरज के कारनामे देखकर उसका हाथ पकड़ कर रो पड़ी थीं।
उन्हें रह- रहकर याद आता था कि कुछ दिन पहले ही उन्होंने किसी वजह से सूरज को बहुत डाँट दिया था। परंतु इसके बावजूद भी सूरज ने हम सबके लिए जितना किया, वह सत्रह अठारह वर्ष का लड़का-- हमारे लिए किसी सुपर हीरो से कम नहीं था।
