सुबह का भूला
सुबह का भूला
"अब बस बहुत हो चुका गीता जी आज मै फाइनल डिसीज़न लेकर रहूंगा।"
गीता का हाथ हाथ में लेकर संजीव जी ने अपना फरमान सुना दिया।उनके नथूने गुस्से से फड़फड़ा रहे थे।
"अरे रे काहे को इतना गुस्साय रहे हो ये तो रोज की बात है। कभी वो तुम पर कभी तुम उसपर चिल्लाते ही रहते हो।"
पर आज तो हद ही हो गई बहू भी जवाब देने लगी तुम्हें मुझे बेटे का या अपना नहीं पर तुम्हें अब कोई कुछ कहे मै बरदाश्त नहीं करूँगा। आज शाम को ही दोनो से कहता हूं जाकर अलग रहो देख लो अपना इंतजाम मेरा घर तुम्हारे लिये नहीं है
बहुत हो चुका अब पानी सर के ऊपर जा रहा है।
गीता चुपचाप पति की बातो पर सर हिला रही थी
"अच्छा अच्छा चलो आराम कर लो शाम की शाम को देखी जायेगी "।
बीपी को गोली खाई कि नहीं ?
कमर सहलाते हुऐ पानी ले आई। बड़ी मुश्किल से गुस्सा शान्त हुआ तो गीता सिरहाने बैठकर सिर दबाने लगी
उसके लिये रोज रोज की कहानी थी।
दोनो का गुस्सा तेज था साथ में बिजनेस था अधिकतर ही झांय झांय हुआ करती थी उसे पता था थोड़ी देर में सब शान्त हो जायेगा।
पर ये क्या एकदम से संजीव उठकर बैठे और बोले "बस अब रोकना मत मुझे अभी बाहर करता हूं साले को दिमाग ठिकाने आ जायेगा"
गीता ने रोकने की कोशिश की पर वो कुरता डाल कर दरवाजे तक पहूंचते कि दरवाजा खुदबखुद खुल गया और पोता अन्दर" बाबा जी बाबा जी कहां जा रहे हो मै भी चलुगां आपके साथ "कहकर संजीव से लिपट गया बस फिर क्या था गुस्सा पानी हो गया गोद में उठाकर संजीव बाहर निकलते हुएे बोले "सैर करने जा रहा था मेरा राजा बेटा भी चलेगा ना पर हां तेरे बाप को नहीं ले जाऊँगा l
