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सुबह का भुला

सुबह का भुला

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"है तो आख़िर सौतेली माँ ही " उसके कानों में आवाज़ ऐसे सुनायी पड़ी जैसे किसी ने उसके कानों मे खोलता हुआ पानी डाल दिया हो।

तभी दुल्हन की मामी बोल पड़ी। " तो क्या हुआ दोनों बच्चों को कितना प्यार दिया है इन्होंने सुमित्रा के देहान्त के बाद कितने छोटे थे दोनो, यहाँ तक की अपनी कोख को भी बाँध कर रखा।

सारी उम्र इनको पढ़ाने, लिखाने, सँवारने में गुज़ार दी, हीरे की तरह तराशा है, कभी ये अहसास नहींं हुआ की वो उनकी सौतेली माँ है।

बच्चों ने भी मां समझा है।

"अरे देखो दुल्हन आ गयी है"

सभी की निगाहें उस और उठी।  नमिता ने दुल्हन बनी बेटी को निहार कर अपनी बाहों में भर लिया।

"अरे कोई काला टीका लगाओ मेरी बेटी को कहीं किसी की नज़र ना लग जाएँ " 

माँ ये तो पहले ही काली कलूटी है, भाई ने चिड़ाते हुए कहाँ, वहाँ जमा सभी रिश्तेदार, परिचित ज़ोर से हंस पड़े, माँ ने हल्की सी चपत लगाते हुएँ कहा अरे ,इस समय तो छोटी बहन चिड़ाने से बाज आ"!

 "कितना प्यार बरस रहा था वहाँ कितना ख़ुशी का माहौल था, ख़ुशीयाँ बिखर रही थी।

 "नमिता चलो ज़रा समधी, समधन से मिल लो। "पति की आवाज़ सुन नमिता उनके साथ जाने लगी।  

आज तक इतने समय से वह नमिता के पड़ोसन होने पर भी नहींं जान पायी थी। वह उनकी सौतेली माँ है।  

न जाने क्यों उसे वहाँ ज़रा भी अच्छा नहींं लग रहा था। वह थोडा़ सा जलपान ले शगुन देकर जल्दी ही वहाँ से निकल पड़ी। वापस आकर ड्राइंगरुम में ही सोफ़े पर पसर गयी। उसकी निगाह उस फ़ोटो पर ठहर गयी। जो उसके पति और दो बच्चों की थी। शादी करा कर आयी।

दोनों बच्चे बड़े प्यार से "मां "कह लिपट गये थे और वो न जाने क्यों पहले से जानते हुए भी अचकचा कर बच्चों से थोड़ा दूर हट गयी थी। पिता की मृत्यु के बाद  बढ़ती उम्र को देख बुआ ने उसकी शादी निमेश, से करा दी थी।

निमेश पढे लिखे, अच्छे इन्सान, दौलत, शौहरत पति का प्यार घर मे किसी बात की कोई कमी नहीं, पर न जाने क्यों वह उनको अपना न पायी। बच्चों पर भी ग़ुस्सा कर उनको भी दूर करती रही।  अपनी कोख से अंकुर ना फुटने पर, और ज़्यादा उन पर ज़्यादती करने लगी बहुत समझाने पर भी जब वह ना मानी, तब दोनों बच्चों को उनके पिता ने होस्टल भेज दिया। बड़े होने पर बेटी का विवाह कर दिया। बेटा विदेश मे जा कर बस गया। दोनों के कभी कभी पिता के पास फ़ोन आते रहते है। "अरे तुम कब आयी सब ठीक से होगया। तबियत तो ठीक है यहाँ क्यों बैठी हो चलो उठो सो जाओ "

निमेश की आवाज़ सुन निमेश, की बाँह पकड़ ज़ोर से रो पड़ी।

"मुझे माफ़ कर दो निमेश, अगर मैं चाहती तो मेरा घर भी नमिता की तरह खुशियों से भरा होता। "


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