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Babita Consul

Drama Tragedy


5.0  

Babita Consul

Drama Tragedy


सीता की अग्निपरीक्षा

सीता की अग्निपरीक्षा

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''आख़िर कब तक खाना नहीं खाओगी, जब पेट में आग लगेगी तो अपने आप सीधी हो जाओगी।”


कर्कश आवाज़ में कह महिला पुलिस ने उसके सामने थाली रखी और वहाँ से चली गयी।


शारदा नीमा के पास बैठ गयी, उसे देखने लगी। उस अंधेड़ उम्र की औरत जो सभी कैदी महिलाओं की प्रमुख बनी हुई, सबके झगड़े सुलझा रही थी। सहानुभूति से देखता देख नीमा सिसकियाँ भरने लगी। आँखों से दर्द का सैलाब आँसू बन बह निकला।


शारदा ने प्यार से उसके कन्धे पर हाथ रख दिया।


”बेटी कब तक रोती रहोगी, कुछ खा लो, क्या बात है ? क्या हुआ था.....?”


सहानुभूति के शब्द सुन, नीमा जैसे फूट पड़ी थी! सिसकते हुए बोली,

“जब मै बारह बरस की थी, माँ बापू के देहान्त के बाद मैं चाचा जी के साथ रहनें लगी थी। चाचा, चाची का व्यवहार कुछ समय तो ठीक रहा, बाद में मेरी पढ़ाई छुड़वा कर घर के काम कराना शुरू कर दिया। हर बात में दोष निकाल कर मारना-पीटना शुरू कर दिया। एक दिन चाचा मुझे शहर में एक घर में छोड़ गये। मैं वहाँ घर के सभी कार्य करती। वही एक कोने में जगह मिलने पर सो जाती। चाचा हर मास आ कर मेरी पगार के पैसे ले जाता था। मालिक-मालकिन का व्यवहार बहुत अच्छा था।


मालकिन ख़ाली समय में मुझे पढ़ाती भी थी। सब ठीक चल रहा था। एक दिन मालकिन के भाई घर पर आये। जब रात में मालिक, मालकिन शादी में गये हुए थे, मालकिन के भाई ने मेरे साथ ज़ोर ज़बरदस्ती करने की कोशिश की। बहुत छुड़ाने पर भी जब वह नहीं माना तो मैने पीतल के फूल दान को उसके सिर में मारा और मारती ही चली गयी। तीन दिन से मैं पुलिस को बता बता कर थक गयी हूं। पर वो है कि मान नहीं रही है।

और सारी गलती की जिम्मेदारी मेरी ही बता रही हैं। और मुझे पीटा जा रहा है। जब तक नहीं बताओगी तब तक तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार किया जायेगा। यही कह मुझे प्रताडित कर रही है। खुन के अपराध मे मै यहाँ हूँ।”


नीमा ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। शारदा की आँखों से आँसूओ की धार बह निकली। उसने नीमा के सिर पर हाथ रखा। 'एक और शारदा’ अनजान सफर मे...! सीता मैया के पवित्र होने पर भी लोगों की शंका दूर करने के लिए भगवान राम ने सीता की अग्निपरीक्षा ली थी।


पर अब कलयुग में न जाने कितनी सीता को लोगों की ग़लत मानसिकता के कारण अपने आप को बचाने के लिए या तो आत्महत्या  कर रही है। या फिर अपने बचाव करनें पर उनको यहां तक आना पड़ता है।

आज भी वो इसी तरह अग्निपरीक्षा देती रहेगी।

क्या यही न्याय है, क्या यही न्यायोचित निर्णय की व्यवस्था है? भर्राई हुई आवाज़ उसके मुख से निकल पड़ी।


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