सुबह का भुला

सुबह का भुला

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'सदा सुहागन रहो। सुनिधि बेटा तुम्हारी जो भी मनोकामना हो ईश्वर उसे पूरा करें।' मंदिर के पूजारी जी बड़े ही प्रेम से कहते हैं, क्योंकि 12 साल हो गए हैं। सुनिधि को मंदिर आते हुए और घंटों बैठे-बैठे, न जाने क्या वो ईश्वर से मांगती रहती है? न किसी से कुछ पूछती है और न ही किसी को कुछ बताती है।

पंडित जी की बात सुनकर सुनिधि कहती हैं कि' पंडित जी बस उन्हीं का आसरा है।' और वहाँ से चली जाती है।

रोहन मैंने तुम्हें कितनी बार मना किया है कि तू अपने भाई के कमरें में मत जाया कर पर तुझे तो बस अपने मन की करनी होती है। माँ की बात सुन-सुनकर ही रोहन इतना बड़ा हुआ था। घर में सभी जानते थे कि सुनिधि अपने बड़े बेटे रोहित को कितना प्यार करती थी, लेकिन बारह साल पहले एक छोटी-सी बात पर न जाने वो कहाँ चला गया। बहुत खोजा गया, पुलिस में रिपोर्ट लिखवाने का भी कोई फायदा नहीं हुआ।

बस तब से एक माँ अपने बेटे के आने का इंतजार कर रही है।

माँ की बात सुनकर रोहन कहता है कि ' माँ मैं तो बस भईया के कमरे की सफाई करवा रहा था।' क्या! मैंने तुम्हें और सुनिधि बेहोश हो जाती है।

रोहन तुरंत माँ को हस्पताल लेकर जाता है क्योंकि सुनिधि एक महीने में ये चौथी बार बेहोश हुई थी और डाक्टर ने पहले ही बोल दिया था कि ये इनके लिए जान लेवा हो सकता है।

रात के दो बजे सुनिधि को होश आता है और वह वहाँ अपने पति रमेश के अलावा एक ऐसे शक्स को देखती है जो उससे रोज़ मिलता था, पर कुछ कहता नहीं था। उसे देखकर सुनिधि अपने बड़े बेटे की याद में खो जाती हैं कि आज वो भी ऐसा ही होता पूरे 26 का हो गया होता। यहीं सोचते - सोचते सुनिधि को नींद आ गयी थी।

माँ - माँ मैं आपका रोहित, आप उठो न। ये आवाज बहुत ही हल्की-फुल्की सुनिधि के कानों में जा रही थी, और वो अपनी आँखें खोलना चाह रही थी, पर वो फिर से बेहोश हो गयी। डाक्टर ने बताया कि अगर इन्हें जल्दी होश नहीं आया तो ये कोमा में जा सकती है।

पूरे पंद्रह दिनों के बाद सुनिधि को होश आया था और उसके बारह साल की तपस्या ईश्वर ने पूरी कर दीं थी। वहीं घर के सभी लोग रोहित को पाकर बहुत खुश थे। सुबह का जो भुला था वो शाम होते - होते घर लौट आया था।


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