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Shailaja Bhattad

Inspirational

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Shailaja Bhattad

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सरहद पर बसंत पंचमी

सरहद पर बसंत पंचमी

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"माँ, लेकिन पिताजी न तो पकवान खा पाएँग, न हमारी तरह उत्सव का आनंद ही ले पाएँगें।" उदास मन से शीतू ने अपनी माँ से कहा। "क्या पिताजी कुछ दिनों के लिए घर नहीं आ सकते?"

 "नहीं, शीतू बेटा, अभी तुम्हारे पिताजी को छुट्टी नहीं मिल सकती। पिताजी की आवश्यकता हमसे ज्यादा सीमा पर है।"

 "लेकिन एक साल हो गया माँ, पिताजी अभी तक एक बार भी नहीं आए।" विचलित मन से शीतू ने कहा। 

"जानती हूँ, लेकिन क्या कर सकते हैं? 

"क्या कर सकते हैं? माँ, हम बहुत कुछ कर सकते हैं।" चहकते हुए शीतू ने कहा मानो उसे अलादीन का चिराग मिल गया हो। 

"माँ, इस बार ज्यादा मिठाई बनाओ। मैं भी पतंग और हर्बल रंग बाजार से लेकर आती हूँ। पिताजी नहीं आ सकते तो क्या हुआ? हम तो उनके पास जा सकते हैं।हम पिताजी के साथ एक दिन तो बिता ही सकते हैं न माँ?"

"हाँ, विचार अच्छा है। इस बार की बसंत पंचमी हम सरहद पर सभी सैनिकों के साथ मना सकते हैं, बस तुम्हारे पिताजी से फोन पर एक बार पूँछ लेती हूँ।" कहकर माँ अंदर चली गई।

इधर शीतू एक दिन की योजना बनाने लगी, "सुबह बसंत पंचमी मनाएँगे।दोपहर में होली खेलेंगे और शाम को पतंग उड़ाएँगे। बहुत मजा आएगा।" प्रफुल्लित मन से शीतू बाहर अपने सभी मित्रों को बताने चली गई।


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