सपने
सपने
नन्ही-नन्ही आंखों में सपने संजोए मैं बढ़ती रही हर रुकावट पर सपना मुस्कुरा कर मेरी कलाई पकड़ कर अपने आगोश में भर लेता और मैं मुस्कुरा कर उसके संग चलती रही, स्कूल से कॉलेज और फिर दूसरे घर चली गई अब सपना आगे से मेरे पीछे हो गया हर रुकावट पर पीछे से आवाज देता और मैं ठहर जाती फिर संभलकर चलने की कोशिश करती रही, समय जैसे जैसे आगे बढ़ता गया संभलने की क्षमता भी कम होती गई।
सपना आवाज देता मैं अनसुनी करने लगी रुकावटें सपनों से अधिक बड़ी लगने लगी उसकी पुकार को आंसू में बहाकर सिसकती रही, बीतते गए दिन मैं उससे पीछा छुड़ाने लगी तेज कदमों से चलते हुए उससे दूर भागने लगी अब वो भी थककर मुझसे ओझल होने लगा और मैं खुद को भूल दूसरों में खोने लगी अब सपना था नहीं तो रुकावट भी जिम्मेदारी लगने लगी हाँ !
जिम्मेदारी की भंवर में फंसती रही, लगे रहते पंख जिम्मेदारी के भी एक-एक करके उड़ने लगे थकी-थकी आंखों से उसे उड़ते देख मैं भी मुस्कुराने लगी और भूली हुई खुद को मैं खुद में ही ढूंढने लगी आंखों पर लगा चश्मा को हाथों से संभाल कर अपना चेहरा आईने में देखने लगी क्या यही मैं हूँ ?
ये सोचने लगी तभी पीठ थपथपाई किसी ने धुंधली हो रही उस चेहरे को पहचानने की कोशिश करती रही, निस्तेज आंखें, होंठ सूखे लड़खड़ाता हुआ कुछ इशारा दे रहा था मैं उसके इशारों को समझने की कोशिश करने लगी हर इशारों पर अतीत के पन्नों को पलटने लगी एक-एक करके पलटती रही।
अतीत के पन्नों से नन्ही नन्ही आंखें और उन आंखों में तैरती हुई आकृति दिखाई देने लगी शायद यही है जो आज मेरे सामने खड़ा है हाँ, हाँ यही तो है वह मुस्कुराने की कोशिश करने लगा पहचान गए मुझे ?
उसने पूछा हाँ ! पहचान गई, पर अब क्या ? अब तो कोई संभावना नहीं क्यों मेरे सामने आ गए ? वह हँसकर मेरा हाथ पकड़ लिया और प्यार से सहलाते हुए कहा इस सपने को छोड़ो मैं तुम्हें उस सपने से रूबरू कराता हूँ जो तुम्हारी आंखों में नहीं तुम्हारी भावनाओं ने बुना है जो इस उम्र में परिपक्व हो चला है अपने अनुभव का रंग भरो और अपनी पहचान करो मैं उसके हाथों में हाथ डाले उस अद्भुत, परिपक्व, प्रकाश को अपलक निहारने लगी और बढ़ा दिया कदम उस ओर जिसे आज तक अंदर दफन करती रही।
