Kishan Dutt Sharma

Inspirational


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Kishan Dutt Sharma

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सपना

सपना

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ज्ञानियों का अनुभव कहता है कि यह संसार एक सपना है। यह संसार सपने की भांति स्वप्नवत है। सपना अर्थात ऐसी घटना जो हमें प्रेक्टिकल साकार में होती हुईं सी प्रतीत तो होती है पर वैसी वह होती नहीं। सपने में वह असली होती हुई महसूस तो होती है पर जैसे ही सपना टूटता है उसका अस्तित्व दिखाई नहीं देता। सपना अर्थात जो क्षण क्षण में बदल जाए, क्षण में लोप हो जाए। सपना अर्थात जिसका कोई स्थायित्व नहीं होता। जो सदाकाल रहने वाला नहीं है।

सपनों पर बहुत वैज्ञानिक अध्ययन हुए हैं।मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि पूरी दुनिया में एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो नींद के दौरान सपने नहीं देखता हो। क्योंकि अर्धनिद्रा के समय हमारा अवचेतन मन सक्रिय रहता है। पूरे आठ घंटों की नींद के दौरान प्रगाढ़ नींद (पूर्ण नींद) तो केवल कुछेक मिनट की ही रहती है। जिसे हम नींद से बैटरी रिचार्ज होना कहते हैं वह इसी समय के दौरान होती है। बाकी के समय अर्धनिंद्रा की स्थिति ही होती है। अर्धनिंद्रा की स्थिति अर्थात जब शरीर तो स्थिल (टोटल रिलैक्स्ड) है लेकिन अवचेतन मन सक्रिय है। प्रगाढ़ (पूर्ण) निंद्रा अर्थात जब शरीर और मन दोनों स्थिल हैं। इस वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार यह पाया गया कि प्रत्येक व्यक्ति नींद के दौरान सपने देखता है। उसे देखे गए सपने याद नहीं रहते, वह बात अलग है। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ज्यादातर मनुष्यों को केवल वे ही सपने याद रहते हैं जो ठीक उनकी नींद से जागने से पहले देखे गए होते हैं, बाकी सभी देखे गए सपने उसे भूल जाते हैं। बहुतों को कुछ भी एक भी सपना याद नहीं रहता।

स्वप्नों का विषय बहुत ज्यादा विस्तृत है। स्वप्नों का यह विषय हमारी गहरी नींद से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए भी और ज्यादा विस्तृत हो जाता है। यह सपनों का विषय हमारी कार्य शैली, हमारी सोच और हमारी सृजनात्मकता से भी जुड़ा हुआ है। इसलिए और भी ज्यादा विस्तृत हो सकता है। लेकिन सपने के इस विषय को हम यहां केवल संक्षेप में वर्णन कर रहे हैं। चलते चलते मनुष्य यह भूल जाता है कि मनुष्य जीवन में कितने प्रकार की आसक्तियों को पक्का करता जाता है। इसलिए इस संक्षिप्त लेखन का मूल उद्देश्य हमारा सिर्फ इतना है कि हम सभी इस भौतिक अभौतिक, विनाशी अविनाशी, परिवर्तनशील और अपरिवर्तनशील को एक बार फिर से बोध (रियलाइज) हो जाए ताकि हमारी अनेक प्रकार की आसक्तियों को हल्की होने में सुविधा हो सके।

उन ज्ञानियों ने जिनकी भी अन्यान्य प्रकार की साधनाओं के द्वारा अज्ञान की नींद टूटी उन्होंने ततक्षण यह अनुभव किया और कहा कि यह समूचा संसार भी एक सपने से ज्यादा नहीं है। अज्ञानता में यह हमें भासता अवश्य है कि यह सपना नहीं है। यह तो सदा चलने वाला स्थायी व अविनाशी लगता है। लेकिन जब अज्ञान की नींद से आत्मा जागती है, अर्थात सर्व प्रकार के मानसिक व भौतिक आवरणों से ऊपर उठती है तो उसे सूक्ष्म और स्थूल, क्षण भनगुर और शाश्वत का सही अर्थों में अनुभव होता है। हम जिन्हें आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त है वे अपने स्वयं को जिन अर्थों में ज्ञानी कहते हैं उसका भावार्थ बिल्कुल दूसरा है। उसे हम एक प्रकार से थियोरियिकल नॉलेज भी कह सकते हैं। यह थियोरिटिकल नॉलेज भी सबको नहीं होती।* 

रोज रात हम सपने देखते हैं। वे बन्द आंखों से देखे गए सपने होते हैं। जो संसार बाहर भौतिक जगत का है उसे ज्ञानियों ने खुली आंखों से देखा हुआ सपना कहा है। सपने दोनों ही हैं - एक खुली आंखों से देखा हुआ सपना और दूसरा बन्द आंखों से देखा हुआ सपना। कोई यह तर्क कर सकता है कि खुली आंखों से देखा हुआ यह सब मात्र एक सपना कैसे हो सकता है? नहीं, यह नहीं हो सकता। खुली आंखों से तो जो कुछ हम देखते हैं वह हकीकत है, वह सत्य है, वह कोई सपना थोड़े ही है। जो सपने केवल बन्द आंखों से बेहोशी में ही देखे जाते हैं उन्हें ही सपने कह सकते हैं। इसपर विचार करें।

दोनों ही प्रकार के सपने एक अर्थ में सच तो होते हैं पर वे क्षण भांगुर होते हैं। वे जितने समय होते हैं उतने समय सत्य होते हैं। जो भी होता है चाहे वह क्षणिक हो या दीर्घकाल का हो, चाहे सुखद हो चाहे दुखद हो, चाहे सूक्ष्म या स्थूल में घटित होता हो, उसे हम निखालस झूठ नहीं कह सकते। वह एक अर्थ में सच भी है। उसे कह सकते हैं कि वह अभी अभी है और अभी अभी नहीं है। जो क्षण भंगुर है वह सपना है। लेकिन दोनों ही प्रकार के सपनों में दो प्रकार की एक जैसी समानता होती है। सपना टूटने का अंतिम परिणाम एक जैसा होगा। आपका सपना केवल आपका सपना है, आपके सपने के अनुभव में दूसरा कोई प्रवेश नहीं कर सकता।

पहली समानता - जब बन्द आंखों से देखा हुआ सपना टूटता है आप अपने को वहीं का वहीं, वैसे का वैसा ही, वैसी की वैसी पूर्ववत अवस्था में ही पाते हो। आप ठिठक कर अवाक रह जाते हो कि अरे यह क्या...आप पाते हैं कि आपके जीवन पर आपको उस देखे गए सपने का रत्ती भर भी कुछ फर्क अनुभव नहीं होता। एक सेकंड में सब कुछ बदला हुए अनुभव होता है। और एक सेकंड फिर वैसा का वैसा ही लगता है। ठीक वैसे ही जब भौतिक शरीर त्याग करने के बाद यह भौतिक संसार का खुली आंखों से देखा हुआ सपना टूटता है तब भी आत्मा ठिठक कर अवाक रह जाती है। एक सेकंड सब कुछ बदला हुआ अनुभव होता है। ऐसे कि जैसे सपने देखते देखते नींद टूट गई हो। तब अनुभव होता है कि जो अतीत था वह जैसे कि खुली आंखों से देखा हुआ सपना था, जो अब कहीं नहीं है। 

दूसरी समानता - बन्द आंखों से देखे जाने वाले सपने में आप दूसरे किसी भी व्यक्ति को निमंत्रण देकर अपने पास नहीं बुला सकते और यह नहीं कर सकते कि मेरा सपना कितना सुखद सुहावना है, आइए आप भी आइए मेरे सपने में शामिल हो जाइए। या मेरा सपना कितना दुखद है, आप जरा आकर देखिए तो सही। आपका सपना सिर्फ आपका सपना है। उसमें दूसरा कोई भी दस्तक (एंट्री) नहीं दे सकता। कोई भी दूसरा उसका अनुभव नहीं कर सकता। ठीक उसी प्रकार से खुली आंखों से देखे हुए सपने की बात भी वही है। वह सपना भी सिर्फ आपका ही, नितान्त आपका ही सपना है। आपके जीवन के अनुभव में दूसरा कोई प्रवेश नहीं कर सकता। प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में जो अनुभव करता है वह भी केवल वही कर सकता है, उसके अनुभव को कोई दूसरा नहीं कर सकता। उसके इन्द्रिय या अतिंद्रिय अनुभवों में कोई भी दूसरा प्रवेश नहीं कर सकता। इसलिए दोनों प्रकार के सपनों में ये दो प्रकार की समानता है। 

उपरोक्त विवेचन से आपको शायद बहुत जटिल लग रहा होगा। लेकिन यह सिर्फ समझने की बात है। इसे सिर्फ समझना है कि यहां सब कुछ परिवर्तनशील और अस्थाई है। कुछ भी सदा काल के लिए नहीं रहता। यदि इस संसार में हमारा आना हुआ है तो इस आने को बेहतर से बेहतर बनाएं और किसी भी प्रकार की आसक्ति से मुक्त रहें। इस भौतिक संसार में अनुभव होने वाले सभी अनुभव अगर सचमुच में सपना की भांति ही दिखाई दे जाएं तो हमारी देखने की दृष्टि बदल जाएगी। हमारे कार्य करने का अंदाज बदल जाएगा। हमारे होने का ढंग बदल जाएगा। हम वही वैसे ही व्यक्ति नहीं रह जाएंगे जो जैसे पहले हुआ करते थे। हमारे अंदर एक नई चेतना का अभ्युदय होगा। विकार आदि तो ना जाने कहां छू मंतर हो जायेंगे, पता ही नहीं चलेगा। तब संस्कार तो होंगे लेकिन संस्कारों में इतनी सहजता होगी कि किसी भी प्रकार के विकार के मन मंदिर में आने की हिम्मत ही नहीं होगी। जब पृथ्वी पर रहने वाली सभी आत्माएं अनासक्त होंगी तभी से सही मायने में सतयुग की कार्यशैली प्रारंभ होती है। उससे पहले वैसा होना संभव नहीं है।


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