सफलता
सफलता
मानव जीवन में कुछ चीजें भाग्यवश मिलती हैं , कुछ विरासत में मिलती हैं , कुछ खुद से अर्जित करनी पड़ती हैं और कुछ चीजें सौभाग्यवश मिलती हैं । मेरी सफलता , उपलब्धियां जो मुझे हासिल हुई है यह सौभाग्यवश मिली है ।
सैन्य जीवन की बहुत सी यादें हैं , बहुत सारे उपहार हैं , पुरस्कार हैं । हर साल तरह-तरह की प्रतियोगिताओं का आयोजन होता रहता है जिसमें हिस्सा लेकर बहुत सारे पुरस्कारों से सम्मानित की गईं हूं । कमांडिंग आफिसर , ब्रिगेडियर , कोर कमांडर और ड्यू कमांडर की पत्नियों के द्वारा मिला है मुझे । 1994 में मैं ब्रिगेड स्कूल में थी तब मेरा स्कूल प्रथम स्थान पर आया था और 50,000 का चेक मिला था चुकी प्रिंसिपल की ड्यूटी मैं कर रही थी इसलिए मैंने ही रिसिव किया था । फिरोजपुर कैंट से ही मेरा जीवन नया मोड़ लिया था । बूझती हुई लौ फिर से रौशन मान हो गई और मेरे जीवन में अप्रत्याशित ऊर्जा का संचार होने लगा था । उसके बाद से जो शुरू हुआ सफ़र सो निरंतर अपने गति से चलता रहा 2012 का 12 जून का दिन मेरे जीवन का सबसे बड़ा दिन साबित हुआ । शंकर विहार के "आवा " ( आर्मी वाइव्स वेलफेयर एसोशिएशन ) में एक कार्यक्रम आयोजित किया गया था । महीने में एक मीटिंग तो तय ही रहती थी बाकी किसी भी विशेष परिस्थितियों में एक घंटे की नोटिस में भी आयोजित किया जाता है । लेकिन यह कार्यक्रम सुनियोजित थी । यूनिट फिल्ड में प्रस्थान करने वाली थी । वहां सिर्फ सैनिकों को ही जाना था । परिवार कुछ दिनों तक वहां रह सकते थें फिर उन्हें सेपरेट क्वाटर में शिफ्ट होना था या फिर जिनके बच्चें बहुत छोटे-छोटे थें वो शहर में अकेली नहीं रहना चाहती हैं तो उन्हें अपने घर जाना था । यूनिट मूव करने से पहले सैनिकों की पत्नियों को कुछ जरूरी निर्देश , कुछ नियम , कुछ सावधानियां और आपातकाल में उन्हें मिलने वाले सरकारी लाभ और सहायता के बारे में जानकारी दी जाती है । यूं तो यह कार्यक्रम महिलाओं के लिए महिलाओं द्वारा ही आयोजित और संचालित होती हैं लेकिन कुछ तकनीकी जानकारी देने के लिए समय-समय पर सैनिकों को भी आमंत्रित किया जाता है । इस बार यह जिम्मेदारी सुबेदार मेज़र अंजनी साहब को दी गई थी । स्वाभाव से बहुत शर्मीले , अंतर्मुखी और सीमित शब्दों में वार्तालाप करने वाले अंजनी साहब के लिए यह बहुत बड़ी चुनौती थी । महिलाओं से कोसों दूर रहने वाले अंजनी साहब को लगभग पांच छः सौ महिलाओं का सामना करना था और बैठना भी आठ दस सेना अधिकारी की पत्नियों के साथ था 90 मिनट का यह कार्यक्रम बहुत भारी लग रहा था लेकिन सैन्य जीवन में अनुशासन का सर्वाधिक महत्त्व है । आदेश का पालन तो करना ही था सो किया । कार्यक्रम से पहले बता दिया गया था किन किन विषयों पर क्या क्या बताना है और आखिरी में दो शब्द आवा की "प्रमुख प्रभारी " (हेड इंचार्ज ) के लिए बोलना था ।
नियत समय पर रेजिमेंट की सभी महिलाएं पहुंच गयी और उनके पतियों के रैंक के हिसाब से निर्धारित किए गए स्थान पर विराजमान हो गई । मैं भी अपनी बेटी के साथ अपने स्थान पर बैठ कर प्रतिक्षा करने लगी । कमांडिंग आफिसर की पत्नी के साथ सुबेदार मेज़र अंजनी कुमार साहब पधारे । अभिवादन के लिए हम सभी खड़े हुए और आदेश मिलते ही बैठ गये । सुबेदार मेज़र साहब के संक्षिप्त परिचय के बाद कार्यक्रम शुरू हुआ प्रोजेक्टर के माध्यम से उन्होंने भली भांति सैनिकों की पत्नियों का अधिकार , मिलने वाली सुविधाओं और सुरक्षा के लिए उचित निर्देश दिया । अब वक्त आया समापन से पहले आवा की प्रमुख प्रभारी के बारे में दो शब्द कहने का ताकि बाकी सैनिकों की पत्नियों को प्रेरणा मिलें और अदम्य साहस का परिचय देते हुए अपने परिवार का पालन-पोषण कर सकें उन हालातों में जब सैनिक देश के सीमाओं पर तैनात होने जा रहें हैं । जितना कठिन होता है सैनिकों का जीवन उससे कम चुनौतियों से भरा नहीं होता उनकी पत्नियों का जीवन भी । पति दिन रात बारूद के ढेर पर बैठा हो और बच्चों की परवरिश , सास ससुर की जिम्मेदारी और रिश्तेदारों के साथ रिश्तेदारी सब कुछ अकेले ही संभालना होता है । ऐसे कठिन वक्त में सिर्फ एक ही चीज उनकी मदद करती है वो है उनका "आत्मविश्वास और हिम्मत" यही मकसद था इस कार्यक्रम का ।
इस कार्यक्रम के आखिरी चरण में जब सुबेदार मेज़र अंजनी साहब ने आवा की प्रमुख प्रभारी के सम्मान में दो शब्द बोलने के लिए मुंह खोला और बोलना शुरू किया तो बोलते ही चले गए .... मेरे तो जैसे कान ही बंद हो गये थें ... कुछ निगाहें मुझ पर ही अटक गई थी और तालियों की गड़गड़ाहट , विडियो रिकॉर्डिंग और लगातार खींचे जा रही तस्वीरों का क्लीक क्लीक का शोर भी विचलित नहीं कर सका सुबेदार मेज़र साहब ने शायद अपने जीवन में पहले कभी इतनी प्रशंसा किसी की नहीं की थी । किसी को सराहना तो दूर की बात थी किसी की काबिलियत को स्वीकारना भी उन्हें गवारा नहीं था । शब्दों के तो ऐसे कंगाल थें कि थैंक्यू तक नहीं कहते थें कभी व्यवहारिक जीवन में । और आज पूरे समाज के सामने इतनी प्रशंसा की ...! हैरानी तो मुझे भी बहुत हुई बीस सालों का सारा लेखा-जोखा सैन्य जीवन में मेरे योगदान और पुरस्कार से लेकर मेरे व्यक्तिगत जीवन के बारे में भी कितना कुछ कहा था । वो शब्द आज भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं कि आज यहां मैं जो पहुंचा हूं वो सिर्फ उनके सहयोगात्मक व्यवहार , साकारात्मक सोच , उत्तम विचार और उच्च कोटि का साहस के बदौलत ही संभव हुआ नहीं तो "मैं शहिद हो चुका होता या घर वापस लौट चुका होता ।" इसके बाद मेरे सब्र का पैमाना छलकने लगा । ठीक मेरे सामने खड़े थें सारी महिलाएं खड़ी हो चुकी थी मैं अकेली जड़वत बैठी रही । मुझे बिल्कुल भी ऐसी उम्मीद नहीं थी । किसी भी पत्नी के लिए यह बड़े सौभाग्य की बात है कि एक सार्वजनिक मंच पर उसका पति उसकी प्रशंसा करे उन सूचियों के साथ जिसमें अंकित हो उनके योगदान ।
यही थी मेरी सबसे बड़ी और आखिरी उपलब्धि क्योंकि पति से बड़ा और महत्वपूर्ण रिश्ता नहीं है मेरे लिए और आज जो कुछ भी इन्होंने बोला था उसके बाद बाकी कुछ रहा ही कहां .....?
दुनिया में और कोई भी रिश्ता मेरे लिए मायने नहीं रखता । कॉलेज लाइफ से लेकर पारिवारिक और सामाजिक जीवन भी बहुत सम्मानित रहा है । सब कुछ हासिल हो चुका है मुझे । बहुत खुशनसीब हूं । मैंने जो कुछ चाहा जैसा चाहा और जब चाहा ठीक वैसे ही उसी वक्त मिला है । एक बेहतरीन जीवन बसर किया है मैंने । यह भी सच है कि मैं उस पुरस्कार और सम्मान की अधिकारी हूं लेकिन एक बात जो मैं कभी भूल नहीं सकती कि गोल गोल रोटी बनाना मुझे मेरे पति सुबेदार मेज़र अंजनी कुमार साहब ने सिखाई थी । रिटायरमेंट के बाद उन्हें एक विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया 15 अगस्त 2018 को उन्हें आनरी मिली । अभी तक जूनियर कमिशंड आफिसर्स की श्रेणी में थें और अभी रिटायर्ड आर्मी आफिसर कहलाते हैं ।
