Neeraj pal

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संतोष वृत्ति

संतोष वृत्ति

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एक राजा के यहां प्रजा बहुत सुखी थी। धर्म का पालन करती थी। कोई भी किसी दूसरे की चीज नहीं लेता था। परंतु धीरे-धीरे समय बदला और एक समय वह आया कि चोरी -लूटपाट और यह सब जो बुराइयां थीं ,उसके राज्य में फैल गई। राजा की समझ में यह नहीं आ रहा था ऐसा क्यों हो रहा है। जबकि राजा का सारा काम सुचारू रूप से चल रहा था। जब उसकी समझ में कुछ नहीं आया तो जैसी प्रथा थी कि वह अपने गुरु के आश्रम पर चला गया। उनके सामने हाथ जोड़कर अपनी शंका रखी, तो गुरु ने कहा कि मैं तो वैसे ही तुम्हारे यहां आने की सोच रहा था। ऐसा करो परसों मैं तुम्हारे यहां आऊंगा, तब तुम्हारे प्रश्न का उत्तर दूंगा परंतु तब तक कुछ प्रबंध करने पड़ेंगे।

राजा ने कहा कि महाराज आप आज्ञा दीजिए। उन्होंने कहा कि तुम ऐसा करना 40 कुत्तों को इकट्ठा करवा लेना और 60 बकरियां मंगवा लेना। उनको 1 दिन तक भूखा रखना और साथ में 60 कुत्तों का भोजन और 40 बकरियों का भोजन एक-एक कमरे में इकट्ठा करवा लेना। गुरु ने जैसा बताया था वैसा ही किया। गुरु उसी दिन आए और उनसे बोले कि भाई प्रबंध कर दिया या नहीं। राजा ने कहा- जैसा आपने कहा था मैंने 60 कुत्तों का भोजन और 40 बकरियों का भोजन अलग-अलग कमरों में रखवा दिया है।

उनके गुरु बोले कि अभी तो मैं कुछ काम से जा रहा हूं तुम ऐसा करो कि इन 40 कुत्तों को उनके भोजन वाले कमरे में छोड़ दो और 60 बकरियों को 40 बकरियों के भोजन वाले कमरे में छोड़ दो।फिर मैं आता हूँ तब तुम्हारे प्रश्न का समाधान करूंगा।वह कहीं चले गए। दो-तीन घंटे बाद आए बोले कि चलो राजन। अब उन कुत्तों और बकरियों को देख आएं।

पहले वह कुत्ते वाले कक्ष में झांके तो देखा कि भोजन चारों तरफ बिखरा पड़ा है। सारे कुत्ते लहू-लुहान हो रहे हैं। ना किसी ने भोजन खाया, लेकिन सब पड़े हैं। गुरुजी ने कहा कि चलो दूसरे कमरे में देखते हैं। वहां देखा कि सारा भोजन समाप्त हो गया है।

सब बकरियां बैठ कर आराम से एक -दूसरे से सटकर प्रेम से आराम कर रही हैं। उनके गुरु महाराज ने बताया कि देखो यह बकरियां हालांकि 60 थीं ,40 का भोजन था, लेकिन संतोषी थीं। जितना मिला उसी में तृप्त होकर आराम कर रही थी, शांति से हैं और दूसरे कमरे में हालांकि 40 ही कुत्ते थे भोजन 60 का था ,परंतु सब यह चाहते थे कि सारा भोजन मुझे मिल जाए। इसी कारण से सब आपस में लड़ते- लड़ते लहू-लुहान होकर पड़े हैं। वह असंतोष की वृत्ति है।

तब गुरुजी ने कहा -"तुम्हारे राज्य में यह स्वान वृत्ति अधिक बढ़ गई है। सब लोग संतोष छोड़कर असंतोषी हो गए हैं। इसी कारण यह सब हो रहा है।

हमारे समाज की भी आजकल यही दशा है। सब यह चाहते हैं कि जो कुछ है मुझे मिल जाए। संतोष प्राप्त करने का एक ही तरीका है। कि अपनी इच्छाओं पर विजय प्राप्त कर लें। इच्छाएं उठना तो हम नहीं रोक सकते ,लेकिन यह अवश्य कर सकते हैं कि अपनी इच्छाओं को प्रभु के चरणों में अर्पित कर दें। उनकी इच्छा अनुसार चलें। अपनी इच्छा कोई ना रखें तभी असली संतोष प्राप्त होता है।


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