संस्कार
संस्कार
नेहा ने जैसे ही बालकनी के परदे हटाये सामने की बालकनी में सखी पड़ोसन को देखकर वह मुस्कुरा दी।पहले की तरह उनकी बैठकें लाकडाउन के बाद बालकनी में ही सिमट गईं हैं। नेहा ने पूछा-"मीता तुम्हारी परी की तो अनलाइन क्लास चल रही होंगीं?"
मीता ने कहा-"हाँ, यार वो तो चल रही है...पर ये गली-गली में लड़कियों के साथ जो हादसे हो रहें हैं उन्हें सोच-सोच कर तो मेरी नींद उड़ गई है..सरकार भी कुछ नहीं करती।"
"हादसे तो सच में दिल दहलाने वाले हैं ।"...नेहा बोली।
"अरे यार ...पर तुझे क्या......तेरे दोनों बेटे हैं ...कब आओगे?,कहाँ जा रहे हो? किसके साथ जा रहे हो? ये सब पूछने का तुझे टेंशन ही नहीं।"-मीता कुछ बेचारगी से बोली।
"नही मीता इस मामले में तुम कुछ गलतफहमी में हो।" नेहा नै दृढ़ स्वर में कहा-
"बेटों के लिए भी ,'कहाँ जा रहे हैं?' 'क्यों जा रहे हैं?' 'किसके साथ हैं?'...इन सभी बातों पर हम उसी ज़िम्मेदारी से ध्यान रखें तो ही ऐसी घटनाएं रोकी जा सकती हैं ...माफ करना मीता तुम्हे लगेगा मैं प्रवचन दे रही हूँ पर ये सोलह आने सच है कि ये सरकार का नहीं संस्कार का मामला है जो हम एक पक्ष को तो देने की जरूरत ही नहीं समझते हैं..... ।"
मीता ने अचानक बैचैनी से पहलू बदला .....उसे याद आया कि उसका बेटा सुबह नौ बजे से गया है अभी दोपहर के दो बजने को हैं उसने कभी बेटे से तो पूछा ही नहीं कि वो कहाँ है ...नेहा की बात सुनते-सुनते ही उसकी नजरें अपना मोबाइल तलाशने लगीं।
