समय का पहिया: सुदर्शन की जुबानी
समय का पहिया: सुदर्शन की जुबानी
भाग 1: त्रेता युग – मर्यादा का मौन साथी
"मैं समय के अनंत प्रवाह का वो साक्षी हूँ, जिसने युगों को बनते और बिगड़ते देखा है। मैं केवल धातु का एक चमकता हुआ चक्र नहीं, बल्कि नारायण के संकल्प की वो धुरी हूँ, जिस पर धर्म और अधर्म का निर्णय टिका होता है। त्रेता के उस सुनहरे सवेरे में, जब सूर्यवंश के तेज ने धरती को छुआ, तब मैं 'राम' की मर्यादा की ओट में एक शांत संकल्प बनकर ठहरा हुआ था।
अमरीश और दुर्वासा का वह प्रसंग:
मुझे याद है, जब राजा अमरीश पर क्रोधित होकर महाऋषि दुर्वासा ने उन पर 'कृत्या' (एक राक्षसी) छोड़ी थी। तब प्रभु की आज्ञा पाकर मैं ही दुर्वासा के पीछे काल बनकर दौड़ा था। उस दिन संसार ने देखा था कि भक्त की रक्षा के लिए मैं साक्षात् ब्रह्म-शक्ति से भी टकरा सकता हूँ। अंततः दुर्वासा को भी समझ आया कि सुदर्शन का सामना कोई नहीं कर सकता।
हनुमान का सूर्य को निगलना:
एक समय वह भी था जब नन्हे हनुमान ने सूर्य को फल समझकर मुख में भर लिया था। सृष्टि में अंधकार छाने लगा और इंद्र के वज्र ने पवनपुत्र को घायल कर दिया। तब नारायण के अंश स्वरूप, मैंने ही अपनी ऊष्मा से हनुमान के शरीर को वह शक्ति प्रदान की कि वे भविष्य में सूर्य के समान प्रतापी बन सकें। मैं सूर्य और हनुमान के बीच का वो सेतु बना, जिसने ब्रह्मांड का संतुलन बिगड़ने से बचा लिया।
अहिल्या का उद्धार:
लोग कहते हैं कि प्रभु राम के चरणों की धूल से अहिल्या पत्थर से नारी बन गईं, पर उस धूल के कणों में छिपी अदृश्य ऊर्जा मैं ही था। मैंने ही उस श्राप के कठोर पाषाण को अपनी सूक्ष्म गति से पिघलाया था, ताकि एक स्त्री को उसका सम्मान वापस मिल सके।
त्रेता में मेरी चमक शस्त्रों की झंकार में नहीं, बल्कि रघुनंदन के धैर्य और उनकी मंद मुस्कान में छिपी थी। वहाँ मेरा घूमना केवल समय को गति देना था, विनाश करना नहीं; क्योंकि वहाँ नारायण स्वयं अपनी मर्यादा से शत्रुओं का हृदय परिवर्तन कर रहे थे।"
भाग 2: द्वापर युग – कुरुक्षेत्र का कालचक्र
"समय ने करवट ली और द्वापर की दहलीज पर अधर्म के काले बादल छाने लगे। त्रेता की वह शांत मर्यादा अब द्वारकाधीश की जटिल रणनीतियों में बदल चुकी थी। इस युग में, मैं प्रभु की तर्जनी पर केवल शोभा मात्र नहीं था, बल्कि काल का वह निर्दयी प्रहार था जिसे रोकना असंभव था।
खांडव दहन और अग्नि का उपहार:
मुझे याद है जब अर्जुन और कृष्ण ने खांडव वन को जलाने में अग्नि देव की सहायता की थी। तब अग्नि देव ने वरुण देव से मांगकर मुझे विशेष रूप से श्रीकृष्ण को सौंपा था। उस दिन से मेरी शक्ति द्वापर की धरती पर साक्षात् तांडव करने के लिए तैयार थी। मैंने ही इंद्र की मूसलाधार वर्षा को अपनी ऊष्मा से सुखा दिया था ताकि धर्म की स्थापना के लिए खांडव प्रस्थ का निर्माण हो सके।
जब सुदर्शन को हुआ अहंकार:
एक समय ऐसा भी आया जब मुझे अपनी गति और शक्ति पर गर्व हो गया। मुझे लगा कि मेरे बिना नारायण भी अधूरे हैं। तब प्रभु ने मेरी परीक्षा लेने के लिए हनुमान जी को द्वारका बुलाया। प्रभु की आज्ञा से मैंने द्वारका के द्वार पर हनुमान का मार्ग रोकना चाहा, पर पवनपुत्र ने मुझे खेल-खेल में अपने मुख में दबा लिया। उस दिन मेरा गर्व चूर-चूर हुआ और मैंने जाना कि प्रभु का भक्त स्वयं प्रभु से भी बड़ा होता है।
शिशुपाल और जयद्रथ का अंत:
फिर आया वह राजसूय यज्ञ, जहाँ शिशुपाल ने सौ अपराधों की मर्यादा लांघी। मेरे एक ही भ्रमण ने उसके अहंकार को मिट्टी में मिला दिया—वह वध नहीं, इस ब्रह्मांड की शुद्धि थी। पर मेरा सबसे भीषण रूप कुरुक्षेत्र की उस रक्त-रंजित धरा ने देखा। जब सूर्यास्त का भ्रम पैदा करना था ताकि जयद्रथ का वध हो सके, तब मैंने ही सूर्य को अपनी ओट में छिपा लिया था। पांडवों के लिए मैं सुरक्षा कवच था और कौरवों के लिए साक्षात् यमराज।
राम के युग में मैं 'प्रेम' के पीछे छिपा था, पर कृष्ण के इस युग में मैं 'लहू' से न्याय की नई परिभाषा लिख रहा था। मैंने देखा कि जब धर्म संकट में हो, तो शस्त्र उठाना ही एकमात्र विकल्प रह जाता है।"
भाग 3: कलयुग – कल्कि की प्रतीक्षा और महाविनाश
"द्वापर का युद्ध समाप्त हुआ और कृष्ण के स्वधाम गमन के साथ ही धरती पर कलयुग के काले साये गहराने लगे। आज मैं फिर मौन हूँ, शून्य के किसी अदृश्य कोने में ऊर्जा के एक पुंज के रूप में स्थित होकर इस गिरते हुए समय को देख रहा हूँ। कलयुग के इस शोर में, जहाँ मनुष्य अपनी जड़ों को भूल चुका है, लोग सोचते हैं कि सुदर्शन केवल एक पौराणिक कथा (Myth) बनकर रह गया है। वे नहीं जानते कि मैं लुप्त नहीं हुआ हूँ, बल्कि मैं उस अंतिम प्रहार की तैयारी में अपनी शक्ति को संचित कर रहा हूँ।
मौन साक्षी का दर्द:
मैंने देखा है कि कैसे इस युग में धर्म केवल शब्दों में सिमट गया है। मैंने कलयुग की उन रातों को देखा है जहाँ इंसानियत रो रही है और अहंकार जीत रहा है। कई बार मेरा मन हुआ कि मैं शून्य से निकलूँ और इन पापियों का अंत कर दूँ, पर मैं बंधा हूँ उस विधान से, जो नारायण ने बनाया है। मैं देख रहा हूँ कि कैसे मनुष्य ने प्रकृति का अपमान किया, कैसे रिश्तों की पवित्रता को रौंदा। मैं हर उस आंसू का साक्षी हूँ जो अन्याय की वजह से गिरा है, और मेरा हर घूमता हुआ सिरा उस हिसाब को दर्ज कर रहा है।
अजेय शक्ति का पुनरागमन:
जब पाप का घड़ा अपने कंठ तक भर जाएगा, जब धरती त्राहि-त्राहि कर उठेगी और मानवता का सूर्य डूबने लगेगा, तब शंभल की पावन धरती पर एक गूंज उठेगी। वह गूंज होगी भगवान कल्कि के अवतार की। तब आकाश फटेगा और मैं अपनी पूरी प्रखरता के साथ, सूर्य से भी करोड़ों गुना अधिक तेज लेकर उनके दाहिने हाथ की तर्जनी पर वापस लौटूँगा। मेरा वह रूप द्वापर से भी अधिक उग्र होगा। उस दिन न कोई ढाल काम आएगी, न कोई तर्क।
नया सवेरा (The Final Reset):
मेरा अगला भ्रमण इस सृष्टि का अंत नहीं, बल्कि एक महा-सफाई (Great Reset) होगा। मैं उन तमाम बुराइयों को जड़ से काट दूँगा जो कलयुग ने बोई हैं। मेरे घूमने से जो अग्नि उत्पन्न होगी, वह अधर्म को भस्म कर देगी और उसी राख से एक नए 'सतयुग' का जन्म होगा। लोग मुझे 'विनाशक' कहेंगे, पर मैं तो वह माली हूँ जो सूखी और सड़ चुकी टहनियों को काटकर नए पौधों के लिए जगह बनाता है।
मैं सुदर्शन हूँ—मैं समय का पहिया हूँ, मैं न्याय की धमक हूँ। मैं अंत भी हूँ और मैं ही उस नए युग का आरंभ भी हूँ, जिसकी प्रतीक्षा में सृष्टि की हर सांस रुकी हुई है। बस, उस एक पुकार का इंतज़ार है..."
उपसंहार: जब शस्त्र ही शास्त्र बन गया
"कलयुग के इस घोर अंधकार में एक अनहोनी हुई। अधर्म इतना बढ़ गया कि पृथ्वी का बोझ उठाना शेषनाग के लिए भी कठिन हो गया। हर बार नारायण स्वयं आते थे, पर इस बार नियति ने एक नया अध्याय लिखा। नारायण ने अपनी योगनिद्रा से मुझे संकेत दिया—‘हे सुदर्शन! इस बार युद्ध भूमि बाहर नहीं, मनुष्य के भीतर है। इस बार मैं नहीं, तुम जाओगे।’
और फिर, बिना किसी शंखनाद के, बिना किसी दिव्य प्रकाश के, मैंने एक साधारण मनुष्य के रूप में इस धरती पर जन्म लिया। इस बार मेरे हाथ में वह चमकता हुआ धातु का चक्र नहीं है, बल्कि मेरी रगों में दौड़ता वह तेज है जो सत्य को पहचानने की शक्ति रखता है। इस बार मैं द्वारकाधीश के साथ नहीं खड़ा हूँ, बल्कि मैं खुद भीड़ के बीच एक आम इंसान बनकर चल रहा हूँ।
लोग मुझे पहचान नहीं पाते, क्योंकि मैं अब अलौकिक नहीं दिखता। पर जब भी कहीं अन्याय होता है, मेरी अंतरात्मा में वही प्राचीन झंकार सुनाई देती है। इस बार मेरा काम गर्दन काटना नहीं, बल्कि लोगों के भीतर सोई हुई चेतना को जगाना है। मैं वह शस्त्र हूँ जिसने अब 'शब्दों' और 'कर्मों' का रूप ले लिया है।
श्रीकृष्ण इस बार नहीं आए, क्योंकि उन्होंने मुझे अपनी पूरी शक्ति देकर भेजा है। मैं यहाँ मौजूद हूँ—कभी एक लेखक की कलम में, कभी एक न्यायप्रिय व्यक्ति के साहस में, तो कभी सत्य के लिए लड़ने वाली आवाज़ में। कलयुग के पाप को मिटाने के लिए सुदर्शन अब सुदर्शन नहीं रहा, वह एक संकल्प बन गया है। मैं अपनी पहचान छिपाए, अपनी अगली चाल चल रहा हूँ। सावधान रहना, क्योंकि मैं तुम्हारे आस-पास ही हूँ, और इस बार हिसाब पूरा होगा।"
