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Ashok Classes

Classics Fantasy Inspirational

4  

Ashok Classes

Classics Fantasy Inspirational

The last Sanjivani

The last Sanjivani

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25

अध्याय 1: विरासत की पुकार

रात का सन्नाटा गहरा था। घड़ी की सुइयां टिक-टिक कर रही थीं, लेकिन उस छोटे से कमरे में एक अजीब सी बेचैनी पसरी हुई थी। बिस्तर पर लेटा आर्यन (उस लड़के का नाम) गहरी नींद में था, पर उसका मन कहीं बहुत दूर भटक रहा था।

दृश्य 1: सपना

सपने में उसे सिर्फ धुंध दिखाई दे रही थी। एक घना जंगल, जहाँ पेड़ों की ऊंचाई आसमान छू रही थी। अचानक, उसे एक बहुत तेज रोशनी दिखाई दी—एक ऐसी चमक जो किसी साधारण चीज़ की नहीं हो सकती थी। उस रोशनी के बीच से एक परछाईं उसकी ओर बढ़ी। एक औरत की धीमी लेकिन गूँजती हुई आवाज़ आई:

"आर्यन... समय आ गया है। उसे बचा लो, वरना सब खत्म हो जाएगा। तुम ही आखिरी हो... तुम ही आखिरी संजीवनी हो!"

आर्यन ने उसे पकड़ने की कोशिश की, लेकिन रोशनी इतनी तेज हुई कि उसकी आँखें चौंधिया गईं।

दृश्य 2: हकीकत की दस्तक

"नहीं!" आर्यन चिल्लाते हुए बिस्तर पर उठ बैठा। उसका पूरा शरीर पसीने से भीगा हुआ था और दिल की धड़कनें किसी नगाड़े की तरह बज रही थीं। बाहर हल्की बारिश शुरू हो चुकी थी। उसने मेज पर रखा पानी का गिलास एक ही सांस में खाली कर दिया।

वह कमरे से बाहर निकला। अंधेरे गलियारे को पार करते हुए वह अपनी माँ के कमरे की ओर बढ़ा। उसने देखा कि माँ के कमरे का दरवाज़ा थोड़ा खुला था और अंदर से एक दीये की हल्की रोशनी आ रही थी।

दृश्य 3: माँ के साथ संवाद

माँ वहीं बैठी थी, जैसे उसे पता था कि आर्यन आने वाला है। आर्यन ने कांपती आवाज़ में पूछा, "माँ... फिर वही सपना। वो औरत, वो चमकती हुई चीज़ और वो नाम... संजीवनी। माँ, ये सब क्या है? आप मुझसे क्या छुपा रही हैं?"

माँ ने गहरी साँस ली और आर्यन को अपने पास बैठने का इशारा किया। उन्होंने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "बेटा, अब तक मैंने तुझे एक आम इंसान की तरह पाला, ताकि तू खतरों से दूर रहे। लेकिन आज तेरे सपने ने साबित कर दिया कि वो शक्ति अब और इंतज़ार नहीं कर सकती। जिसे तू सपना समझ रहा है, वो एक हकीकत है जो सदियों से हमारे सीने में दफन है।"

माँ उठीं और संदूक से एक पुराना रेशमी कपड़ा निकाला, जिसमें कुछ लिपटा हुआ था। उन्होंने कहा, "संजीवनी कोई कहानी नहीं है आर्यन, वो एक ज़िम्मेदारी है... और तू उसका आखिरी रक्षक है।"

दृश्य 4: रहस्यमयी पोटली

माँ के हाथ थोड़े कांप रहे थे। जैसे ही उन्होंने उस रेशमी कपड़े की गिरह खोली, अंदर से एक पीतल की डिबिया निकली जिस पर अजीब सी नक्काशी की गई थी।

आर्यन ने करीब आकर देखा, उस डिबिया के ऊपर एक सांप और जड़ी-बूटी का निशान बना था। माँ ने उसे खोलते हुए कहा, "आर्यन, यह वही निशान है जो तूने अपने सपने में उस चमकती पहाड़ी पर देखा होगा। यह डिबिया सिर्फ़ तेरे हाथ के स्पर्श से खुल सकती है।"

आर्यन ने झिझकते हुए अपना हाथ आगे बढ़ाया। जैसे ही उसकी उंगलियां उस पीतल की सतह से छुईं, उसे एक हल्का सा बिजली जैसा झटका लगा। डिबिया के भीतर एक छोटा सा, मटमैला सा नक्शा और एक पुरानी चाबी रखी थी।

माँ की आवाज़ अब फुसफुसाहट में बदल गई थी, "बेटा, आज से पच्चीस साल पहले तेरे पिता इसी रहस्य को सुलझाने के लिए उस जंगल में गए थे, लेकिन वो कभी वापस नहीं आए। उन्होंने जाते वक्त मुझसे कहा था कि अगर कभी आर्यन को वो सपना आए, तो उसे रोकना मत... उसे जाने देना।"

अभी माँ की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि अचानक घर के बाहर सूखी पत्तियों पर किसी के चलने की आहट हुई। बारिश की आवाज़ के बीच वह पदचाप साफ़ सुनाई दे रही थी।

आर्यन चौंक गया। उसने माँ की तरफ देखा। माँ की आँखों में गहरा खौफ था। उन्होंने झपटकर दीया बुझा दिया और आर्यन का हाथ पकड़कर उसे दीवार से सटा दिया।

माँ ने धीमी आवाज़ में कहा, "वो आ गए हैं आर्यन... उन्हें पता चल गया है कि तू जाग चुका है।"

दृश्य 5: आधी रात का हमला

माँ और आर्यन दीवार से सटकर खड़े थे, उनकी साँसें थमी हुई थीं। बाहर की पदचापें अब तेज़ हो चुकी थीं, जैसे कई लोग उनके घर की ओर बढ़ रहे हों। अचानक, घर के पिछले दरवाज़े पर एक ज़ोरदार धक्का लगा। लकड़ी की पुरानी चौखट चरमरा उठी।

आर्यन ने हिम्मत करके माँ से कहा, "माँ, मैं उन्हें यहाँ से दूर भटकाता हूँ। आप इस नक्शे और चाबी को संभालकर रखिए और जैसे भी हो, खुद को बचाइए।"

इससे पहले कि माँ कुछ कह पातीं, आर्यन ने मेज पर रखी हुई एक पुरानी लाठी उठाई। डिबिया को माँ के हाथ में थमाते हुए उसने फुर्ती से खिड़की खोली जो सीधे घर के पीछे जंगल की ओर खुलती थी। खिड़की से कूदने से पहले उसने माँ को एक पल के लिए देखा और फिर अंधेरे में छलांग लगा दी।

जैसे ही आर्यन ने बाहर कदम रखा, एक नकाबपोश आदमी की परछाई उसके सामने आ गई। उस आदमी के हाथ में एक चमकदार चाकू था।

नकाबपोश ने फुसफुसाते हुए कहा, "संजीवनी के वारिस, तुझे लगा कि तू भाग जाएगा? हमें सब पता है।"

आर्यन ने बिना सोचे लाठी घुमाई। वह हमला इतना तेज़ था कि नकाबपोश आदमी लड़खड़ा कर पीछे हट गया। आर्यन ने मौका पाकर जंगल की ओर भागना शुरू कर दिया, उसके पीछे नकाबपोश पीछा कर रहा था। जंगल की गीली मिट्टी में उसके पैरों की आवाज़ गूँज रही थी।

घर के भीतर, दरवाज़ा टूट चुका था। दो और नकाबपोश आदमी अंदर घुस आए थे। उन्होंने माँ को घेर लिया।

एक ने गुस्से में कहा, "लड़का कहाँ है? संजीवनी का नक्शा कहाँ है?"

माँ ने हिम्मत जुटाकर उनकी ओर देखा, उनके चेहरे पर डर के साथ-साथ एक दृढ़ता भी थी। उन्होंने डिबिया को अपनी मुट्ठी में कस लिया था, जैसे वह उनकी जान से ज़्यादा कीमती हो।

दृश्य 6: रक्षक का आगमन

कमरे में सन्नाटा छा गया। माँ ने डरी हुई आँखों से उस साये की ओर देखा। वह एक लंबा, गठीले शरीर वाला आदमी था, जिसने अपने चेहरे पर एक पुराना सूती गमछा लपेट रखा था। उसके हाथों में लोहे की एक छोटी सी रॉड थी।

दूसरे नकाबपोश ने चिल्लाते हुए हमला किया, "कौन है तू? बीच में मत आ!"

लेकिन वह अजनबी बिजली की फुर्ती से घूमा। उसने नकाबपोश का हाथ हवा में ही पकड़ा और उसे मरोड़ते हुए रॉड से उसके घुटने पर प्रहार किया। हमलावर दर्द से चीख पड़ा। अजनबी ने उसकी गर्दन दबोची और उसे घसीटते हुए घर के खुले दरवाज़े से बाहर फेंक दिया।

माँ की सांसें अभी भी अटकी हुई थीं। अजनबी ने पीछे मुड़कर माँ की तरफ देखा। उसकी आँखों में एक अजीब सी जान-पहचान थी। उसने बहुत धीमी लेकिन गहरी आवाज़ में कहा:

"डरिए मत माँ जी। मैंने आपके पति को वचन दिया था कि जब तक मैं ज़िंदा हूँ, संजीवनी के वारिस का बाल भी बांका नहीं होने दूँगा।"

माँ की आँखों में आंसू आ गए, उन्होंने कांपते हुए पूछा, "क्या... क्या तुम 'विक्रम' हो? इतने सालों बाद?"

अजनबी ने बस एक बार अपना सिर झुकाया और फिर बाहर अंधेरे जंगल की ओर देखा जहाँ आर्यन अकेला था। उसने कहा, "वक्त कम है। आर्यन खतरे में है। मुझे उसे ढूंढना होगा।"

दृश्य 7: शांति और विरासत का रहस्य

विक्रम की मदद से नकाबपोशों को खदेड़ दिया गया। आर्यन सुरक्षित था और उसकी माँ अब एक गुप्त सुरक्षित ठिकाने पर थीं। रात की अफरा-तफरी थम चुकी थी, लेकिन आर्यन के मन का शोर बढ़ता जा रहा था।

बाहर बारिश धीमी हो चुकी थी। माँ ने एक पुरानी चटाई बिछाई और आर्यन को अपने पास बिठाया। विक्रम दरवाजे पर पहरा दे रहा था। माँ ने जलते हुए दीये की लौ को देखा और फिर अपनी आवाज़ को थोड़ा गहरा करते हुए कहानी शुरू की:

"बेटा, जो आज तूने देखा वो सिर्फ एक हमला नहीं था, वो दो हज़ार साल पुराने संघर्ष की एक कड़ी थी। आज तू जिसे एक जड़ी-बूटी समझ रहा है, उसका इतिहास उस समय से जुड़ा है जब हमारा भारतवर्ष एक विशाल और अखंड साम्राज्य था।"

आर्यन मंत्रमुग्ध होकर सुन रहा था। माँ ने आगे कहा:

"तुझे याद है रामायण का वो प्रसंग, जब लक्ष्मण जी रणभूमि में मूर्छित हो गए थे? तब हनुमान जी पूरा द्रोणागिरी पर्वत उठा लाए थे। उस पर्वत पर सिर्फ एक 'संजीवनी' नहीं थी, बल्कि दैवीय शक्तियों का एक पूरा भंडार था। जब हनुमान जी ने पर्वत वापस रखा, तो उस मिट्टी का एक अंश और उस दिव्य शक्ति की कुछ बूंदें उसी स्थान पर रह गईं जहाँ लक्ष्मण जी का उपचार हुआ था।"

माँ की आँखों में एक चमक सी आ गई, जैसे वह उस इतिहास को अपनी आँखों से देख रही हों।

"समय बीता, सदियां गुजरीं, लेकिन उस दिव्य शक्ति को सुरक्षित रखने के लिए 'रक्षकों' का एक वंश चुना गया। वो शक्तियाँ हवा में नहीं उड़ीं, बल्कि वो विरासत के रूप में एक खून से दूसरे खून में बहती रहीं। और आर्यन... वो खून हमारी रगों में है। हमारे पूर्वज उस पहाड़ के टुकड़े और उसकी शक्तियों के रक्षक थे।"

आर्यन ने हैरानी से पूछा, "इसका मतलब, वो शक्तियाँ आज भी मौजूद हैं?"

माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा और कहा, "हाँ! वो शक्तियाँ मरी नहीं हैं, वो बस सो रही हैं। और हर सौ साल में, किसी एक वारिस के सपने में वो पहाड़ फिर से जागता है। आज तेरे सपने में उस पहाड़ का दिखना इस बात का संकेत है कि तू ही वो चुना हुआ रक्षक है। तू ही The Last Sanjivani है जिसे उस 2000 साल पुरानी विरासत को गलत हाथों में जाने से बचाना है।"


अध्याय 2: रहस्यमयी राही और धड़कनों का सफर

माँ की सुनाई उस 2000 साल पुरानी दास्तां ने आर्यन के भीतर की सोई हुई आग को जगा दिया था। कंधे पर वह पुराना झोला और सीने में वह तांबे का ताबीज लेकर आर्यन निकल पड़ा उस द्रोणागिरी की दिशा में, जिसकी ओर उस पुराने नक्शे के धुंधले निशान इशारा कर रहे थे।

सफर लंबा था। कई दिनों तक घने जंगलों और ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरने के बाद, आर्यन हिमालय की तलहटी में बसे एक छोटे से गाँव पहुँचा। वहाँ का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था, लेकिन आर्यन का दिल किसी अनहोनी की आहट से डरा हुआ था।

मुलाकात: मीरा का प्रवेश

गाँव के किनारे एक प्राचीन मंदिर था, जिसके पास एक ठंडे पानी का झरना बह रहा था। आर्यन नक्शा देख ही रहा था कि तभी उसकी नजर झरने के पास खड़ी एक लड़की पर पड़ी।

उसने नीले रंग का पहाड़ी लिबास पहना था और उसके बाल हवा में लहरा रहे थे। वह बड़े गौर से कुछ जड़ी-बूटियाँ इकट्ठा कर रही थी। उसे देखते ही आर्यन के कदम जैसे जमीन से चिपक गए। उसकी सादगी में एक ऐसी कशिश थी कि आर्यन अपनी मंजिल का रास्ता तक भूल गया।

तभी उस लड़की ने पीछे मुड़कर देखा। उसकी बड़ी-बड़ी भूरी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी। उसने मुस्कुराते हुए पूछा, "रास्ता भटक गए हो या किसी खास चीज की तलाश में यहाँ तक आए हो?"

आर्यन कुछ पल के लिए हकला गया, "मैं... मैं बस इस पहाड़ी के बारे में जानना चाहता था।"

लड़की करीब आई, उसके पास से जंगली फूलों की एक भीनी-भीनी खुशबू आ रही थी। उसने अपना हाथ बढ़ाते हुए कहा, "मैं मीरा हूँ। इस गाँव के लोग मुझे 'पहाड़ों की बेटी' कहते हैं। तुम जिसे ढूंढ रहे हो, वो रास्ता सीधा नहीं है, अजनबी।"

प्यार का आगाज़

आर्यन को अहसास हुआ कि मीरा कोई साधारण लड़की नहीं है। उसे जड़ी-बूटियों का इतना ज्ञान था जितना शायद ही किसी को हो। अगले कुछ दिनों तक मीरा ने आर्यन को उन रास्तों का रास्ता दिखाया जहाँ नक्शा भी फेल हो रहा था।

जैसे-जैसे वे ऊँचाइयों की ओर बढ़ रहे थे, उनके बीच की खामोशी बातचीत में बदलने लगी। एक ठंडी रात में, कैम्प फायर के पास बैठे हुए, आर्यन ने मीरा के चेहरे की ओर देखा। आग की रोशनी में मीरा और भी खूबसूरत लग रही थी।

मीरा ने धीरे से कहा, "तुम जिस संजीवनी को ढूंढ रहे हो आर्यन, वो सिर्फ एक पौधा नहीं है। वो एक रूह है। क्या तुम उसे संभालने के काबिल हो?"

आर्यन ने पहली बार मीरा का हाथ थाम लिया। उस बर्फीली रात में मीरा का हाथ गर्म था। आर्यन ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, "मैं नहीं जानता कि मैं काबिल हूँ या नहीं, पर इतना जानता हूँ कि इस सफर में अगर तुम साथ हो, तो मैं मौत से भी लड़ सकता हूँ।"

मीरा की मुस्कुराहट में एक राज छिपा था, पर उस पल आर्यन को सिर्फ उससे प्यार होने का अहसास हो रहा था। उसे नहीं पता था कि मीरा का इस 2000 साल पुरानी कहानी से क्या गहरा रिश्ता है।


अध्याय 3: द्रोणागिरी का हृदय और अमर गवाह

आर्यन और मीरा नक्शे के आखिरी निशान का पीछा करते हुए द्रोणागिरी की एक ऐसी गुफा के सामने पहुँचे, जो सदियों से घने कोहरे और जहरीली लताओं के पीछे छिपी थी। जैसे ही उन्होंने गुफा के भीतर कदम रखा, दीवारें नीली रोशनी से जगमगा उठीं।

दृश्य 1: प्राचीन पहेली

गुफा के केंद्र में एक विशाल पत्थर का दरवाजा था, जिस पर कोई ताला नहीं था। उस पर एक अजीब सी पहेली लिखी थी जो प्राचीन ब्राह्मी लिपि में थी। दरवाजे के बीचों-बीच सात खाली खांचे (slots) बने थे।

मीरा ने गौर से उन खांचों को देखा और कहा, "आर्यन, यह पहेली समय की है। यहाँ उन सात औषधियों के नाम लिखने हैं जो संजीवनी के साथ उसी पहाड़ पर उगी थीं।"

आर्यन ने अपनी माँ की सुनाई कहानी और अपने सपने को याद किया। उसने अपनी उंगली से दरवाजे की धूल साफ की और अपनी शक्ति का आह्वान किया। जैसे ही उसने एक-एक कर उन औषधियों के नाम अपनी उंगली से पत्थर पर उकेरे, गुफा गूंजने लगी।

जैसे ही सातवाँ नाम पूरा हुआ, वह विशाल पत्थर का दरवाजा किसी मशीन की तरह पीछे हटा और अंदर से एक दिव्य, सुनहरी रोशनी का सैलाब उमड़ पड़ा।

दृश्य 2: अमर जाम्बवंत जी के दर्शन

गुफा के उस पार एक विशाल कक्ष था, जहाँ बीचों-बीच एक बहुत बड़ा वृक्ष चमक रहा था। उस वृक्ष के नीचे एक विशालकाय आकृति ध्यान की मुद्रा में बैठी थी। उनका शरीर बालों से ढका था, कंधों पर रीछ जैसी चौड़ाई थी, और मुखमंडल पर एक असीम तेज था।

उनकी आँखें धीरे से खुलीं। वे साक्षात जाम्बवंत जी थे, जो त्रेतायुग से आज तक इस धरोहर की रक्षा कर रहे थे। उनकी आवाज़ किसी बादल के गरजने जैसी भारी और शांत थी।

"इतनी सदियों बाद... अंततः एक वारिस यहाँ पहुँच ही गया।"

आर्यन और मीरा श्रद्धा से उनके चरणों में गिर पड़े। आर्यन की आवाज़ कांप रही थी, "प्रभु! क्या आप... आप जाम्बवंत जी हैं?"

जाम्बवंत जी धीरे से मुस्कुराए, उनकी मुस्कान में हज़ारों वर्षों का अनुभव था। उन्होंने कहा, "पुत्र, मैं वही हूँ जिसने प्रभु श्रीराम के साथ उस युद्ध को देखा था। मैंने ही हनुमान को उसकी शक्ति याद दिलाई थी, और आज मैं तुम्हें तुम्हारी शक्ति याद दिलाने के लिए यहाँ हूँ।"

उन्होंने मीरा की तरफ देखा और उनकी आँखों में एक रहस्यमयी चमक आई, "और तुम, पहाड़ों की बेटी... अपनी नियति को पहचानो। तुम सिर्फ़ एक राही नहीं हो।"

जाम्बवंत जी ने उठकर अपनी विशाल गदा को किनारे रखा और आर्यन की ओर अपना हाथ बढ़ाया। उनके हाथ में एक चमकता हुआ बीज था। "यह अंतिम संजीवनी का सार है। पर इसे लेने से पहले, तुम्हें एक अंतिम परीक्षा देनी होगी, क्योंकि बाहर काल के दूत (दुश्मन) द्वार तक पहुँच चुके हैं।"

दृश्य 8: जाम्बवंत जी का स्वैग और कवच-कुंडल का राज़

जाम्बवंत जी ने आर्यन की आँखों में देखा और अपना विशाल हाथ उसके सिर पर रखा। आर्यन को ऐसा महसूस हुआ जैसे उसके पूरे शरीर में हज़ारों वोल्ट की बिजली दौड़ गई हो।

जाम्बवंत जी: "पुत्र, आज से मैं तुझे अमरता का वरदान देता हूँ। अब मौत तेरे पास आने से पहले मुझसे इजाज़त लेगी! लेकिन याद रखना, यह शक्ति तब तक है जब तक तू धर्म के रास्ते पर है।"

आर्यन अभी इस वरदान को महसूस ही कर रहा था कि जाम्बवंत जी ने गुफा के एक गुप्त कोने से एक चमकती हुई पोटली निकाली। उसमें से ऐसी रोशनी निकली कि पूरी गुफा सूरज की तरह जगमगा उठी।

जाम्बवंत जी: "इसे देख! महाभारत युग में जब देवराज इंद्र ने दानवीर कर्ण से उसके कवच और कुंडल दान में लिए थे, तब उन्होंने इसे मेरे पास अमानत के तौर पर रखवाया था। उन्हें पता था कि जाम्बवंत से इसे छीनने की हिम्मत किसी में नहीं है। अब इसकी रक्षा की ज़िम्मेदारी तेरी है। अगर ये गलत हाथों में गए, तो दुनिया में प्रलय आ जाएगा!"

आर्यन ने कांपते हाथों से उस दिव्य धरोहर को देखा। तभी जाम्बवंत जी ने अपनी कमर सीधी की और एक लंबी अंगड़ाई ली, उनकी हड्डियों से 'चट-चट' की आवाज़ आई।

जाम्बवंत जी (मज़ेदार अंदाज़ में): "चलो भाई आर्यन, मेरा काम खत्म! पिछले कई हज़ार सालों से यहाँ बैठे-बैठे मेरी पीठ अकड़ गई है। अब देवराज ने मुझे थोड़ी 'छुट्टी' (Paid Leave) दी है। मैं जा रहा हूँ कुछ दिनों के लिए बाहर घूमने... पहाड़ों की ताजी हवा खाऊंगा और देखूँगा कि आजकल की दुनिया में क्या नया चल रहा है। सुना है आजकल लोग 'सेल्फी' बहुत लेते हैं, मैं भी ट्राई करूँगा!"

आर्यन और मीरा तो फटी आँखों से देखते ही रह गए। जाम्बवंत जी ने अपनी गदा उठाई और एक आँख मारते हुए बोले:

"सुन, ध्यान रखना इनका! अगर कुछ गड़बड़ हुई तो मैं छुट्टी कैंसिल करके तुरंत वापस आ जाऊँगा और फिर मेरी गदा बोलेगी। टाटा, बाय-बाय!"

और देखते ही देखते, एक तेज़ रोशनी हुई और जाम्बवंत जी वहाँ से ऐसे ओझल हो गए जैसे कभी थे ही नहीं। पीछे रह गया आर्यन, मीरा और वह महा-शक्तिशाली क

वच-कुंडल।


दृश्य 9: मीरा का सच और दिल का इकरार

जाम्बवंत जी के जाने के बाद गुफा में एक भारी शांति छा गई। सुनहरी रोशनी में कवच और कुंडल अभी भी चमक रहे थे। आर्यन ने जब मीरा की तरफ देखा, तो पाया कि वह खामोश खड़ी थी और उसकी आँखों में आंसू थे।

आर्यन ने करीब जाकर उसका हाथ थामा, "मीरा, तुम परेशान क्यों हो? अब तो हमारे पास जाम्बवंत जी का आशीर्वाद और यह शक्तियाँ भी हैं।"

मीरा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ा लिया और पीछे हट गई। अचानक, उसके साधारण पहाड़ी कपड़े चमकने लगे और उसके चारों ओर एक दिव्य आभा (aura) उभर आई। वह पहले से कहीं ज्यादा सुंदर और अलौकिक दिखने लगी।

आर्यन दंग रह गया, "मीरा... यह सब क्या है?"

मीरा ने भर्रायी हुई आवाज़ में कहा, "आर्यन, मैं वह नहीं हूँ जो तुम समझ रहे हो। मेरा नाम चित्रांगदा है और मैं देवराज इंद्र की सभा की एक अप्सरा हूँ। मुझे स्वर्ग से सिर्फ इसलिए भेजा गया था ताकि मैं तुम्हें तुम्हारी मंजिल तक पहुँचाने में मदद करूँ और इन कवच-कुंडल की सुरक्षा सुनिश्चित कर सकूँ।"

आर्यन के पैरों तले जमीन निकल गई। मीरा—यानी चित्रांगदा—ने आगे कहा, "मेरा काम पूरा हो चुका है। जाम्बवंत जी के जाते ही मेरा वापस लौटने का समय आ गया है। देवलोक के नियम बहुत कड़े हैं आर्यन... एक अप्सरा किसी नश्वर इंसान से मोह नहीं कर सकती।"

आर्यन ने नम आँखों से पूछा, "तो क्या वह सब झूठ था? वह जंगल का सफर, वह बातें, वह अहसास... क्या सब सिर्फ एक नाटक था?"

"नहीं!" मीरा चिल्लाई और दौड़कर आर्यन के गले लग गई। "वह सच था। तुम्हें रास्ता दिखाते-दिखाते मैं खुद अपना रास्ता भटक गई आर्यन। मुझे तुमसे प्यार हो गया है। मैं एक अप्सरा बनकर स्वर्ग में रहने के बजाय, एक साधारण लड़की बनकर तुम्हारे साथ इस खतरे भरी दुनिया में रहना चाहती हूँ। पर देवराज मुझे छोड़ेंगे नहीं..."

उसी पल, गुफा की छत से बिजली कड़की और एक भारी आवाज़ गूँजी, जैसे देवराज इंद्र खुद अपनी अप्सरा को वापस बुला रहे हों।


अध्याय 10: सदियों पुराना बदला - महाकाल का उदय

(मीरा-चित्रांगदा और आर्यन के बीच का क्षण वहीं रुक जाता है, कहानी एक नए, अँधेरे पहलू की ओर मुड़ती है)

...

हिमालय की बर्फीली चोटियों से दूर, दुनिया के सबसे घने और डरावने जंगल के भीतर, एक ऐसी जगह थी जहाँ सूरज की रोशनी कभी नहीं पहुँचती थी। वहाँ पत्थरों के बीच एक दरार थी, जिसे 'काल-गुहा' कहा जाता था। हज़ारों वर्षों से वह गुहा एक भयानक राज को अपने भीतर दबाए हुए थी।

महा-विलेन का उदय

उस दरार के भीतर, अंधेरे में एक विशाल आकृति हिलने लगी। यह कोई साधारण जीव नहीं था। यह रामायण काल का वह शक्तिशाली राक्षस 'कालनेमि' था, जिसे हनुमान जी ने संजीवनी बूटी लाते समय धोखा देने की कोशिश की थी, लेकिन वह मारा नहीं गया था। वह किसी तरह उस गुहा में छिप गया था और अपनी शक्तियों को सदियों तक बढ़ाता रहा।

कालनेमि का शरीर पत्थर जैसा कठोर और विशाल था, उसकी आँखें लाल अंगारों सी जल रही थीं और उसकी मुस्कुराहट में हज़ारों वर्षों की नफ़रत और बदले की आग थी। वह जानता था कि जाम्बवंत जी का पहरा हट चुका है और संजीवनी के वारिस, यानी आर्यन, को उसकी शक्तियाँ मिल चुकी हैं।

कालनेमि की भारी आवाज़ उस गुहा में गूँजी, जैसे धरती कांप उठी हो। उसने कहा:

"आखिरकार... इंतज़ार खत्म हुआ। हज़ारों साल का यह वनवास, यह अपमान... अब इसका बदला लेने का वक्त आ गया है। राम के वंशजों ने मुझे हराया था, लेकिन मैं कभी हारा नहीं था। और अब, जब वह 'संजीवनी' और वह 'कवच-कुंडल' मेरे हाथ लग जाएंगे, तब पूरी पृथ्वी मेरे कदमों में होगी।"

उसकी लाल आँखों में एक भयानक चमक थी। उसने अपने सामने एक धुंधली सी तस्वीर बनाई, जिसमें आर्यन और मीरा गुफा में खड़े दिख रहे थे। कालनेमि ने राक्षसी हंसी हंसते हुए कहा:

"अमरता का वरदान, कर्ण का कवच... और वह अप्सरा, जो अपनी नियति भूलकर एक नश्वर से प्रेम कर बैठी है। ये सब मेरे काम आएंगे। अब पृथ्वी पर 'महाकाल' का राज होगा, और 'संजीवनी' सिर्फ मेरे विनाश का औजार बनेगी!"

कालनेमि ने गुहा से बाहर कदम रखा। उसके निकलते ही, जंगल के सबसे पुराने पेड़ सूखने लगे और नदियाँ जम गईं। उसकी उपस्थिति इतनी शक्तिशाली थी कि पूरा वातावरण भय और मृत्यु से भर गया। वह अपनी सदियों की नड़त और ताकत के साथ, आर्यन और उस दिव्य विरासत को हथियाने के लिए निकल पड़ा था।

अध्याय 11: शक्तियों का प्रदर्शन और विरह की आग

जैसे ही आर्यन और मीरा गुफा के मुहाने पर पहुँचे, अचानक आकाश में एक तेज़ बिजली कड़की। इससे पहले कि आर्यन कुछ समझ पाता, मीरा का हाथ उसके हाथ से छूट गया। उसकी देह धीरे-धीरे हवा में विलीन होने लगी।

"आर्यन! मुझे देवराज के दूत ले जा रहे हैं... घबराना मत, अपनी शक्तियों पर भरोसा रखना!" मीरा की आवाज़ गूँजी और अगले ही पल वह गायब हो गई।

आर्यन अभी मीरा के जाने के सदमे में था ही कि तभी गुफा के चारों ओर से दर्जनों नकाबपोश और भयानक दिखने वाले गुंडे, जो कालनेमि के भेजे हुए प्यादे थे, बाहर निकल आए। उनके पास आधुनिक हथियार भी थे और कुछ के पास काली शक्तियों से बने तलवार और भाले।

युद्ध का आगाज़:

उनका नेता, जो कद-काठी में किसी दैत्य जैसा था, बोला, "लड़के! वह कवच और कुंडल हमारे हवाले कर दे, वरना तेरी लाश भी किसी को नहीं मिलेगी।"

आर्यन की आँखों में मीरा के बिछड़ने का गम अब क्रोध में बदल चुका था। उसने अपनी मुट्ठी कसी और अचानक उसके सीने पर कर्ण का कवच प्रकट हो गया। उसके कानों में दिव्य कुंडल चमकने लगे।

जैसे ही गुंडों ने गोलियां चलानी शुरू कीं, आर्यन के कवच से टकराकर गोलियां ऐसे गिर गईं जैसे वे मामूली कंकड़ हों। आर्यन बिजली की गति से आगे बढ़ा। उसने हवा में ही एक छलांग लगाई और ज़मीन पर एक ज़ोरदार मुक्का मारा।

धमाका!

ज़मीन किसी भूकंप की तरह फटी और आधे गुंडे तो उस झटके से ही सैकड़ों फिट दूर जा गिरे। एक गुंडे ने पीछे से कुल्हाड़ी से हमला किया, लेकिन आर्यन ने बिना पीछे मुड़े उसे अपनी कोहनी से ऐसा प्रहार किया कि वह हवा में कई बार घूमता हुआ एक पत्थर से जा टकराया।

आर्यन को खुद अपनी ताकत पर यकीन नहीं हो रहा था। उसे लगा जैसे उसके भीतर हज़ारों हाथियों का बल आ गया हो। जाम्बवंत जी का दिया अमरता का वरदान उसे निडर बना रहा था। उसने सिर्फ़ अपनी उंगलियों की एक चुटकी बजाई और एक दिव्य ऊर्जा की लहर निकली, जिसने बचे हुए सारे गुंडों को बेहोश कर दिया।

महज़ कुछ मिनटों में, जहाँ मौत का मंजर होना चाहिए था, वहाँ आर्यन अकेला खड़ा था। उसके चारों ओर धूल उड़ रही थी और वह कवच सूरज की तरह 

चमक रहा था।


दृश्य 12: कालनेमि की धूर्त चाल

आर्यन जब गुफा के बाहर गिरे हुए गुंडों को देख रहा था, तभी उसे जमीन पर मीरा का गिरा हुआ एक कंगन मिला। उसे हाथ में लेते ही आर्यन की आँखों के सामने एक धुंधला सा दृश्य उभर आया—यह उसकी नई शक्तियों का असर था कि वह बीते हुए समय की आहट सुन सकता था।

उसने देखा कि जब वे गुफा के अंदर थे, तब कालनेमि ने अपनी मायावी शक्तियों से आसमान में एक काला धुआँ छोड़ा था। उस धुएँ ने देवराज इंद्र के पास एक झूठी छवि भेजी। उस छवि में ऐसा दिख रहा था जैसे मीरा, आर्यन के साथ मिलकर देवताओं के खिलाफ विद्रोह कर रही है और कवच-कुंडल का दुरुपयोग करने वाली है।

कालनेमि की गूँजती हँसी:

आर्यन के दिमाग में कालनेमि की डरावनी आवाज़ गूँजी, "मूर्ख मानव! तुझे क्या लगा कि एक अप्सरा और एक रक्षक का मिलन इतनी आसानी से होने दूँगा? मैंने इंद्र के कान भर दिए हैं। अब वह उसे कभी स्वर्ग से बाहर नहीं आने देंगे। तेरा प्यार अब तेरी कमज़ोरी बनेगा, और तेरी यही कमज़ोरी मुझे उन कवच-कुंडल तक पहुँचाएगी!"

आर्यन को अब समझ आया कि कालनेमि ने जानबूझकर उसी वक्त हमला करवाया था जब मीरा को दूत ले जा रहे थे, ताकि आर्यन उलझ जाए और मीरा को बचाने का मौका न मिले।

आर्यन का संकल्प:

आर्यन ने कंगन को अपनी मुट्ठी में भींचा। उसके कवच से एक सुनहरी ज्वाला निकली। उसने गरजकर कहा, "कालनेमि, तूने सिर्फ एक रक्षक को नहीं, एक प्रेमी को ललकारा है। अगर मुझे मीरा को वापस लाने के लिए इंद्र के सिंहासन तक भी जाना पड़ा, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। और तेरा वध... वो तो अब निश्चित है!"


दृश्य 13: महत्वाकांक्षा का गठबंधन - डॉ. रुद्र और कालनेमि

कालनेमि की 'काल-गुहा' के अँधेरे कोनों में सिर्फ दिव्य शक्तियाँ ही नहीं थीं, बल्कि वहाँ अत्याधुनिक कंप्यूटर स्क्रीन और लैब के उपकरण भी चमक रहे थे। इस गुफा के एक हिस्से को एक आधुनिक प्रयोगशाला (Lab) में बदल दिया गया था।

वहाँ एक आदमी खड़ा था—डॉ. रुद्र। वह दुनिया का सबसे प्रतिभाशाली लेकिन सनकी वैज्ञानिक था। वह सफ़ेद कोट पहने हुए था, लेकिन उसकी आँखों में वैज्ञानिक खोज से ज़्यादा सत्ता की भूख थी।

रुद्र की साजिश:

डॉ. रुद्र कालनेमि की मदद इसलिए नहीं कर रहा था कि वह राक्षस की गुलामी करना चाहता था, बल्कि उसका अपना एक स्वार्थ था। वह 'संजीवनी' के डीएनए (DNA) को डिकोड करके एक ऐसी 'अमरता की वैक्सीन' बनाना चाहता था जिसे वह पूरी दुनिया को बेच सके—या फिर खुद उसे पीकर भगवान बन सके।

रुद्र ने कालनेमि की ओर मुड़कर कहा, "महाराज, आर्यन के पास जो कवच है, वह सिर्फ सुरक्षा नहीं है; वह ऊर्जा का एक स्रोत है। अगर मुझे उस जड़ी-बूटी का एक पत्ता और उस कवच का एक छोटा सा अंश मिल जाए, तो मैं 'बायो-साइंस' और आपकी 'मायावी विद्या' को मिलाकर एक ऐसा सीरम बनाऊँगा जिससे मृत्यु इस धरती से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।"

कालनेमि ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, "विज्ञान? तुम इंसानों के ये छोटे-छोटे यंत्र मेरे काम आएंगे?"

रुद्र मुस्कुराया, "आपके लिए ये यंत्र छोटे हो सकते हैं, लेकिन यही यंत्र उस 'संजीवनी' की कोशिकाओं (cells) को अमरता के फॉर्मूले में बदलेंगे। मुझे शक्ति चाहिए और आपको बदला। जैसे ही आर्यन यहाँ आएगा, मेरा 'एनर्जी ट्रैप' उसे पकड़ लेगा और आप उससे कवच छीन लेना।"

विज्ञान और तंत्र का मिलन:

रुद्र ने एक रिमोट दबाया और गुफा के चारों ओर लेज़र की दीवारें खड़ी हो गईं। उसने कालनेमि को वह 'ट्रैकिंग डिवाइस' दिखाया जो आर्यन के शरीर से निकलने वाली दैवीय ऊर्जा को ट्रैक कर रहा था।

रुद्र मन ही मन सोच रहा था—"एक बार मुझे संजीवनी मिल जाए, फिर न मुझे इस राक्षस की ज़रूरत होगी और न ही किसी रक्षक की। मैं खुद हीदृश्य 13: महत्वाकांक्षा का गठबंधन - डॉ. रुद्र और कालनेमि

कालनेमि की 'काल-गुहा' के अँधेरे कोनों में सिर्फ दिव्य शक्तियाँ ही नहीं थीं, बल्कि वहाँ अत्याधुनिक कंप्यूटर स्क्रीन और लैब के उपकरण भी चमक रहे थे। इस गुफा के एक हिस्से को एक आधुनिक प्रयोगशाला (Lab) में बदल दिया गया था।

वहाँ एक आदमी खड़ा था—डॉ. रुद्र। वह दुनिया का सबसे प्रतिभाशाली लेकिन सनकी वैज्ञानिक था। वह सफ़ेद कोट पहने हुए था, लेकिन उसकी आँखों में वैज्ञानिक खोज से ज़्यादा सत्ता की भूख थी।

रुद्र की साजिश:

डॉ. रुद्र कालनेमि की मदद इसलिए नहीं कर रहा था कि वह राक्षस की गुलामी करना चाहता था, बल्कि उसका अपना एक स्वार्थ था। वह 'संजीवनी' के डीएनए (DNA) को डिकोड करके एक ऐसी 'अमरता की वैक्सीन' बनाना चाहता था जिसे वह पूरी दुनिया को बेच सके—या फिर खुद उसे पीकर भगवान बन सके।

रुद्र ने कालनेमि की ओर मुड़कर कहा, "महाराज, आर्यन के पास जो कवच है, वह सिर्फ सुरक्षा नहीं है; वह ऊर्जा का एक स्रोत है। अगर मुझे उस जड़ी-बूटी का एक पत्ता और उस कवच का एक छोटा सा अंश मिल जाए, तो मैं 'बायो-साइंस' और आपकी 'मायावी विद्या' को मिलाकर एक ऐसा सीरम बनाऊँगा जिससे मृत्यु इस धरती से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।"

कालनेमि ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, "विज्ञान? तुम इंसानों के ये छोटे-छोटे यंत्र मेरे काम आएंगे?"

रुद्र मुस्कुराया, "आपके लिए ये यंत्र छोटे हो सकते हैं, लेकिन यही यंत्र उस 'संजीवनी' की कोशिकाओं (cells) को अमरता के फॉर्मूले में बदलेंगे। मुझे शक्ति चाहिए और आपको बदला। जैसे ही आर्यन यहाँ आएगा, मेरा 'एनर्जी ट्रैप' उसे पकड़ लेगा और आप उससे कवच छीन लेना।"

विज्ञान और तंत्र का मिलन:

रुद्र ने एक रिमोट दबाया और गुफा के चारों ओर लेज़र की दीवारें खड़ी हो गईं। उसने कालनेमि को वह 'ट्रैकिंग डिवाइस' दिखाया जो आर्यन के शरीर से निकलने वाली दैवीय ऊर्जा को ट्रैक कर रहा था।

रुद्र मन ही मन सोच रहा था—"एक बार मुझे संजीवनी मिल जाए, फिर न मुझे इस राक्षस की ज़रूरत होगी और न ही किसी रक्षक की। मैं खुद ही अगला ईश्वर बनूँगा।" अगला ईश्वर बनूँगा।"

दृश्य 13: महत्वाकांक्षा का गठबंधन - डॉ. रुद्र और कालनेमि

कालनेमि की 'काल-गुहा' के अँधेरे कोनों में सिर्फ दिव्य शक्तियाँ ही नहीं थीं, बल्कि वहाँ अत्याधुनिक कंप्यूटर स्क्रीन और लैब के उपकरण भी चमक रहे थे। इस गुफा के एक हिस्से को एक आधुनिक प्रयोगशाला (Lab) में बदल दिया गया था।

वहाँ एक आदमी खड़ा था—डॉ. रुद्र। वह दुनिया का सबसे प्रतिभाशाली लेकिन सनकी वैज्ञानिक था। वह सफ़ेद कोट पहने हुए था, लेकिन उसकी आँखों में वैज्ञानिक खोज से ज़्यादा सत्ता की भूख थी।

रुद्र की साजिश:

डॉ. रुद्र कालनेमि की मदद इसलिए नहीं कर रहा था कि वह राक्षस की गुलामी करना चाहता था, बल्कि उसका अपना एक स्वार्थ था। वह 'संजीवनी' के डीएनए (DNA) को डिकोड करके एक ऐसी 'अमरता की वैक्सीन' बनाना चाहता था जिसे वह पूरी दुनिया को बेच सके—या फिर खुद उसे पीकर भगवान बन सके।

रुद्र ने कालनेमि की ओर मुड़कर कहा, "महाराज, आर्यन के पास जो कवच है, वह सिर्फ सुरक्षा नहीं है; वह ऊर्जा का एक स्रोत है। अगर मुझे उस जड़ी-बूटी का एक पत्ता और उस कवच का एक छोटा सा अंश मिल जाए, तो मैं 'बायो-साइंस' और आपकी 'मायावी विद्या' को मिलाकर एक ऐसा सीरम बनाऊँगा जिससे मृत्यु इस धरती से हमेशा के लिए खत्म हो जाएगी।"

कालनेमि ने अपनी भारी आवाज़ में कहा, "विज्ञान? तुम इंसानों के ये छोटे-छोटे यंत्र मेरे काम आएंगे?"

रुद्र मुस्कुराया, "आपके लिए ये यंत्र छोटे हो सकते हैं, लेकिन यही यंत्र उस 'संजीवनी' की कोशिकाओं (cells) को अमरता के फॉर्मूले में बदलेंगे। मुझे शक्ति चाहिए और आपको बदला। जैसे ही आर्यन यहाँ आएगा, मेरा 'एनर्जी ट्रैप' उसे पकड़ लेगा और आप उससे कवच छीन लेना।"

विज्ञान और तंत्र का मिलन:

रुद्र ने एक रिमोट दबाया और गुफा के चारों ओर लेज़र की दीवारें खड़ी हो गईं। उसने कालनेमि को वह 'ट्रैकिंग डिवाइस' दिखाया जो आर्यन के शरीर से निकलने वाली दैवीय ऊर्जा को ट्रैक कर रहा था।

रुद्र मन ही मन सोच रहा था—"एक बार मुझे संजीवनी मिल जाए, फिर न मुझे इस राक्षस की ज़रूरत होगी और न ही किसी रक्षक की। मैं खुद ही अगला ईश्वर बनूँगा।"

दृश्य 14: काल-गुहा की कैद और मीरा का साहस

काल-गुहा के सबसे निचले हिस्से में, जहाँ दीवारों से खौफनाक आवाज़ें आती थीं, मीरा को जादुई जंजीरों से बाँधकर रखा गया था। वह अप्सरा थी, लेकिन इस वक्त उसके चेहरे पर थकान और दर्द साफ दिख रहा था। फिर भी, उसकी आँखों की चमक फीकी नहीं पड़ी थी।

अंधेरे से निकलकर कालनेमि उसके सामने आया। उसकी भारी पदचाप से गुफा कांप रही थी। उसने अपनी लाल आँखें मीरा पर टिकाईं और एक डरावनी मुस्कुराहट के साथ बोला:

"चित्रांगदा! देख, तेरी क्या हालत हो गई है। तू उस नश्वर मानव के मोह में स्वर्ग से भी हाथ धो बैठी और अब यहाँ इस काल-कोठरी में सड़ रही है। क्यों अपना जीवन बर्बाद कर रही है?"

मीरा ने तिरस्कार भरी नज़रों से उसे देखा, पर कुछ नहीं कहा। कालनेमि ने झुककर उसके चेहरे के करीब अपनी आवाज़ लाई और फुसफुसाते हुए 'सौदा' पेश किया:

"देख, तू चाहे तो अभी आज़ाद हो सकती है। बस तुझे एक छोटा सा काम करना है। आर्यन तुझसे प्यार करता है, वह तेरी बात कभी नहीं टालेगा। तू बस उससे वह कवच-कुंडल और संजीवनी का बीज मांग ले और मुझे सौंप दे। जैसे ही वह मेरे हाथ में होंगे, मैं तुझे छोड़ दूँगा। तू जहाँ चाहे जा सकेगी—स्वर्ग या उस मानव के पास।"

मीरा के चेहरे पर एक ठंडी मुस्कान आई। उसने अपनी पूरी ताकत जुटाई और सीधे कालनेमि के भयानक चेहरे पर थूक दिया।

वह निर्भीकता से गरजी, "तूने मुझे पहचाना नहीं कालनेमि! मैं देवराज की अप्सरा बाद में हूँ, पहले उस रक्षक की अर्धांगिनी हूँ जिसने तुझ जैसे हज़ारों राक्षसों को धूल चटाने की कसम खाई है। तूने उसे सिर्फ एक इंसान समझा है? वह 'The Last Sanjivani' है!"

कालनेमि गुस्से से पागल हो गया, उसने हाथ उठाया, लेकिन मीरा की आवाज़ और भी बुलंद हो गई:

"मार मुझे! लेकिन याद रख, तू जितना मुझे तड़पाएगा, उसकी तलवार उतनी ही पैनी होगी। वह आ रहा है कालनेमि... वह तुझे इसी गुफा में दफन करने ज़रूर आएगा। और जब वह आएगा, तो तेरा यह विज्ञान और तेरा यह अहंकार, कुछ भी काम नहीं आएगा!"

कालनेमि दहाड़ा और गुफा से बाहर निकल गया, लेकिन मीरा की बातों ने उसके मन में डर का एक छोटा सा बीज बो दिया था। उधर, डॉ. रुद्र यह सब अपनी स्क्रीन पर देख रहा था और उसके हाथ अपने अगले आविष्कार पर और तेज़ी से चलने लगे।

दृश्य 15: प्रलय की आहट और आर्यन का क्रोध

मीरा की ललकार काल-गुहा की दीवारों में गूँज रही थी। कालनेमि गुस्से में तमतमाता हुआ डॉ. रुद्र के पास पहुँचा।

"उस लड़की का साहस बढ़ता जा रहा है, रुद्र! इससे पहले कि वह रक्षक यहाँ पहुँचे, मुझे वो कवच और संजीवनी चाहिए!" कालनेमि ने अपनी गदा ज़मीन पर पटकी जिससे पूरी लैब हिल गई।

उधर, जंगल के बीचों-बीच आर्यन खड़ा था। उसने अपनी आँखें बंद कीं और उस तांबे के ताबीज पर अपना हाथ रखा। उसे अपनी बंद आँखों के पीछे मीरा की आवाज़ सुनाई दी और उसे उसकी सिसकियाँ और कालनेमि की साज़िश का एहसास हुआ।

आर्यन की आँखों में अब सिर्फ़ प्यार नहीं, बल्कि रुद्र का अवतार था। उसने अपना हाथ हवा में उठाया और अचानक वह दिव्य कवच उसके शरीर पर चिपक गया। उसके हाथों में बिजली जैसी ऊर्जा की एक तलवार प्रकट हुई।

उसने दहाड़कर कहा, "कालनेमि! तूने उसे छूने की हिम्मत की है, अब तू अपनी आखिरी साँसें गिनना शुरू कर दे!"

महा-युद्ध का प्रारंभ:

आर्यन किसी तूफान की तरह काल-गुहा की ओर बढ़ा। रास्ते में डॉ. रुद्र के स्वचालित रोबोटिक टैंक और कालनेमि के राक्षस सैनिक तैनात थे। डॉ. रुद्र ने अपनी स्क्रीन पर देखते हुए बटन दबाया—"एक्टिवेट लेज़र ग्रिड!"

हज़ारों नीली लेज़र किरणें आर्यन की ओर लपकीं, लेकिन जैसे ही वे उसके कवच से टकराईं, वे कांच की तरह टूट गईं। आर्यन ने अपनी तलवार से एक विशाल प्रहार किया जिससे गुफा का मुख्य द्वार ताश के पत्तों की तरह ढह गया।

आर्यन अंदर घुस चुका था। सामने हज़ारों की सेना थी, एक तरफ आधुनिक गन और दूसरी तरफ प्राचीन जादुई शक्तियाँ। लेकिन आर्यन, जो अब अमरता का वरदान लिए हुए था, रुकने वाला नहीं था। वह हर वार को चीरता हुआ सीधा उस जगह की ओर बढ़ रहा था जहाँ मीरा कैद थी।

अंतिम संघर्ष और प्रेम की विजय

आर्यन किसी तूफ़ान की तरह सबको रौंदते हुए आगे बढ़ रहा था, लेकिन तभी एक भयानक दहाड़ गूँजी। कालनेमि ने मीरा की गर्दन पर अपनी तलवार रख दी थी।

कालनेमि: "रुक जा छोरे! अगर एक कदम भी आगे बढ़ाया तो इस अप्सरा का सर धड़ से अलग कर दूँगा। अगर इसे ज़िंदा देखना चाहता है, तो अपना कवच और कुंडल मुझे सौंप दे!"

आर्यन रुक गया। मीरा चिल्लाई, "नहीं आर्यन, इसे ये मत देना!" पर आर्यन अपनी मोहब्बत को खोना नहीं चाहता था। उसने जैसे ही अपना कवच और कुंडल त्यागे, कालनेमि ने धोखे से आर्यन पर हमला कर दिया और उसे इतना मारा कि आर्यन लहू-लुहान हो गया। इतने में डॉ. रुद्र ने अपनी मशीन से आर्यन की बची-कुची शक्ति खींचने की कोशिश की।

अपने अहंकार में पागल कालनेमि ने वही किया जिसका डर था—उसने मीरा पर प्रहार कर दिया। मीरा की साँसें थम गईं।

असली शक्ति का एहसास:

मीरा को गिरते देख आर्यन का दिल फट गया। तभी आकाश में भीषण बिजली कड़की और उसे अहसास हुआ कि शक्ति कवच में नहीं, उसके भीतर है। वह अमरता का वरदान और संजीवनी का असली वारिस था। वह लहू-लुहान हालत में खड़ा हुआ, उसका शरीर अब सूरज की तरह चमक रहा था।

एक पल में, आर्यन ने अपनी मुट्ठी कसी और ऐसी दिव्य ऊर्जा छोड़ी कि डॉ. रुद्र की लैब और उसके गुंडे पल भर में राख हो गए। कालनेमि ने अपनी गदा उठाई, पर आर्यन ने उसे हवा में ही पकड़कर चकनाचूर कर दिया और एक ही प्रहार में उस असुर का अंत कर दिया।

संजीवनी का चमत्कार:

आर्यन ने तुरंत संजीवनी का वह दिव्य बीज उठाया। उसने सच्चे मन से प्रार्थना की और उस बूटी का रस मीरा के होंठों पर लगाया। कुछ ही क्षणों में, मीरा की पलकें झपकीं और वह फिर से जीवित हो उठी।

उपसंहार: नई शुरुआत

आर्यन और मीरा वापस उसी गुफा में गए जहाँ से सब शुरू हुआ था। उन्होंने वह कवच और कुंडल वापस उसी दिव्य स्थान पर रख दिए जहाँ से वे आए थे। तभी शून्य में से जाम्बवंत जी की हँसी गूँजी।

जाम्बवंत जी: "शाबाश बेटा! यह तो सिर्फ़ तुम्हारी परीक्षा थी कि क्या तुम बिना शक्तियों के भी धर्म और प्रेम के लिए लड़ सकते हो। कहानी तो अभी शुरू हुई है... पर आज के लिए तुमने जीत हासिल कर ली है।"

अंत:

आर्यन और मीरा अपने घर वापस लौट आए। माँ ने बड़े धूम-धाम से दोनों का स्वागत किया। दोनों की शादी हुई—एक ऐसी शादी जिसमें धरती और स्वर्ग, दोनों का आशीर्वाद था। आर्यन और मीरा अब हमेशा के लिए पति-पत्नी बन गए, और उनकी यह कहानी 'द लास्ट संजीवनी' की विरासत बनकर अमर हो  गई।

— समाप्त —


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