द लास्ट संजीवनी: 2 गुरुपुत्र का सानिध्य
द लास्ट संजीवनी: 2 गुरुपुत्र का सानिध्य
द लास्ट संजीवनी: गुरुपुत्र का सानिध्य
रात का सन्नाटा था, सिर्फ ठंडी हवाओं के चलने की आवाज़ आ रही थी। अचानक आर्यन को सामने एक विशाल छाया दिखाई दी। जैसे-जैसे वह पास गया, उसे एहसास हुआ कि यह कोई साधारण मनुष्य नहीं है। उनके माथे से बहता हुआ वह रक्त और उनकी आँखों में गहरा सन्नाटा... आर्यन समझ गया कि यह कौन हैं।
आर्यन ने तुरंत अपने घुटने टेक दिए और झुककर उनके चरणों की धूल अपने माथे से लगाई।
आर्यन: "हे महान गुरुपुत्र, चिरंजीवी अश्वत्थामा! इस कलयुग के तुच्छ मानव का प्रणाम स्वीकार करें। इतिहास के पन्नों में आपके शौर्य और आपकी पीड़ा, दोनों को पढ़ा है। आज साक्षात् आपके दर्शन पाकर मेरा जीवन धन्य हो गया।"
अश्वत्थामा ने अपनी भारी पलकें उठाईं। उनकी आवाज़ ऐसी थी मानो गुफाओं के भीतर कोई पत्थर गूँज रहा हो।
अश्वत्थामा: "उठो युवक! इस युग में, जहाँ लोग अपनों को भूल चुके हैं, तुम एक श्रापित योद्धा को इतना सम्मान दे रहे हो? तुम यहाँ क्या खोज रहे हो?"
आर्यन की आँखों में आँसू भर आए। उसने हाथ जोड़कर अपनी पीड़ा कह सुनाई।
आर्यन: "हे महाबली, मैं यहाँ अपने लिए नहीं आया। मेरी सिया, जो मेरे जीने का एकमात्र आधार है, वह मृत्यु की दहलीज पर खड़ी है। आधुनिक चिकित्सा हार चुकी है। मुझे उस दिव्य संजीवनी की तलाश है जिसका वर्णन शास्त्रों में है। सुना है उसका एक स्पर्श मरे हुए में भी प्राण फूँक देता है। क्या आप इस असहाय प्रेमी की मदद करेंगे?"
अश्वत्थामा ने आर्यन की तड़प देखी। उन्होंने धीरे से अपने माथे के उस कभी न भरने वाले घाव को छुआ।
अश्वत्थामा: "संजीवनी... वह केवल जीवन नहीं देती, वह प्रारब्ध को भी बदल सकती है। युग बीत गए इस दर्द को सहते हुए। अगर तुम उस दिव्य ज्योति तक पहुँच पाए, तो शायद मेरे इस घाव को भी शीतल कर सको। चलो, मैं तुम्हें उस मार्ग की ओर ले चलता हूँ जो देवताओं ने मनुष्यों की नज़रों से छिपा दिया था।"
द लास्ट संजीवनी: समय का ठहराव और प्राचीन रहस्य
अश्वत्थामा आर्यन को एक ऐसी गुप्त गुफा के भीतर ले गए जहाँ पहुँचते ही बाहर की दुनिया का शोर शांत हो गया। वहाँ गुफा की दीवारों पर नीली चमक थी। अचानक, गुफा के केंद्र में पहुँचते ही सब कुछ थम गया—हवा की गति रुक गई और समय का चक्र जैसे जम गया।
अश्वत्थामा: "यहाँ समय का पहिया नहीं घूमता, आर्यन। इसलिए यहाँ हम सुरक्षित हैं। अब ध्यान से सुनो... तुम जिसे साधारण कैंसर समझ रहे हो, वह कोई बीमारी नहीं बल्कि एक 'दैवीय क्षरण' (Divine Decay) है।"
आर्यन चौंक गया, "दैवीय क्षरण? आप क्या कह रहे हैं गुरुपुत्र?"
अश्वत्थामा: "तुम्हारी सिया कोई साधारण स्त्री नहीं है। वह इंद्रलोक की एक दिव्य आत्मा है जिसे इंद्रदेव ने एक भूल के कारण मृत्युलोक (पृथ्वी) पर भेज दिया था। जब एक दिव्य जीव इंसान बनता है, तो उसका शरीर उस ऊर्जा को संभाल नहीं पाता, जिसे तुम आज 'कैंसर' कहते हो। पुराणों में इसे 'विस्मृति श्राप' कहा गया है—जहाँ शरीर अपनी दिव्यता को भूलकर गलने लगता है।"
आर्यन की आँखें फटी रह गईं। अश्वत्थामा ने आगे कहा:
"इसका इलाज केवल वह दिव्य संजीवनी ही है, जो उसे वापस उसकी दिव्यता की याद दिला सके। लेकिन याद रखना, संजीवनी पाना सरल नहीं होगा। तुम्हें 'माया-जाल' को पार करना होगा। आगे एक ऐसा मार्ग आएगा जहाँ तुम्हें अपनी सबसे प्रिय वस्तु का त्याग करना पड़ सकता है। क्या तुम तैयार हो?"
आर्यन ने मजबूती से अपना हाथ मुट्ठी में भींचा, "अगर उसे बचाने के लिए मुझे खुद को भी मिटाना पड़े, तो मैं पीछे नहीं हटूंगा। बस मार्ग बताइये।"
अश्वत्थामा: "आगे बढ़ो, जहाँ तीन नदियों का गुप्त संगम होता है। वहाँ तुम्हें 'काल-भैरव' के द्वारपाल मिलेंगे। उनसे केवल सत्य ही तुम्हें आगे ले जा सकता है। जाओ पुत्र, मेरा आशीर्वाद और मेरी रक्षा की शक्ति तुम्हारे साथ है।"
द लास्ट संजीवनी: संगम और द्वारपालों की पहेली
अश्वत्थामा ने अपनी विशाल भुजा से गुफा के एक घने अंधेरे कोने की ओर इशारा किया। "उस अंधकार में उतर जाओ, आर्यन। वहीं तुम्हें तीन अदृश्य धाराओं—बोध, भावना और काल का संगम मिलेगा। याद रखना, वहां काल-भैरव के द्वारपाल मिलेंगे, जो बल से नहीं, केवल बुद्धि और सत्य से परास्त होते हैं।"
आर्यन उस अंधेरे की ओर बढ़ गया। जैसे-जैसे वह आगे बढ़ा, उसे पानी के गिरने की आवाज़ सुनाई दी, लेकिन पानी दिख नहीं रहा था। अचानक, एक मोड़ मुड़ते ही उसे तीन रंग की धाराएं एक बड़े कुंड में गिरती दिखीं—एक दूध जैसी सफेद, एक रक्त जैसी लाल और एक कोयले जैसी काली।
वहीँ द्वार पर दो विशालकाय परछाइयाँ उभरीं। उनकी आँखें धधकते अंगारों जैसी थीं। काल-भैरव के द्वारपालों ने अपना त्रिशूल आर्यन के सीने पर अड़ा दिया।
पहला द्वारपाल: "ठहरो मर्त्य! इस द्वार के पार केवल वही जा सकता है जो 'समय' के खेल को समझता हो। हमारे तीन प्रश्नों का उत्तर दो, वरना यह संगम ही तुम्हारी समाधि बन जाएगा।"
आर्यन: "पूछिये, मेरी सिया के प्राणों के लिए मैं हर चुनौती स्वीकार करता हूँ।"
पहला प्रश्न (समय पर):
"वह क्या है जो बीत जाए तो याद बनता है, जो आने वाला हो तो ख्वाब बनता है, लेकिन जो 'अभी' है, वह इंसान को क्या बनाता है?"
आर्यन का उत्तर: "वह इंसान को 'कर्म' (Action) करने का अवसर बनाता है। क्योंकि न बीता हुआ समय वापस आता है, न आने वाला निश्चित है, केवल वर्तमान ही वह रणभूमि है जहाँ हम अपना भाग्य बदलते हैं।"
द्वारपालों के चेहरों पर एक चमक आई।
दूसरा प्रश्न (त्याग पर - सबसे महत्वपूर्ण):
"उस प्रेम की कीमत क्या है, जिसे पाने के लिए तुम उसे ही खो सकते हो? यदि संजीवनी ने सिया को बचा लिया, लेकिन बदले में उसने तुम्हें पूरी तरह भुला दिया, तो क्या तुम उसे वह संजीवनी दोगे?"
आर्यन का उत्तर: (थोड़ी देर रुककर, दृढ़ता से) "हाँ! क्योंकि प्रेम का अर्थ उसे पाना नहीं, उसे सुरक्षित देखना है। यदि वह जीवित रहती है और मुझे भूल जाती है, तो यह मेरे प्रेम की हार नहीं, उसकी जीत होगी। मेरा प्रेम उसकी स्मृति में नहीं, उसके अस्तित्व में है।"
द्वारपाल पीछे हट गए और संगम का जल दो हिस्सों में बंट गया, जिससे अंदर जाने का रास्ता साफ़ हो गया।
तीसरा और अंतिम प्रश्न: मृत्यु और जीवन का रहस्य
दूसरे सवाल का जवाब सुनकर द्वारपालों ने अपना त्रिशूल थोड़ा नीचे किया, लेकिन रास्ता अभी भी पूरी तरह साफ नहीं हुआ था। दूसरा द्वारपाल आगे बढ़ा, उसकी आवाज़ किसी पहाड़ के टूटने जैसी भारी थी।
दूसरा द्वारपाल: "आर्यन, तुमने कर्म और प्रेम को तो समझ लिया। पर अब आखिरी सत्य की बारी है। ध्यान से सुनो..."
तीसरा प्रश्न:
"वह कौन सी वस्तु है जो जन्म से पहले भी तुम्हारी थी, और मृत्यु के बाद भी तुम्हारी ही रहेगी? वह न तो यह शरीर है, न तुम्हारी यादें, और न ही यह संजीवनी। अगर तुम उसे नहीं पहचानते, तो तुम इस दिव्य शक्ति को कभी धारण नहीं कर पाओगे।"
गुफा में सन्नाटा छा गया। आर्यन ने अपनी आँखें बंद कीं और अश्वत्थामा की उन बातों को याद किया जो उन्होंने समय के ठहराव के दौरान कही थीं। उसने अपने दिल की धड़कन को महसूस किया।
आर्यन का उत्तर: (एक गहरी सांस लेकर) "वह वस्तु है—'सत्य का संकल्प' (Dharma/Soul's Purpose)। शरीर नश्वर है, यादें धुंधली पड़ जाती हैं, लेकिन एक आत्मा ने जिस उद्देश्य के लिए जन्म लिया है और जो वचन उसने सृष्टि को दिया है, वह कभी नहीं मिटता। मेरा संकल्प सिया को बचाना और इस दिव्य शक्ति की रक्षा करना है, यही मेरा वह 'अपना' है जो मुझसे कोई नहीं छीन सकता।"
द्वारपालों ने एक-दूसरे की ओर देखा और पहली बार उनके डरावने चेहरों पर एक दिव्य मुस्कान आई। उन्होंने अपने त्रिशूल पूरी तरह हटा लिए।
द्वारपाल: "भीतर जाओ, साहसी युवक। तुम 'सत्य' के अधिकारी हो।"
जैसे ही आर्यन अंदर कदम रखता है, उसे संगम के बीचों-बीच एक छोटा सा टापू दिखता है, जहाँ हवा में तैरती हुई वह दिव्य संजीवनी अपनी पूरी आभा के साथ मौजूद है। लेकिन वहाँ पहुँचने के लिए उसे उन तीन धाराओं (सफ़ेद, लाल और काली) के बीच से होकर गुज़रना है।
महामुहूर्त: रावण और अमर आर्यन का संवाद
जैसे ही रावण का विशाल स्वरूप प्रकट हुआ, आर्यन ने बिना डरे उन्हें प्रणाम किया। रावण की बीसों आँखें आर्यन को ऊपर से नीचे तक देख रही थीं, मानो वे उसके भीतर के सच को पढ़ रही हों।
रावण: (गजराज जैसी भारी आवाज़ में) "उठो युवक! तुम्हारे भीतर एक ऐसी ऊर्जा है जो इस कलियुग के मनुष्यों में नहीं होती। मैं देख सकता हूँ कि तुम्हारी काया पर मृत्यु का कोई निशान नहीं है। कौन हो तुम?"
आर्यन: "हे दशकंठ, आपने सही पहचाना। मैं उस युग का एक अंश हूँ जिसे लोग भूल चुके हैं। मुझे स्वयं महाबली जाम्बवंत जी ने अमरत्व का वरदान दिया है। इसीलिए मैं यहाँ एक भिक्षुक बनकर नहीं, बल्कि उस क्षमता के साथ आया हूँ जो मुझे मेरे मार्गदर्शक से मिली है।"
रावण की आँखों में थोड़ा सम्मान झलका। "जाम्बवंत! मेरे पिता-तुल्य, जो त्रेता में भी महान थे और द्वापर में भी। उनका वरदान तुम्हारे पास है, इसका मतलब तुमने अपने जीवन में कोई बड़ा संकल्प लिया होगा।"
आर्यन: "प्रभु, मेरा संकल्प मेरी सिया है। मैंने सुना था कि आपका श्राप कभी खाली नहीं जाता, लेकिन आज मैं आपसे यह पूछने आया हूँ कि क्या एक अमर व्यक्ति उस श्राप को काट सकता है? आप इतनी सदियों से यहाँ इस गुफा में जीवित कैसे हैं और क्या आप मुझे उस संजीवनी तक पहुँचने का रास्ता दिखाएंगे?"
रावण: (मुस्कुराते हुए) "अमरत्व एक वरदान भी है और एक बोझ भी, आर्यन। मैं यहाँ इसलिए हूँ क्योंकि महादेव ने मुझे इस दिव्य शक्ति का रक्षक बनाया है। मैं 'समय के चक्रव्यूह' (Time Loop) में बंधा हूँ, जहाँ न मैं पूरी तरह मर सकता हूँ, न पूरी तरह जीवित हूँ। लेकिन तुम... तुम अमर होकर भी एक नश्वर (mortal) स्त्री के लिए तड़प रहे हो?"
आर्यन: "वह साधारण नहीं है प्रभु, वह इंद्रलोक की दिव्यता है। अगर मैं अमर हूँ तो उसे मृत्यु के हवाले कैसे छोड़ दूँ? मुझे बस उस संजीवनी का वह 'दिव्य रूप' चाहिए जिसके बारे में अश्वत्थामा जी ने बताया था।"
आर्यन: "वह साधारण नहीं है प्रभु, वह इंद्रलोक की दिव्यता है। अगर मैं अमर हूँ तो उसे मृत्यु के हवाले कैसे छोड़ दूँ? मुझे बस उस संजीवनी का वह 'दिव्य रूप' चाहिए जिसके बारे में अश्वत्थामा जी ने बताया था।"
रावण: (गंभीर होते हुए) "जाम्बवंत का वरदान और तुम्हारी अमरता... यह मेल साधारण नहीं है, आर्यन। शायद इसीलिए तुम आज यहाँ मेरे सामने खड़े हो। लेकिन याद रखना, संजीवनी का वह 'दिव्य रूप' जिसे तुम खोज रहे हो, वह केवल एक औषधि नहीं है। वह 'ब्रह्मांड की चेतना' है। उसे प्राप्त करने का अर्थ है—प्रकृति के नियमों को चुनौती देना।"
रावण ने अपनी आँखों को मूँद लिया और पूरी गुफा में एक मंत्रमयी ध्वनि गूँजने लगी। फिर उन्होंने धीरे से कहा:
"मैं तुम्हें वह मार्ग दिखा सकता हूँ, लेकिन एक शर्त है। वह संजीवनी तुम्हें तभी प्राप्त होगी जब तुम अपनी अमरता की शक्ति का एक अंश उस द्वार को खोलने में लगाओगे। क्या तुम अपनी शक्ति कम करने को तैयार हो? और सुनो, उस मार्ग पर तुम्हें 'शून्य' का सामना करना पड़ेगा, जहाँ न मैं तुम्हारी मदद कर पाऊँगा और न अश्वत्थामा। वहाँ केवल तुम्हारा संकल्प ही तुम्हारी मशाल होगा।"
आर्यन ने बिना एक पल सोचे रावण की आँखों में देखा और कहा, "प्रभु, अगर मेरी अमरता सिया के काम न आए, तो ऐसी शक्ति का मैं क्या करूँगा? मैं उस शून्य में उतरने के लिए तैयार हूँ।"
द लास्ट संजीवनी: शून्य की महायात्रा (पर्व - 1)
1. शून्य का रहस्य और अमरता की कीमत
आर्यन ने जैसे ही उस अंधकार में प्रवेश किया, उसे एहसास हुआ कि यह कोई साधारण अंधेरा नहीं था। यह 'शून्य' था—वह स्थान जहाँ सृष्टि के निर्माण से पहले की शांति व्याप्त थी। यहाँ न प्रकाश था, न ध्वनि, और न ही दिशा। यहाँ केवल वही जीवित रह सकता था जिसकी चेतना अखंड हो।
आर्यन के शरीर से निकलने वाली सुनहरी आभा, जो उसे जाम्बवंत जी के अमरत्व के वरदान से मिली थी, उस अंधेरे से टकरा रही थी। हर कदम जो आर्यन आगे बढ़ाता, उसे ऐसा लगता मानो उसके शरीर से हज़ारों सुइयां चुभ रही हों। शून्य उसकी अमरता को सोख रहा था।
अचानक, उसके सामने एक विशाल 'काल-चक्र' प्रकट हुआ। यह चक्र घूम रहा था और उसके हर आरे (spoke) पर आर्यन की पिछली ज़िंदगियों की झलकियाँ थीं। उसने देखा कि वह हर युग में सिया को खोजता रहा है। कभी वह त्रेता में एक सैनिक था, कभी द्वापर में एक साधारण ग्वाला। हर बार नियति ने उन्हें अलग किया था।
आर्यन का आत्म-मंथन:
उस परछाईं ने फिर से फुसफुसाया, "देखो आर्यन, तुम इस चक्र में फंसे हुए हो। जितनी बार तुम उसे बचाओगे, उतनी ही बार काल उसे तुमसे छीन लेगा। अपनी अमरता को बचाओ, इस संजीवनी को छोड़ दो। तुम मुक्त हो जाओगे।"
आर्यन ने अपनी मुट्ठी भींची। उसके नाखून उसकी हथेली में गड़ गए, लेकिन उसे दर्द नहीं हुआ। उसने चिल्लाकर कहा, "मुक्ति वह नहीं जो अकेले मिले! मुक्ति वह है जो प्रेम को पूर्ण करे। यदि काल का यही पहिया है, तो आज मैं इस पहिये को ही रोक दूँगा!"
2. इंद्रदेव का हस्तक्षेप और अश्वत्थामा की दुविधा
गुफा के बाहर, वातावरण अचानक अशांत हो गया। आसमान में कड़कती बिजलियाँ और गरजते बादल इस बात का संकेत थे कि स्वर्ग के राजा इंद्रदेव प्रसन्न नहीं हैं। अश्वत्थामा ने अपनी आँखें खोलीं और अपने धनुष को कसकर पकड़ लिया। उन्हें पता था कि इंद्र कभी नहीं चाहेंगे कि उनकी दिव्य अप्सरा (सिया) दोबारा अमर होकर पृथ्वी पर रहे।
अश्वत्थामा ने आकाश की ओर देखकर गरजते हुए कहा, "हे सुरपति! अपनी मर्यादा में रहें। यह युवक कोई साधारण चोर नहीं है। यह जाम्बवंत का शिष्य है।"
तभी आकाश से एक दिव्य गूँज सुनाई दी, "अश्वत्थामा, तुम एक अपराधी की रक्षा कर रहे हो। वह संजीवनी का दिव्य रूप चुराने गया है, जो केवल देवताओं के लिए सुरक्षित है।"
अश्वत्थामा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, "देवराज, जो शक्ति किसी के प्राण न बचा सके, वह दिव्य कैसे हुई? आज यह युद्ध केवल आर्यन का नहीं, बल्कि मेरे जैसे श्रापित योद्धा की प्रतीक्षा का भी है। मैं उसे इस द्वार से बाहर निकलने तक सुरक्षा दूँगा।"
3. शून्य के भीतर: तीन धाराओं का रहस्य
आर्यन अब शून्य के उस केंद्र पर था जहाँ वे तीन नदियाँ—बोध, भावना और काल—एक साथ मिल रही थीं। यहाँ पहुँचते ही उसे समझ आया कि रावण ने उसे यहाँ क्यों भेजा था।
सफ़ेद धारा (बोध): यहाँ आर्यन को ब्रह्मांड का समस्त ज्ञान मिला। उसे पता चला कि सिया को कैंसर क्यों हुआ—इंद्रलोक की ऊर्जा जब मानव शरीर के 'नश्वर डीएनए' से टकराती है, तो वह कोशिकाओं को जलाने लगती है। इसे ही आधुनिक दुनिया कैंसर कहती है।
लाल धारा (भावना): यहाँ आर्यन को सिया का सारा दर्द महसूस हुआ। वह हर सुई जो उसे चुभी थी, वह हर आंसू जो उसने अस्पताल के बिस्तर पर बहाया था—वह सब आर्यन के दिल को चीरने लगा।
काली धारा (काल): यह सबसे खतरनाक थी। यहाँ आर्यन को अपनी मृत्यु की संभावना दिखी। यद्यपि वह अमर था, लेकिन इस शून्य में उसकी अमरता 'खर्च' हो रही थी।
4. संजीवनी का साक्षात् प्रकट होना
जैसे ही आर्यन ने अपनी अमरता का लगभग 40% हिस्सा उस काली धारा को समर्पित किया, शून्य में एक धमाका हुआ। वह काला पर्दा हट गया और सामने एक ऊँचे स्तंभ पर वह दिव्य संजीवनी तैरती हुई दिखी।
वह कोई पौधा नहीं था। वह एक 'हृदय' की तरह धड़क रही थी। उसका रंग पारभासी (translucent) था और उसके भीतर से हज़ारों तंतु (tendrils) निकल रहे थे जो सीधे आकाश से जुड़े थे।
जैसे ही आर्यन ने उसे छुआ, उसके दिमाग में रावण के वे अंतिम शब्द गूँजे: "जो अमरता का त्याग करेगा, वही जीवन का सृजन करेगा।"
संजीवनी ने आर्यन से बात की (बिना शब्दों के, सीधा चेतना में): "हे जाम्बवंत-पुत्र, तुम मुझे ले जा सकते हो। पर याद रहे, मेरे स्पर्श के बाद सिया का कैंसर तो खत्म हो जाएगा, पर वह अब तुम्हारी दुनिया का हिस्सा नहीं रहेगी। वह एक 'जीवित ज्योति' बन जाएगी। क्या तुम उसे केवल देखने के लिए जीवित रहोगे, या उसे स्पर्श करने की लालसा छोड़ दोगे?"
द लास्ट संजीवनी (पर्व - 2): कलयुग का कोप और अमरता की प्यास
अश्वत्थामा और इंद्रदेव के बीच का वह दिव्य संवाद अभी समाप्त भी नहीं हुआ था कि हिमालय की तलहटी में एक नया शोर गूँजने लगा। यह शोर देवताओं का नहीं, बल्कि उन इंसानों का था जो अपनी लालची आँखों में 'अमरता' का सपना सजाए बैठे थे।
आर्यन और अश्वत्थामा ने जो गुप्त मार्ग खोला था, उससे निकलने वाली दिव्य ऊर्जा के संकेतों को आधुनिक वैज्ञानिकों और सत्ता के भूखे कॉर्पोरेट दिग्गजों ने अपने सैटेलाइट्स के ज़रिए पकड़ लिया था।
1. कलयुग का हमला:
सैकड़ों बख्तरबंद गाड़ियाँ, हेलिकॉप्टर और भाड़े के सैनिकों की एक विशाल फौज गुफा के मुहाने पर पहुँच चुकी थी। उनका नेतृत्व कर रहा था 'विक्रम खन्ना', एक ऐसा अरबपति जो मरने से डरता था और किसी भी कीमत पर आर्यन की तरह अमर होना चाहता था।
विक्रम ने लाउडस्पीकर पर चिल्लाकर कहा, "आर्यन! हम जानते हैं तुम अंदर हो। हमें वह संजीवनी चाहिए और हमें वह रहस्य चाहिए जिससे तुम अमर हुए। अगर तुम बाहर नहीं आए, तो हम इस पूरी पहाड़ी को बारूद से उड़ा देंगे!"
2. अश्वत्थामा का रौद्र रूप:
अश्वत्थामा ने जब इन तुच्छ मनुष्यों को अपनी मर्यादा लांघते देखा, तो उनकी आँखों में क्रोध की ज्वाला धधक उठी। उन्होंने अपने धनुष पर एक अदृश्य बाण चढ़ाया।
अश्वत्थामा की आवाज़ पहाड़ों को चीरती हुई गूँजी, "मूर्ख मानवों! जिस अमरता को तुम वरदान समझ रहे हो, वह एक अंतहीन बोझ है। तुम इसे सम्हाल नहीं पाओगे। लौट जाओ, वरना आज यह भूमि कलयुग के रक्त से लाल हो जाएगी!"
लेकिन इंसान के भीतर का असुर जाग चुका था। उन्होंने अश्वत्थामा पर गोलियों की बौछार कर दी। गोलियां अश्वत्थामा के शरीर से टकराकर ऐसे गिर रही थीं जैसे फूलों की बारिश हो रही हो, पर इस अपमान ने 'गुरुपुत्र' के भीतर के योद्धा को जगा दिया।
3. आर्यन का बाहर आना और सिया का नया रूप:
उधर शून्य के भीतर, आर्यन ने वह कठिन चुनाव किया। उसने संजीवनी को इस तरह सक्रिय किया कि वह और सिया 'युग-युगांतर' के लिए साथ रहें। संजीवनी की ऊर्जा ने सिया के शरीर से कैंसर के ज़हर को खींचकर उसे एक दिव्य प्रकाश में बदल दिया।
जैसे ही आर्यन और सिया हाथ पकड़कर गुफा से बाहर निकले, एक अद्भुत दृश्य दिखा। सिया के चारों ओर एक नीली आभा थी और आर्यन के शरीर से सुनहरी किरणें निकल रही थीं। वे दोनों अब साधारण इंसान नहीं थे।
4. जनता का पागलपन:
जब सैनिकों ने आर्यन को देखा, तो वे गोलियां चलाना भूल गए। उनकी आँखों में श्रद्धा नहीं, बल्कि 'भूख' थी।
"देखो! वही है वह अमर लड़का! इसका खून निकालो, इसके अंगों को लैब में ले चलो! हमें भी अमर होना है!" भीड़ चिल्लाने लगी।
हज़ारों लोग पहाड़ियों पर चढ़ने लगे, हर कोई आर्यन को छूना चाहता था ताकि उसकी अमरता का कुछ हिस्सा उन्हें मिल जाए। यह नज़ारा भयानक था—इंसान अब ज़ोंबी (zombies) की तरह व्यवहार कर रहे थे, जो ज्ञान के लिए नहीं, बल्कि केवल 'अनंत जीवन' के लिए पागल थे।
5. आर्यन की दुविधा और रावण की अंतिम सलाह:
आर्यन ने देखा कि लोग एक-दूसरे को कुचल रहे थे ताकि वे गुफा के पास पहुँच सकें। उसे समझ आया कि अगर उसने संजीवनी का रहस्य यहाँ छोड़ा, तो दुनिया नर्क बन जाएगी।
तभी उसके कान में रावण की आवाज़ गूँजी, "आर्यन, देखो! यही है वह कारण जिसकी वजह से मैंने इस संजीवनी को छिपाया था। इंसान शक्ति का पात्र नहीं है। यदि तुम इन्हें अमरता दोगे, तो पाप कभी समाप्त नहीं होगा। तुम्हें अब एक 'कठोर निर्णय' लेना होगा।"
आर्यन ने सिया की ओर देखा। सिया की आँखों में अब एक देवी की शांति थी। उसने आर्यन का हाथ ज़ोर से पकड़ा और कहा, "आर्यन, इन्हें अमरता नहीं, 'सत्य' की ज़रूरत है। हमें यहाँ से ओझल होना होगा।"
द लास्ट संजीवनी: कलयुग का रण और महाप्रयाण
1. आधुनिक सेना और प्राचीन अस्त्रों का आमना-सामना
हिमालय की चोटियों पर आधुनिक हेलिकॉप्टरों के रोटर्स की आवाज़ गूँज रही थी। विक्रम खन्ना की निजी सेना ने पूरी पहाड़ी को घेर लिया था। उनके पास लेज़र-गाइडेड मिसाइलें और ऐसी तकनीक थी जो किसी भी चीज़ को राख कर सकती थी। लेकिन गुफा के द्वार पर खड़ा वह सात फुट लंबा योद्धा, अश्वत्थामा, विचलित नहीं था।
जैसे ही पहली मिसाइल दागी गई, अश्वत्थामा ने अपनी उंगलियों से हवा में एक चक्र बनाया। एक प्राचीन 'अभिमंत्रित कवच' प्रकट हुआ और वह मिसाइल हवा में ही फूल की तरह बिखर गई।
अश्वत्थामा की गर्जना गूँजी, "मूर्ख नश्वर! तुम विज्ञान के खिलौनों से उस शक्ति को चुनौती दे रहे हो जिसने ब्रह्मांड को बनते देखा है?" उन्होंने अपने धनुष से एक 'वायव्य अस्त्र' छोड़ा, जिससे ऐसा चक्रवात उठा कि तीन हेलिकॉप्टर ताश के पत्तों की तरह आपस में टकराकर गिर गए।
2. आर्यन और सिया का महामिलन
उसी क्षण, गुफा के भीतर से एक तीव्र नीली और सुनहरी रोशनी फूटी। आर्यन बाहर निकला, उसके एक हाथ में दिव्य संजीवनी की धधकती ज्योति थी और दूसरे हाथ में सिया का हाथ। सिया अब पूरी तरह बदल चुकी थी। उसके शरीर के भीतर से एक पारभासी चमक आ रही थी, और उसकी आँखों में अब कैंसर का दर्द नहीं, बल्कि एक शाश्वत शांति थी।
जैसे ही वे बाहर आए, भीड़ का पागलपन चरम पर पहुँच गया। लोग चिल्लाने लगे, "वह देखो! वही है अमरता का स्रोत! इसे पकड़ लो!" हज़ारों लोग, जिनमें वैज्ञानिक, सैनिक और आम लोग शामिल थे, ज़ोंबी की तरह पहाड़ियों पर चढ़ने लगे। वे संजीवनी को छीनने के लिए एक-दूसरे का गला काटने को तैयार थे।
3. रावण का अंतिम शब्द और श्राप का रहस्य
आर्यन ने जब यह वीभत्स दृश्य देखा, तो उसे रावण की चेतावनी याद आई। तभी उसके मन के भीतर रावण का वह 'श्रापित शब्द' गूँजा—"विस्मृति" (Oblivion)।
रावण की छाया उसके पीछे प्रकट हुई और धीरे से फुसफुसाई, "आर्यन, यदि तुम इन्हें अमरता दोगे, तो ये राक्षस बन जाएंगे। यदि तुम इन्हें सत्य दिखाओगे, तो ये सह नहीं पाएंगे। अपनी अमरता की शक्ति का उपयोग करो और इस पूरी घाटी को 'समय के पर्दे' के पीछे छिपा दो।"
आर्यन समझ गया। उसने अपनी बची हुई 60% अमरता की ऊर्जा को संजीवनी की ज्योति के साथ मिला दिया।
4. महायुद्ध: अश्वत्थामा का रौद्र रूप और इंद्र का हस्तक्षेप
तभी आकाश फट गया और इंद्रदेव अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर प्रकट हुए। "अश्वत्थामा! आर्यन! यह संजीवनी मृत्युलोक के लिए नहीं है। इसे वापस सौंप दो, वरना स्वर्ग का वज्र इस पूरी घाटी को नष्ट कर देगा!"
अश्वत्थामा ने हंसते हुए कहा, "देवराज! जब यह कन्या मर रही थी, तब आप कहाँ थे? आज जब एक मनुष्य ने अपनी अमरता दांव पर लगाकर इसे बचाया है, तो आप अपना अधिकार जताने आ गए? आज गुरुपुत्र अश्वत्थामा आपसे युद्ध करेगा!"
आसमान में वज्र और धरती पर अश्वत्थामा के ब्रह्मास्त्रों का टकराव होने ही वाला था कि आर्यन ने अपनी शक्ति का विस्फ़ोट किया।
5. अदृश्य लोक की ओर महाप्रयाण
आर्यन ने संजीवनी को हवा में ऊपर उछाला। एक विशाल सुनहरी लहर पूरी घाटी में फैल गई। जो लोग लालच में आगे बढ़ रहे थे, वे अचानक अपनी सुध-बुध खोने लगे। यह रावण का वह 'विस्मृति' श्राप था—जो भी संजीवनी को गलत नीयत से छुएगा, वह अपनी याददाश्त खो देगा।
आर्यन ने सिया की आँखों में देखा और कहा, "सिया, अब यहाँ हमारे लिए कोई जगह नहीं है। यह दुनिया अभी इस शक्ति के योग्य नहीं हुई है।"
सिया ने मुस्कुराते हुए कहा, "जहाँ तुम, वहीं मेरा लोक, आर्यन।"
अश्वत्थामा ने पीछे मुड़कर देखा और आर्यन को सिर झुकाकर सम्मान दिया। आर्यन की शक्ति ने एक 'पोर्टल' (द्वार) खोल दिया था जो सीधे सिद्धाश्रम की ओर जाता था—एक ऐसा लोक जहाँ केवल सिद्ध और ऋषि रहते हैं, जहाँ समय का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
6. अश्वत्थामा की मुक्ति का मार्ग
जैसे ही आर्यन और सिया उस दिव्य द्वार की ओर बढ़े, संजीवनी की एक छोटी सी किरण अश्वत्थामा के माथे के उस घाव पर पड़ी। सदियों का वह दर्द, वह जलन, अचानक शीतल हो गई। अश्वत्थामा को अपनी मुक्ति का मार्ग दिख गया। उन्होंने जान लिया कि जब कलियुग के अंत में कल्कि अवतार होगा, तब उनकी यह पीड़ा पूरी तरह समाप्त होगी।
अश्वत्थामा ने अपना धनुष नीचे रखा और हिमालय की अनंत चोटियों की ओर ओझल हो गए।
उपसंहार
अगली सुबह, जब सूरज उगा, तो वहाँ न कोई गुफा थी, न कोई अमर योद्धा। विक्रम खन्ना और उसकी सेना नीचे घाटी में पड़े थे, उन्हें यह तक याद नहीं था कि वे वहाँ क्यों आए थे। दुनिया के लिए 'द लास्ट संजीवनी' एक मिथक बन गई।
लेकिन कहीं, हिमालय की उन वादियों में जो इंसानी नज़रों से ओझल हैं, आर्यन और सिया आज भी साथ हैं। अमर, निस्वार्थ और शांत।
