STORYMIRROR

Ashok Classes

Classics Fantasy Inspirational

4  

Ashok Classes

Classics Fantasy Inspirational

शब्द-प्रलय: Words of Doomsday

शब्द-प्रलय: Words of Doomsday

18 mins
3

अध्याय 1: महाकाल की कचहरी और शब्दों का संकट

​समय और स्थान की सीमाओं से परे, जहाँ आकाश का रंग गहरी स्याही जैसा है, 'द इटरनल लाइब्रेरी' की सभा सजी थी। कक्ष की दीवारें हज़ारों वर्षों के हस्तलेखों से ढकी थीं और हवा में पुराने चर्मपत्रों की खुशबू तैर रही थी। मेज के केंद्र में विलियम शेक्सपियर बैठे थे। उन्होंने अपनी मोरपंख वाली कलम मेज पर रखी और अपनी गहरी आवाज़ में कहा, "दोस्तो, नीचे की दुनिया बदल गई है। मैं अब राजाओं या प्रेतों की नहीं, बल्कि 'सिलिकॉन हार्ट्स' की त्रासदी लिख रहा हूँ—जहाँ मशीनें प्यार का स्वांग रचती हैं, पर उनकी रूहें खाली हैं।"

​उनके बगल में मुंशी प्रेमचंद ने अपना चश्मा ठीक किया और बोले, "शेक्सपियर भाई, आपके नायक महलों की ऊँचाइयों से गिरते हैं, पर मेरा 'होरी' आज भी कलयुग की ज़मीन पर रेंग रहा है। उसका संघर्ष अब रोटी से नहीं, बल्कि उस मशीनी सभ्यता से है जिसने उसकी संवेदनाएँ ही छीन ली हैं।" रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी सफ़ेद दाढ़ी सहलाते हुए खिड़की के पार तारों को देखा और बोले, "मैं एक ऐसी 'गीतांजलि' बुन रहा हूँ जहाँ इंसान का मन बिना किसी डर के हो, पर आज का इंसान तो अपनी ही आभासी (virtual) परछाईं का गुलाम हो चुका है।"

​तभी अंधेरे कोने से एडगर एलन पो (Gothic/Dark Romanticism) की डरावनी और धीमी आवाज़ आई, "तुम सब अभी भी आशा की बात कर रहे हो? मैं तो उस 'अंतिम धड़कन' के बारे में लिख रहा हूँ जो तब सुनाई देगी जब इंसान अपनी ही बनाई मशीनों के नीचे दफन हो जाएगा। डर अब बाहर नहीं, इंसान के भीतर के शून्य में है।" जॉर्ज ऑरवेल (Modern Political/Dystopian) ने अपनी डायरी पटकते हुए कहा, "मैंने तो दशकों पहले चेतावनी दी थी! आज 'बिग ब्रदर' हर जगह है—इंसान की मुट्ठी में मौजूद उस छोटी सी स्क्रीन में, जो उसकी हर सोच पर पहरा दे रही है।"

महादेवी वर्मा ने अपनी सौम्य आँखों से जॉन कीट्स की ओर देखा और कहा, "कीट्स, तुम प्रकृति के सौंदर्य के पुजारी हो, और मैं उन आंसुओं को शब्दों में पिरो रही हूँ जो आज का इंसान पीना भूल गया है।" टी.एस. इलियट और मिल्टन ने सहमति में सिर हिलाया। इलियट बोले, "यह दुनिया अब सचमुच 'The Waste Land' बन चुकी है।"

​तभी, उस शांत पुस्तकालय की छत किसी भयानक वज्रपात के साथ फट गई। चारों ओर काली राख और गंधक का धुआँ फ़ैल गया। कक्ष के बीचों-बीच स्वयं यमराज अपने विशाल और डरावने रूप में प्रकट हुए। उनके हाथ में चमकता हुआ 'काल-दंड' था, जो ब्रह्मांड की प्रलयकारी शक्ति का प्रतीक था। उनकी आवाज़ किसी गिरते हुए पहाड़ की तरह गूँजी:

​"मूर्खों! रुक जाओ! अपनी ये निष्प्राण कलमें फेंक दो! तुम यहाँ बैठकर छंद सजा रहे हो, जबकि नीचे धरती पर इंसानियत की चिता जल रही है! कलयुग अपनी चरम सीमा पार कर चुका है। मेरा नर्क अब उन रूहों से भर गया है जिन्होंने कभी करुणा का एक शब्द नहीं पढ़ा, जिन्होंने केवल नफरत फैलाई है। इंसान का दिल अब मांस का नहीं, पत्थर का हो चुका है।"

​यमराज की आँखों से अग्नि बरस रही थी, "कल्कि का न्याय शुरू होने वाला है। उनका घोड़ा अंतरिक्ष की सीमाओं को पार कर चुका है। क्या तुम्हारी इन पुरानी कलमों में कल्कि की तलवार को रोकने का दम है? मैं तुम्हें एक आखिरी मौका देता हूँ। तुम सब मिलकर—शेक्सपियर की नाटक-कला, टैगोर का अध्यात्म, प्रेमचंद की यथार्थता, ऑरवेल की चेतावनी और पो का खौफ—सबको मिलाकर एक ऐसी 'अंतिम पांडुलिपि' लिखो जो उस पत्थर दिल इंसान की आँखों में फिर से आँसू ला सके। अगर तुम उसे जगा पाए, तभी प्रलय टलेगी।"

​सारे महान लेखक, जो सदियों से अपनी अपनी विचारधाराओं के लिए जाने जाते थे, अब सब कुछ छोड़कर एक ही कागज़ के टुकड़े पर झुक गए। यह मानवता की आखिरी उम्मीद थी—Words of Doomsday

अध्याय 2: अंतिम पांडुलिपि का प्रथम पन्ना

यमराज की चुनौती के बाद, 'द इटरनल लाइब्रेरी' में एक गहरा सन्नाटा छा गया। शेक्सपियर, टैगोर, मिल्टन और प्रेमचंद ने एक-दूसरे की ओर देखा। आज भाषा की दीवारें गिर चुकी थीं। मिल्टन ने बाइबिल के पन्नों को पलटा, टैगोर ने उपनिषदों का सार याद किया और प्रेमचंद ने रामायण व महाभारत की उन स्मृतियों को जगाया जो उन्होंने बचपन में सुनी थीं।

सारे लेखकों ने मिलकर जो पहला पन्ना लिखा, वह किसी एक धर्म का नहीं, बल्कि मानवता का 'महा-संवाद' था। उस पन्ने पर स्याही से जो शब्द उभरे, वे कुछ इस प्रकार थे:

"हे कलयुग के मानव! तूने महलों के लिए पत्थर तो इकट्ठा किए, पर अपने सीने में भी पत्थर ही पाल लिया। क्या तुझे याद नहीं कि राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर समाज की दूरियां मिटाई थीं? क्या तू भूल गया कि कुरुक्षेत्र के मैदान में कृष्ण ने अर्जुन से कहा था कि 'परित्राणाय साधूनां'—अर्थात् धर्म केवल युद्ध नहीं, बल्कि कमज़ोर की रक्षा करना है?"

उसी पन्ने पर बाइबिल के स्वर गूँजे— "ईसा मसीह ने सूली पर चढ़ते हुए भी कहा था कि 'इन्हें क्षमा कर, क्योंकि ये नहीं जानते कि ये क्या कर रहे हैं।' यदि ईश्वर क्षमा कर सकता है, तो तू एक-दूसरे का हाथ क्यों नहीं पकड़ सकता? महाभारत का युद्ध हमें बताता है कि अहंकार केवल विनाश लाता है, और राम का वनवास हमें सिखाता है कि त्याग ही सच्चा प्रेम है।"

इस पांडुलिपि के अंत में लेखकों ने एक हृदयविदारक अपील लिखी— "जब कल सूरज उगेगा, तो वह यह नहीं देखेगा कि तेरे पास कितनी संपत्ति है, बल्कि यह देखेगा कि तूने गिरते हुए किसी अजनबी को सहारा देने के लिए हाथ बढ़ाया या नहीं। क्या तू अपनी अगली पीढ़ी को केवल मलबे और नफरत का ढेर देकर जाएगा? उठो! बाइबिल की दया और रामायण की मर्यादा को अपने भीतर जगाओ। एक इंसान दूसरे इंसान की मदद करे, यही एकमात्र रास्ता है जो कल्कि की तलवार को रोक सकता है।"

जैसे ही यह पन्ना पूरा हुआ, उस पर से एक दिव्य प्रकाश निकला जो सीधे पृथ्वी की ओर बढ़ा।

यमराज की चेतावनी के बाद पुस्तकालय में एक अलौकिक सन्नाटा था। विलियम शेक्सपियर ने अपनी कलम उठाई, लेकिन उनके हाथ कांप रहे थे। उन्होंने मुंशी प्रेमचंद की ओर देखा और कहा, "मेरे नाटक केवल मानवीय ईर्ष्या और पतन तक सीमित रहे, लेकिन आज हमें कुछ ऐसा लिखना होगा जो सीधा आत्मा को झकझोर दे।"

जॉन मिल्टन ने अपनी अंधी आँखों को बंद किया और कहा, "मैंने 'पैराडाइज लॉस्ट' में ईश्वर और शैतान के युद्ध को लिखा था। लेकिन आज मुझे अहसास हो रहा है कि असली स्वर्ग तब खो जाता है जब इंसान दूसरे इंसान के प्रति दया खो देता है। बाइबिल कहती है— 'अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे तुम खुद से करते हो' (Love thy neighbor as thyself)। यही वह आधार है जिससे हम शुरुआत करेंगे।"

रवींद्रनाथ टैगोर ने उपनिषदों के शांति पाठ को गुनगुनाया और प्रेमचंद की ओर मुड़कर बोले, "प्रेमचंद जी, रामायण और महाभारत केवल कथाएँ नहीं हैं, वे मनुष्य के भीतर के द्वंद्व का आईना हैं। हमें उस पल को लिखना होगा जब लक्ष्मण ने राम के लिए सब कुछ त्याग दिया था।"

प्रेमचंद ने भावुक होकर जोड़ा, "हाँ टैगोर बाबू! हमें दुनिया को याद दिलाना होगा कि महाभारत के मैदान में जब अपनों के ही खून से धरती लाल होने वाली थी, तब श्री कृष्ण ने अर्जुन को सिखाया था कि 'स्वधर्म' क्या है। स्वधर्म का अर्थ केवल युद्ध नहीं, बल्कि अपने कर्तव्य का पालन करना है। और सबसे बड़ा कर्तव्य है— दूसरे की पीड़ा को समझना। मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने शबरी के जूठे बेर खाकर यह संदेश दिया था कि प्रेम में कोई छोटा या बड़ा नहीं होता। आज के इंसान को यही 'मर्यादा' और 'धर्म' याद दिलाने की ज़रूरत है।"

सबने मिलकर लिखना शुरू किया। महादेवी वर्मा और जॉन कीट्स ने उन शब्दों को सौंदर्य और करुणा की चाशनी में डुबोया। उन्होंने पांडुलिपि के पहले पन्ने पर लिखा:

"ए मानव! तूने हथियारों से दुनिया जीती, पर क्या तूने कभी किसी भूखे के लिए रोटी का टुकड़ा तोड़ा? जब ईसा मसीह ने सूली पर चढ़कर अपने हत्यारों को माफ किया, तो वह केवल एक धर्म की बात नहीं थी, वह करुणा की पराकाष्ठा थी। जब राम ने गिद्ध राज जटायु का अंतिम संस्कार अपने पिता की तरह किया, तो वह संदेश था कि मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी भक्ति है।"

उन्होंने आगे लिखा, "महाभारत का युद्ध हमें चेतावनी देता है कि अगर भाई-भाई का हाथ नहीं थामेगा, तो अंत में केवल श्मशान और राख बचेगी। प्रलय बाहर नहीं आ रही, प्रलय तेरे भीतर की नफरत में है। बाइबिल की क्षमा, रामायण का त्याग और महाभारत का न्याय—ये तीनों मिलकर पुकार रहे हैं: एक-दूसरे की मदद करो, क्योंकि अंत में केवल 'प्रेम' ही वह स्याही है जो इतिहास के पन्नों से प्रलय का नाम मिटा सकती है।"

जब यह पन्ना पूरा हुआ, तो उसकी चमक इतनी प्रखर थी कि यमराज के काल-दंड की छाया भी फीकी पड़ गई।

अध्याय 3: कलयुग का अंधकार और शब्दों का संचार

धरती पर कलयुग का दृश्य बड़ा ही खौफनाक था। इंसान ने गगनचुंबी इमारतें तो बना ली थीं, पर उसके भीतर का चरित्र गिरकर धूल में मिल गया था। नदियाँ सूख चुकी थीं, लेकिन नफरत की आग हर कोने में धधक रही थी। भाई, भाई के खून का प्यासा था। सड़कों पर लोग एक-दूसरे की मदद करने के बजाय उनके मरने का तमाशा देख रहे थे। अस्पताल व्यापार बन चुके थे। यहाँ तक कि आस्था के केंद्र भी इस अंधेरे से अछूते नहीं थे; मंदिरों की शांति अब केवल शोर में बदल गई थी और चर्च की प्रार्थनाओं में वह पुराना सुकून और करुणा नहीं बची थी। इंसान के भीतर की 'ममता' पूरी तरह मर चुकी थी।

तभी, 'इटरनल लाइब्रेरी' से वह दिव्य पांडुलिपि एक चमकते हुए प्रकाश पुंज की तरह पृथ्वी के वायुमंडल में प्रवेश कर गई। महान लेखकों ने इस संदेश को उन लोगों तक पहुँचाने का एक अलौकिक तरीका निकाला जो भौतिकता की अंधी दौड़ में अपनी रूह खो चुके थे।

यह दिव्य संदेश किसी कागज़ पर नहीं, बल्कि सीधे इंसान की अंतरात्मा की पुकार बनकर गूँजने लगा:

आस्था के केंद्रों में चमत्कार: जब मंदिरों में आरती हो रही थी, तो अचानक घंटियों की आवाज़ में रामायण और महाभारत का वह सार सुनाई देने लगा कि "इंसान की सेवा ही नारायण की सेवा है।" ठीक उसी समय, चर्चों की दीवारों पर लिखे पवित्र वचनों में ईसा मसीह के वे शब्द चमकने लगे— "परमात्मा का राज्य तुम्हारे भीतर है, और वह केवल प्रेम से मिलता है।"

डिजिटल दुनिया पर प्रहार: दुनिया भर के बिलबोर्ड्स और मोबाइल फोन की स्क्रीन अचानक सफेद हो गईं। उन पर नफरत भरे विज्ञापनों की जगह शेक्सपियर की गंभीरता, टैगोर का दर्शन और प्रेमचंद की सादगी से सजे 'प्रलय के शब्द' (Words of Doomsday) उभरने लगे।

बदलाव की पहली किरण:

शहर के एक भीड़भाड़ वाले चौराहे पर एक व्यक्ति, जो अपनी कार से एक गरीब को टक्कर मारकर भागने वाला था, अचानक रुक गया। उसके कान में मिल्टन की तरह एक गंभीर आवाज़ गूँजी— "क्या तू अपनी आत्मा को चंद सिक्कों के लिए शैतान को बेच देगा?" उसने पहली बार डर के बजाय करुणा महसूस की। वह कार से उतरा और उस घायल व्यक्ति को गले लगाकर अस्पताल ले गया।

उसी समय, एक चर्च के बाहर खड़ा एक अमीर आदमी, जो अपनी दौलत के अहंकार में चूर था, उसने चर्च की खिड़की पर ईसा मसीह के शब्दों को नए रूप में देखा— "राम ने जटायु को गले लगाया था, क्या तू अपने भाई को सहारा नहीं देगा?" उसने अपना हाथ जेब से निकाला और पहली बार किसी अजनबी की मदद के लिए हाथ बढ़ाया।

ये लोग, जो बदल रहे थे, अब इस संदेश के जीवित दूत बन गए। उन्होंने चिल्ला-चिल्ला कर दूसरों को जगाना शुरू किया— "रुको! हम इंसान हैं, एक-दूसरे का सहारा बनो, क्योंकि कल्कि की तलवार केवल प्रेम से ही रुक सकती है!"


अध्याय 4: वज्र से करुणा तक—'आर्य' का उदय और आत्म-त्याग

शहर की सबसे अंधेरी और खतरनाक गलियों में एक नाम से खौफ पैदा होता था— 'आर्य' (Arya: The Noble Warrior)। आर्य का अतीत रक्त, क्रूरता और निर्दयी प्रेम से लिखा गया था। उसकी भुजाओं में वज्र जैसी शक्ति थी, एक प्रहार में वह किसी की भी जान ले सकता था, और उसकी आँखों में केवल अंधकार था। लोग उसके नाम से कांपते थे। उसके दिल में वर्षों पहले ही इंसानियत मर चुकी थी।

आर्य के उस बर्बर अतीत का एक पहलू था, 'छाया' (Chhaya: The Shadow of Love)। छाया, शहर की एक ऐसी लड़की थी जिसके लिए आर्य किसी भी हद तक जा सकता था। वह छाया से उतना ही प्रेम करता था जितनी क्रूरता वह दूसरों पर दिखाता था। छाया उसकी कमज़ोरी थी, उसका इकलौता मानवीय स्पर्श। लेकिन आर्य के रास्ते हिंसा और खून-खराबे के थे, और छाया का दिल हमेशा उस अंधेरे से घबराता था। आर्य ने छाया को पाने के लिए कई गलत रास्ते अपनाए, जिससे उनकी कहानी कभी पूरी नहीं हो पाई। उसने अंततः छाया को भी त्याग दिया था, यह जानते हुए कि उसका प्रेम केवल छाया को भी अपने अंधेरे में खींच लेगा।

लेकिन उस भयानक रात, जब 'इटरनल लाइब्रेरी' से प्रलय के शब्द (Words of Doomsday) गूँजे, तो कुछ अलौकिक हुआ। आर्य एक सुनसान चर्च के पास खड़ा था, उसके हाथ एक और गुनाह के लिए तैयार थे। तभी चर्च की घंटी बजी और हवा में एक ऐसी गूँज उठी जो सीधे उसकी आत्मा से टकराई। उसे बाइबिल का वह स्वर सुनाई दिया— "जो तलवार उठाता है, वह तलवार से ही नष्ट होता है।" और तुरंत ही उसे महाभारत के कुरुक्षेत्र में श्री कृष्ण की आवाज़ सुनाई दी— "अहिंसा परमो धर्मः।" उस क्षण आर्य के भीतर का 'असुर' ढह गया। उसे अहसास हुआ कि असली शक्ति किसी को मारने में नहीं, बल्कि किसी को सहारा देने में है, और सच्चा प्रेम किसी को पाने में नहीं, बल्कि उसे मुक्त करने में है। उसी रात, उसने अपने अतीत के सारे रिश्ते तोड़ दिए, यहाँ तक कि छाया की यादों को भी अपने भीतर से मुक्त कर दिया— वह अब केवल 'आर्य' नहीं, 'मानवता' का सेवक बन चुका था।

आज, आर्य एक परिवर्तित मनुष्य है। वह शहर की सड़कों पर एक साधु की तरह नहीं, बल्कि एक रक्षक और पथ-प्रदर्शक की तरह घूमता है। उसकी भुजाओं में आज भी वही वज्र जैसी शक्ति है, पर अब वे भुजाएँ किसी का गला दबाने के लिए नहीं, बल्कि मलबे में दबे किसी बच्चे को निकालने या किसी लाचार को सहारा देने के लिए उठती हैं। लोग उसे देखते हैं और कहते हैं— "देखो, आर्य आ रहा है, हमारा भगवान!" वह खुद को भगवान नहीं मानता, पर उसके कर्म ऐसे हैं कि लोग उसे दैवीय मानते हैं।

एक दृश्य में, कुछ हथियारबंद गुंडे एक लाचार बूढ़े और उसकी बेटी पर हमला कर रहे थे। आर्य वहाँ पहुँचा। गुंडे उसे पहचानते थे, वे डर से कांपने लगे। एक ने कहा, "आर्य, तुम तो हममें से एक थे! तुम इन कमज़ोरों की मदद क्यों कर रहे हो? कहाँ गया तुम्हारा पुराना जुनून? कहाँ गई तुम्हारी छाया?"

आर्य ने अपनी वज्र जैसी आँखों को शांत करते हुए कहा— "मेरा जुनून अब रक्षा है। मेरी छाया अब मेरे भीतर की करुणा है। रामायण में हनुमान ने शक्ति का उपयोग सेवा के लिए किया था, विनाश के लिए नहीं। आज मैं तुम्हें मार सकता हूँ, पर मैं तुम्हें क्षमा करता हूँ, ताकि तुम भी इंसान बन सको और इस कलयुग में मानवता को जगा सको। एक जीवन को बचाना, हजारों जिंदगियां बदलने का पहला कदम है।"

आर्य अब उस दिव्य पांडुलिपि का जीवित संदेश बन गया है। वह जहाँ भी जाता है, लोग उसकी शक्ति से नहीं, उसकी करुणा और त्याग से जुड़ने लगते हैं। वह चिल्लाकर कहता है— "मदद करो, क्योंकि यही वह एकमात्र धर्म है जो हमें प्रलय से बचा सकता है! यही सच्चा प्रेम है, सच्चा त्याग है!" लोग उसके पीछे चलने लगते हैं, उसके शब्द उम्मीद की नई किरण बन जाते हैं।

अध्याय 5: यमराज का विस्मय और अमर लेखकों का संतोष

पृथ्वी पर आर्य के अद्भुत परिवर्तन और उसके द्वारा फैलाए जा रहे करुणा के प्रकाश ने 'द इटरनल लाइब्रेरी' की दीवारों को एक दिव्य चमक से भर दिया। पुस्तकालय के मध्य में रखे उस विशाल दर्पण में, जिसे 'काल-दर्पण' कहा जाता है, लेखकों ने देखा कि कैसे एक क्रूर अपराधी अब निर्दोषों की ढाल बन गया है।

विलियम शेक्सपियर ने अपनी आँखों में एक चमक के साथ कहा, "मैंने बहुत से त्रासद नायक लिखे, जो अंत में टूट गए, पर आर्य ने तो अपनी त्रासदी को ही मानवता की जीत में बदल दिया। यह किसी भी नाटक से महान दृश्य है।"

मुंशी प्रेमचंद की आँखों में आँसू थे। उन्होंने धीरे से कहा, "शेक्सपियर साहब, यह वह 'हृदय परिवर्तन' है जिसके लिए साहित्य तरसता है। आर्य ने दिखा दिया कि कलयुग की धूल में दबा इंसान भी यदि चाहे, तो मर्यादा पुरुषोत्तम राम और बुद्ध के मार्ग पर चल सकता है।"

रवींद्रनाथ टैगोर ने अपनी 'एकला चलो रे' की धुन गुनगुनाते हुए कहा, "आर्य अब अकेला नहीं है। उसके पीछे हज़ारों दिल धड़क रहे हैं। उसने भाषा और धर्म की सीमाओं को तोड़कर 'बाइबिल' की क्षमा और 'महाभारत' के न्याय को अपने जीवन में उतार लिया है।"

तभी, पुस्तकालय की पूरी ज़मीन कांपने लगी। यमराज फिर से प्रकट हुए, लेकिन इस बार उनके चेहरे पर वह भयानक क्रोध नहीं था, बल्कि एक गहरा विस्मय (Surprise) था। उनका 'काल-दंड' अब शांत था।

यमराज की आवाज़ गूँजी, "महान लेखकों, तुम्हारी कलम ने वह कर दिखाया जो मेरी सजाएँ नहीं कर पाईं। मैंने सोचा था कि कल्कि की तलवार ही इस पत्थर दिल इंसानियत का एकमात्र समाधान है। लेकिन आर्य... उस अपराधी ने अपने भीतर के रावण को मारकर यह सिद्ध कर दिया कि इंसान के भीतर अभी भी ईश्वरीय प्रकाश शेष है।"

जॉर्ज ऑरवेल ने आगे बढ़कर पूछा, "प्रभु, क्या अब प्रलय टल जाएगी?"

यमराज ने गंभीर स्वर में उत्तर दिया, "आर्य ने एक चिंगारी जलाई है, पर अभी पूरी दुनिया का जागना बाकी है। बाइबिल, रामायण और महाभारत का जो संगम तुमने लिखा है, वह अब आर्य के माध्यम से हर दिल तक पहुँचना चाहिए। यदि मानवता आर्य के पदचिह्नों पर चलने का संकल्प लेती है, तो कल्कि की तलवार म्यान में ही रहेगी। यह 'Words of Doomsday' अब 'Words of New Life' बन रहे हैं।"

सारे लेखक एक नई ऊर्जा के साथ फिर से उस पांडुलिपि पर झुक गए। वे अब केवल प्रलय को रोकने के लिए नहीं, बल्कि एक नई दुनिया के निर्माण के लिए लिख रहे थे।

अंतिम अध्याय: महा-संग्राम, हृदय परिवर्तन और काल का न्याय

1. शांति की पूर्व संध्या और खौफ का साया

धरती पर वह सुबह आम सुबह जैसी नहीं थी। 'द इटरनल लाइब्रेरी' से उतरी उस दिव्य पांडुलिपि का प्रभाव धीरे-धीरे फैल रहा था, लेकिन अंधकार इतनी आसानी से हार मानने वाला नहीं था। कलयुग के उन स्वार्थी आकाओं, भ्रष्ट राजनेताओं और हथियारों के सौदागरों को अपनी सत्ता डगमगाती महसूस हुई। उन्होंने देखा कि लोग अब लड़ने के बजाय हाथ मिला रहे हैं, चर्चों और मंदिरों के बाहर नफरत नहीं, बल्कि मदद की कतारें लगी हैं। इन 'अंधकार के स्वामियों' ने तय किया कि वे इस बदलाव को कुचल देंगे। उन्होंने अपने सबसे खूंखार हत्यारों को आदेश दिया— "उस व्यक्ति को मिटा दो जिसे दुनिया 'आर्य' कह रही है। अगर वह मर गया, तो यह उम्मीद भी मर जाएगी।"

2. आर्य का सामना और आंतरिक शक्ति का प्रदर्शन

शहर के मुख्य चौक पर, जहाँ कभी हज़ारों निर्दोषों का खून बहा था, आज आर्य खड़ा था। उसके पीछे हज़ारों निहत्थे लोग थे—बूढ़े, बच्चे और वे औरतें जिन्हें अब आर्य में एक रक्षक दिखाई देता था। सामने से आधुनिक टैंक, हथियारबंद सैनिक और नफरत से भरे हुए वे गुंडे आए जो कभी आर्य के साथ काम करते थे।

उनका नेता, 'कालभैरव', चिल्लाया, "आर्य! तूने अपनी ताकत को बेकार कर दिया। तू एक सन्यासी बन गया? अपनी उस 'छाया' को भूल गया जिसके लिए तूने शहर जलाया था? आज हम तुझे और तेरी इस 'मानवता' को इस ज़मीन में दफन कर देंगे!"

आर्य शांत था। उसकी आँखों में वह पुरानी क्रूरता नहीं, बल्कि एक गहरी स्थिरता थी। उसने कदम आगे बढ़ाया। कालभैरव ने गोली चलाने का आदेश दिया। हज़ारों बंदूकें एक साथ तनीं। लेकिन आर्य रुका नहीं। वह चिल्लाकर बोला— "आज तुम मुझ पर गोली चला सकते हो, पर उन शब्दों का क्या करोगे जो तुम्हारे भीतर गूँज रहे हैं? क्या तुम्हें रात को नींद आती है? क्या तुम्हें अपने बच्चों की आँखों में डर नहीं दिखता? बाइबिल कहती है कि प्रेम ही सत्य है, और रामायण हमें सिखाती है कि अधर्म का अंत निश्चित है। मैं यहाँ तुम्हें मारने नहीं, तुम्हें जगाने आया हूँ!"

आर्य की आवाज़ में वह दिव्य शक्ति थी जो लेखकों ने पांडुलिपि में भरी थी। जब गुंडों ने आर्य की आँखों में देखा, तो उन्हें अपनी ताकत नहीं, बल्कि अपनी कमज़ोरी दिखने लगी। एक-एक करके हथियार गिरने लगे। यह युद्ध तलवारों का नहीं, आत्माओं का था। आर्य ने कालभैरव के कंधे पर हाथ रखा। वह खूंखार अपराधी, जो कभी किसी के सामने नहीं झुका था, आर्य के पैरों में गिरकर रोने लगा। यह मानवता की सबसे बड़ी जीत थी।

3. इटरनल लाइब्रेरी में उत्सव और शेक्सपियर का विचार

ऊपर 'द इटरनल लाइब्रेरी' में लेखक इस दृश्य को देख रहे थे। मिल्टन ने राहत की सांस ली। टैगोर ने अपनी कलम नीचे रखी और कहा, "आज शब्दों ने शस्त्रों को हरा दिया।" शेक्सपियर ने मुस्कुराते हुए कहा, "मैंने बहुत से दुखांत नाटक लिखे, लेकिन आज जो मैंने देखा, वह एक सुखद अंत (Happy Ending) से भी बढ़कर है। यह 'पुनर्जन्म' है।" मुंशी प्रेमचंद और महादेवी वर्मा एक-दूसरे को देख रहे थे, उनकी आँखों में संतोष था कि उनकी सादगी और करुणा ने दुनिया को बचा लिया।

4. यमराज का विवर्तन और भयानक सत्य

तभी, पुस्तकालय की छत किसी भयानक बिजली की कड़क के साथ कांपने लगी। यमराज प्रकट हुए। उनका आकार अब इतना विशाल था कि पूरी लाइब्रेरी उनके साये में आ गई। उनके चेहरे पर वह विस्मय अब एक ठंडी मुस्कान में बदल गया था। उन्होंने लेखकों की ओर देखा और बोले:

"तुम सब प्रसन्न हो? तुम्हें लगता है कि एक अपराधी के बदलने से और कुछ लोगों के रोने से सृष्टि का चक्र बदल जाएगा? लेखकों, तुम कल्पनाओं के स्वामी हो, पर मैं सत्य का रक्षक हूँ। यह जो तुम देख रहे हो, यह केवल 'क्षणिक विराम' (A momentary pause) है। कलयुग का सागर बहुत गहरा है, आर्य ने केवल एक लहर को शांत किया है।"

यमराज ने हाथ उठाया और 'काल-दर्पण' में भविष्य की एक भयानक झलक दिखाई। उन्होंने कहा, "आज इंसान भावुक है क्योंकि उसे डर लगा। लेकिन याद रखना, जैसे ही यह डर कम होगा, लोभ और अहंकार फिर से लौटेंगे। एक समय ऐसा आएगा जब इंसान इतना बहरा हो जाएगा कि उसे 'बाइबिल' की करुणा मज़ाक लगेगी और 'रामायण-महाभारत' की मर्यादाएँ केवल पुरानी कहानियाँ। उस समय इंसान शब्दों से नहीं बदलेगा।"

यमराज की आवाज़ भारी होती गई, "जब कलयुग अपनी पूरी भीषणता के साथ आएगा, तब तुम्हारी ये महान रचनाएँ केवल धूल चाटेंगी। उस समय 'उसे' (कल्कि को) आना ही पड़ेगा। न्याय की उस अंतिम घड़ी में कलम नहीं, केवल तलवार चलेगी। वह सब कुछ मिटाकर एक नया सतयुग आरंभ करेगा। तब तक, यह शांति केवल एक पल भर का सुकून है।"

5. अंत और नई शुरुआत

यमराज अदृश्य हो गए। लेखक फिर से शांत हो गए। उन्हें समझ आ गया कि उनका काम केवल मशाल जलाना है, उसे जलाए रखना इंसान की ज़िम्मेदारी है। धरती पर आर्य अभी भी खड़ा था, लोगों की मदद कर रहा था। उसे पता था कि बुराई फिर आएगी, पर उसने तय कर लिया था कि जब तक उसके शरीर में प्राण हैं, वह 'Words of Doomsday' को 'Words of Hope' में बदलता रहेगा।

आकाश में सूरज ढल रहा था, पर एक नई उम्मीद की किरण अभी भी बाकी थी। यह अंत नहीं, बल्कि एक अंतहीन संघर्ष की शुरुआत थी। 



Rate this content
Log in

Similar hindi story from Classics