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Vinita Shukla

Comedy

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Vinita Shukla

Comedy

समय बदल रहा था

समय बदल रहा था

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नये साल की आहट धीरे धीरे, मिलने लगी है। आभासी मंचों पर, नव वर्ष के कार्यक्रमों की, तैयारी देखते ही बनती है। इंस्ट्राग्राम पर मॉल और शोरूमों की सजावट, आने वाले नए साल के स्वागत में लगे मेलों और सेल के समाचार
... तो एफ. बी.पर स्वादिष्ट भोजन और पार्टियों की बुकिंग के विज्ञापन।

लाली और उसका पति, मोबाइल स्क्रीन की, इस चमक दमक में, दुनिया जहान भूल जाते हैं। बच्चे भी, टी.वी.सीरियलों के जरिए, रईस बालकों की दुनिया में प्रवेश पा जाते हैं। उनके जलवे देख, खुद को 'अपडेट' रखने की चाह, उन्हें भी होती है।

बच्चों के संग, लाली के रंग ढंग भी बदलते जा रहे हैं। मोहल्ले की रेखा आंटी, शैली भाभी से कह रही थी, " लाली खुद को हीरोइन से कम नहीं समझती है आजकल!"
"हाँ ...! बिल्कुल सच कह रही हैं आप। सड़कछाप मेलों में जब सेल लगती है, वहीं से नये फैशन के कपड़े खरीद लेती है।"

" कैसे लिपिस्टिक और मस्कारा लगाती है! आपने तो देखा ही होगा। रोज पैसों का रोना रोती है ... फिर सिंगार- पिटार के पैसे आते कहाँ से हैं??" 

" इन लोगों को कोई कमी, थोड़े ही है। मुफ़त राशन...और बच्चों के स्कूल की फीस भी माफ! " शैली भाभी, चार कोने का मुँह बनाकर, लाली- प्रकरण की इति करने ही वाली थीं कि रानू जिज्जी बीच में टपक पड़ी, " इसका मरद, अपने गैराज से ही पुरानी बाइक उठा लाया है। बड़ी वाली बेटी के लिए, किसी से पुरानी सायकल भी पा गया है। "

" आजकल परजों(सेवकों) के दिमाग, सातवें आसमान पर रहते हैं... कैसा कलयुग!" रेखा आंटी ने ही अंततः, समूचे वार्तालाप को, विराम दिया।

सही कह रही थीं, वे महिलाएँ। लाली की महत्वाकांक्षा, स्मार्टफोन की रीलों और वीडियो वगैरा को देख, बढ़ती ही जा रही है। वह फैशन, मेकअप और जीवन शैली से जुड़े नुस्खों को, जान- समझ रही है। धीरे धीरे, अपनी औकात से भी बड़े, सपने देखने लगी है। अपने बच्चों का नाम भी, उसने टी वी सीरियलों के, महत्वपूर्ण किरदारों पर रखा हुआ है।

गाँव गई थी तो उसकी नन्द किसी एन. जी. ओ. के सहयोग से, सिलाई का कोर्स कर रही थी। बस फिर क्या था! जिन बूढ़ी आंटी के यहाँ, लाली कपड़े धोती है; उन्हीं से जिद कर, उनकी पुरानी सिलाई मशीन, घर उठा लाई- अपनी नन्द के लिए।

उसके अधूरे सपने भी, तभी से जोर मारने लगे हैं। वह कल्पना करती है, सिलाई सीखकर दुकान जमा रही है ... ब्यूटीशियन का कोर्स कर, कमाई कर रही है। सेविका का काम करने के बाद, मोहल्ले के प्रौढ़ शिक्षा केंद्र में जाकर... शाम को लगने वाली, कक्षा का हिस्सा बन रही है ... किन्तु अर्थाभाव में, नून तेल लकड़ी के राग से उबर नहीं पाती। अपने लिए समय कैसे निकाले? 

आने वाले साल के प्रभाव से, वह अछूती नहीं।स्कूली बच्चों की, बड़े दिन से लेकर, पहली जनवरी तक, लम्बी छुट्टियाँ कर दी गई हैं। कामकाजी माँओं के बच्चे, स्कूली और घरेलू अनुशासन के अभाव में, अपनी मर्जी के मालिक, बने हुए हैं। लाली के बच्चों का भी कमोबेश यही हाल है। हालांकि उसके घर, वे आधुनिक गैजेट्स नहीं हैं जो बड़े घर के बालकों को, उलझाये रखते हैं।

लाली के यहाँ, स्मार्टफोन जरूर है।  हाँ... वह फोन, यदा कदा, बच्चों के हाथ, लग ही जाता है। लाली उसे काम पर ले नहीं जाती। उसका घरवाला, काम के समय, फोन रखना पसंद जो नहीं करता। जब बच्चों के स्कूल वाले व्हाट्सऐप पर, कोई सूचना या निर्देश मिलता है तो उनका मैकेनिक पिता, उन्हें बुलाकर उसे दिखाता है; नहीं तो कम से कम, उसके बारे में बताता है। 

उस फोन पर दो सिम हैं। एक नम्बर से उनकी माँ ने और दूसरे से पिता ने सोशल मीडिया पर, अपने अपने अकाउंट खोल रखे हैं। बच्चे भी उस ग्लैमर से अछूते नहीं। उनको इस बात की भनक लग गई है कि बिंदुओं के किस पैटर्न से, फोन को अनलॉक किया जा सकता है।

अम्मा बापू को चकमा देकर, कभी कभार, उसका अवलोकन कर ही लेते हैं, बाल गोपाल! जमाने के नए नए रंग, उन पर चढ़ते ही जा रहे हैं। अम्मा को मम्मा और बापू को पप्पा कहना शुरू किया है, मलकिन के पोते की देखादेखी। 

जिस मलकिन के सर्वेंट क्वार्टर में, वे रहते हैं, उनके यहाँ अम्मा, झाड़ू पोंछा और चौका बर्तन करती है। कुछ और घरों में भी साफ सफाई और बर्तन माँजने का काम पकड़ रखा है। दोपहर में दो घड़ी सुस्ताती है फिर जल्दी जल्दी रोटी टूंगकर काम पर निकल पड़ती है। 

बच्चों का बापू जगन, दुपहिया, तिपहिया और चौपहिया वाहनों की मरम्मत के लिए, एक कार ग़ैराज में ड्यूटी बजाता है। आमतौर पर वह, रात होने तक, इंजन ऑयल से लिपा पुता, घर लौटता है। आते ही पहले, सड़क के किनारे वाले बंबे से, मुँह हाथ धोता है; गमछे से उन्हें पोंछ, घर में कदम रखता है।

फिर बरामदे में पड़ी चटाई पर, 'ढेर हो जाता' है। थोड़ी देर में, किसी भांति, खुद को सहेजता-समेटता है और देह के ढीले हुए पुर्जों को, यथास्थान 'बैठाकर ', चाय सुड़कने लगता है; चाय की चुस्कियों के बाद, बच्चों की पेशी होती है- उसके दरबार में। उनकी स्कूली गतिविधियों का  हिसाब किताब लेने के बाद, वह मोबाइल पर, थोड़ी देर 'ब्राउज़' करता है। 

नहाना धोना निपटाकर, जल्द ही वह, खर्राटे भरने लगता है। बंधी बंधाई दिनचर्या से बाहर आ पाना, लाली के साथ साथ, उसके लिए भी, बहुत कठिन रहा। किन्तु बच्चे तो खाली ही रहते हैं। स्कूल से आने के बाद, देर तक, उन्हें कोई देखने सुनने वाला नहीं होता।

छोटे लड़का- लड़की, अमीषा और रोहन, आपस में झगड़ते रहते हैं। उनकी चिल्लपों सुन, मलकिन जब- तब, उन्हें घुड़कती हैं। कभी वे मलकिन की नजर बचाकर, फाटक खोल, बाहर भी हो लेते हैं। तब सड़क पर, मटरगश्ती करने का 'सुयोग' बन जाता है।

बड़ी लड़की निमिषा, जरूर, रसोईं के बर्तन भांडे, धो पोंछकर, माँ के काम का बोझ हल्का कर देती है; यदा कदा, कपड़े भी फटकार लेती है।

उसने ही अम्मा बापू को बताया था; नये साल के संकल्प के बारे में। उसकी कक्षाध्यापिका 
ने 'न्यू ईयर रेजोल्यूशन' पर जोर देते हुए कहा  कि साल की शुरुआत में, अच्छे संकल्प लेने से, पूरा साल अच्छा गुजरता है। 

लाली ने भी एफ. बी. के किसी वीडियो में देखा था कि जो साल के पहले दिन करो; वही साल भर करना होता है। तब लाली ने तय किया कि 'न्यू ईयर डे' पर, वह, अपने तुच्छ कामधंधे की परछाईं, नहीं पड़ने देगी। उस दिन, जगन का गैराज भी बन्द था। 

एक जनवरी को, सुबह सबेरे, निमिषा ने, घर घर जाकर, घोषणा कर दी, "आज मम्मा काम पर नहीं आएगी। उनके पैरों में दर्द है। " इस बात से, हरेक गृहस्वामिनी को झटका लगा, बूढ़ी आंटी को छोड़कर... क्योंकि उनकी उमर का लिहाज कर, लाली ने पहले ही इस बात का संकेत दिया था। जो भी हो, निमिषा उन स्त्रियों प्रतिक्रिया जाने बिना ही खिसक ली।

अगले दिन लाली, समय से काम पर आ गई। मैडम लोगों का मुँह फूला हुआ था। मलकिन तो पहले ही अपने बेटे के पास, गाजियाबाद गई  थीं। इसी से, उनका उलाहना नहीं मिला। बाकियों में से, दो महिलायें ऐसी रहीं जो पाश्चात्य अवधारणा के तहत, शुभ-अशुभ को कुछ ज्यादा ही मानती थीं। सो उन्होंने लाली की, हमेशा के लिए छुट्टी कर दी; यह कहकर कि लाली ने, उनका नया साल चौपट कर दिया!

उसका काम, एक दूसरी बाई ने, झटक लिया था। कामवाली बाइयों के संगठन ने भी, इस अन्याय के विरुद्ध, उसका साथ नहीं दिया क्योंकि वे बाइयाँ खुद भी, उसकी अनोखी चाल ढाल और तौर तरीकों की खिलाफत करती थीं। बूढ़ी आंटी के आगे, लाली ने अपना रोना अवश्य रोया पर वे भी कुछ खास नहीं पसीजीं। 

उनको यह हजम नहीं हुआ कि पगार लेने की गरज से, उसका पैर दर्द, इतनी जल्दी छूमंतर कैसे हो गया! दो जगह का काम छूट जाने पर, लाली दुखित अवश्य हुई पर उसे यह संतोष था कि नए साल का आगाज़, बढ़िया हुआ। यह उम्मीद भी रही कि उसका पति जगन,अब, अपनी सेवाओं का, अधिक भुगतान पाएगा। इसी साल से, उसकी गिनती, गैराज के अनुभवी कर्मचारियों में जो होने लगी थी !

31 दिसम्बर को, 12 बजे रात में, नववर्ष का स्वागत, उन लोगों ने केक काटकर किया। सबेरे गरम गरम कचौड़ियाँ तली गईं। जगन और लाली, डॉक्टर को दिखाने के बहाने, बाइक से बाहर निकले और ढाबे से स्वादिष्ट खाना पैक करवाकर, वापस आ गए। डिग्गी में छुपे, भोजन के उन पैकेटों को देखकर, 'बच्चा-पार्टी', खुशी से उछल पड़ी।

इधर मेमसाब लोग समझ नहीं पा रही थीं कि लाली ने ऐसी हिमाकत कैसे की? क्या यह, पाश्चात्य चलन का प्रभाव था या लाली की अपनी खब्त... या फिर सोशल मीडिया से, फोकट में मिली जागरूकता का नतीजा। जो भी हो, यह तो तय रहा कि समय बदल रहा था !





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