बंद दरवाजे
बंद दरवाजे
काजल फिर, घर के दरवाज़े बंद कर; सामने वाले फाटक पर, ताला मारकर, कहीं गायब हो गयी थी। नीलेश को लगा, तरुण के स्कूल से आने तक, दरवाज़े बन्द ही रहेंगे। त्रिया- हठ की पराकाष्ठा थी यह!
नीलेश सप्ताहांत में, घर आता था...जीवन की भागदौड़ से त्रस्त...थके मन और देह को तनिक विश्राम देने; किन्तु उसकी यह आस, फलीभूत न होती। काजल, दिनोंदिन विद्रोहिणी बनती जा रही थी। मानो पत्नी न हो...कोई बैरी हो उसकी!
कानपुर से उरई तक का सफ़र, वह भी अपनी कार से- आसान नहीं था! फोन करके पहले ही बता दिया था...तो भी ऐसी लापरवाही! लापरवाही नहीं... जान बूझकर किया गया कृत्य!! आखिर परिवार का पेट पालने के लिए ही तो वह गृहस्थान से दूर, कानपुर चला आया था। यहाँ की कम्पनी, बेहतर तनख्वाह जो दे रही थी। लेकिन यह काजल...!
"डैडी...!" स्कूल से आया हुआ तरुण, पिता नीलेश से लिपट गया तो नील की विचार-श्रृंखला भंग हुई। तरुण ने ही 'स्पेयर की' से दरवाजा खोला था। बाप बेटे ने तब, रसोई में ढककर रखा हुआ, दाल- चावल, उदरस्थ किया। नीलेश की जठराग्नि शांत हुई। तरुण को अपने लिए चाय बनाते देख, उसका जी भर आया। बेटा ही तो उसके मरुस्थल जैसे जीवन में, मरुद्यान का शीतल एहसास देता था।
उसके ही भविष्य के सपने बुनकर, नील अपनी बदरंग जिंदगी में, रंग भरने का जतन करता रहा। नीलेश का यह सपना था कि उच्च शिक्षा के लिए, बेटे को कानपुर, अपने पास बुला लेगा। बच्चा उसके पास रहेगा, अपनी विक्षिप्त माँ से दूर!
"डैडी... हमारे स्कूल के एनुवल फंक्शन में, मुझे एक स्किट करनी है। पता है, मेरा रोल क्या है?"
"क्या?" नीलेश ने अपने बातूनी बेटे को, मुग्ध दृष्टि से देखते हुए पूछा।
" डाकू हीरालाल का"
"ओह..!" नील की हँसी छूट गई तो तरुण भी जोरों से हँस पड़ा।
"और डैड... साइंस एग्जिबिशन के लिए, पता है मैं
कौन सा चार्ट बनाऊँगा?"
"कौन सा वाला?" शब्द यंत्रवत, नीलेश के होठों से फिसलते चले गए।
" डार्विन की इवोल्यूशन थ्योरी वाला"
" वाह बहुत अच्छे!" कहते कहते नीलेश को लगा, उसकी आँखे नम हो चली थीं। एक तरफ तरुण तो दूसरी तरफ काजल...!
काजल का मानसिक संतुलन, बिगड़ता ही जा रहा था। सालों से, उसने अपना 'पत्नी धर्म ' नहीं निभाया था। हाथ लगाते ही, जोरों से झटक देती। बड़े भाईसाहब कहते थे- " अभी भी, उस गिरीश के संग, मुँह काला करती होगी!"
भाई साहब, कयास लगाने में माहिर थे। बला के जिद्दी! अपने कुत्सित विचारों को, सच का बाना पहनाने के लिए, परिचितों का हवाला देते हुए, कहते, " गुड्डू के जीजा बता रहे थे, वह मुआ गिरीश अभी भी, नील (नीलेश) के पीठ पीछे, उसके घर जाता है। "
या फिर- " कइसी निर्लज्ज है, नील की घरवाली! पति के जाते ही, यार को बुला लेती है!"
नीलेश को, सच्चाई भला, कैसे पता चलती ?! उसकी पत्नी, मात्र इसलिए ही तो, अपराधी नहीं हो जाती कि गिरीश, उसे पहले से ही जानता था?? कानपुर में बैठे बैठे, नील कैसे पता लगाता कि पीठ पीछे, पत्नी क्या- क्या गुल खिलाती थी ( या फिर वह निर्दोष थी! )
मन त्रिशंकु की तरह, सकारात्मक व नकारात्मक; दोनों ही सम्भावनाओं के बीच झूलता। उसके द्वारा काजल के चरित्र की पड़ताल करने का परोक्ष प्रयत्न, उन दोनों के बीच, खाई को, गहरा करता रहा। उरई में, अनिल भाई साहब की उपस्थिति, आग को बराबर हवा देती थी। ऐसी स्थिति में, धीरे धीरे काजल की दिमागी हालत, बद से बदतर होती चली गई।
गिरीश का विवाह, काजल की चचेरी बहन, शिखा से हुआ था। उन दोनों का आना जाना, कैसे रोक सकती थी वह ?! अवश्य जेठजी, उसके पति के बैंक बैलेंस पर, नज़र गड़ाए होंगे... तभी तो उसका घर, तोड़ने में लगे हैं!
यह तो गनीमत रही कि नील, तरुण पर जान छिड़कते थे; इसी से उसका हाथ, कभी तंग नहीं रहा। तरुण के नाम पर, घरखर्च के पैसे मिलते रहे। नहीं तो क्या पता... कौड़ी- कौड़ी की मोहताज हो जाती!
जब जब काजल, नील की बेकदरी करते हुए, घर के दरवाजे, उसके लिए बंद कर देती; बेटा ही अपने पिता के स्वागत में, उन बन्द दरवाजों को खोलता।
इस बीच, शिखा और गिरीश के विवाह की वर्षगांठ पर जाना पड़ा। नीलेश का वहाँ जाने का, बिलकुल मन नहीं था; किन्तु तरुण के आग्रह को, टाल नहीं सका। तरुण, शिखा के पुत्र, वरूण के साथ, खेलने में व्यस्त था। वहाँ सब कह रहे थे कि दोनों भाई तरुण और वरुण, बिल्कुल एक जैसे दिखते हैं।
यह बात, नीलेश के मनमस्तिष्क को, रहरहकर, कुरेद रही थी। न चाहते हुए भी, इस कुविचार को, अपने दिमाग से झटककर, अलग न कर सका- " कहीं तरुण भी तो गिरीश की औलाद नहीं ...! यह भयावह खयाल उसे खाए जा रहा था। रातों की नींद, हवा हो गई।
काश...कोई जुगाड़ लगाकर, चुपके से, तरुण की डी.एन.ए. जाँच करवा सके, यह भी सोचा। एक दिन अनाथालय के लिये, चंदा लेने, वहाँ के मैनेजर आये थे। उन्होंने एक विचित्र घटना की चर्चा की। दो तीन साल पहले एक युवती, अपनी नाजायज बच्ची को, अनाथ आश्रम में छोड़ गई थी। विवाहोपरांत जब उसके पति को, इस रहस्य का पता चला तो उन्होंने कहा," बच्ची को वापस ले आओ। यदि वह तुम्हारा अंश है, तो अवश्य, मेरी भी कुछ लगती ही है!"
सुनकर नील का दिल, हल्का हुआ। वह बेटा जो उनके आने पर, घर के बंद दरवाजों को खोलता था; उसका ही प्रेम, उनके विवेक के, बन्द पट भी खोल चुका था!!
