मछलियां
मछलियां
घर में नया एक्वेरियम आया था। एक से एक सुन्दर मछलियां! खासकर रेड मॉली मच्छियां और गोल्डन फिश, शान में इजाफा कर रही थीं। धन्या ने ठंडी सांस ली। एक्वेरियम और मछलियों की देखभाल का अतिरिक्त दायित्व, उसके सर आन पड़ा। उसके पति मुरली को तो अपनी वर्जिश और बागान के कामकाज से ही फुर्सत नहीं; मछलियों की देखरेख क्या करेगा?! मछलियां ... उसके मायके के भोजन का हिस्सा! और यहाँ... पतिगृह में - उस स्वाद के लिए तरसकर रह गई है। यहाँ तो मछलियां, महज सजाने के लिए हैं। घर के सब लोग निरामिष जो ठहरे! अम्मा ने जताया भी था, " शाकाहारियों के घर जा रही हो; मच्छी खाने को तरस जाओगी। " उसे अपने मायके का, सीलन भरा फ्लैट याद आया। रसोईंघर के किसी अंधेरे कोने में, बास मारती, मच्छियों की टोकरी। साथ ही मछली को साफ करने वाला स्केलर चाकू और काटने वाली दरांती रखे रहते। किशोरावस्था के नाजुक दौर में, उसे वह दरांती, अक्सर सपनों में दिखाई देती... साथ ही सुनाई पड़ती- अम्मा की चीखें! वह ठंड में भी पसीने पसीने हो गई। अपनी जड़ों से दूर, कोची छोड़, कबकी देहरादून चली आयी है- अपनी ससुराल। अभी भी मायके वाला घर, रहरहकर, याद आता है। उन स्मृतियों से भागने के लिए, धन्या ने मुरली पर दृष्टिपात किया। पसीने में नहाया कसरती बदन ... हॉफ टी. शर्ट और बरमूडा पहने, मशक्कत में जुटा मुरली, कलाइयों में प्रतिरोध बैंड फंसाकर, उन्हें खींच रहा था। प्रतिरोध बैंड से जूझते हुए, उसके हाथों की मांसपेशियां, शानदार लग रही थीं ...स्वेदकणों की चमक और खिंचाव के चलते - बिल्कुल मछलियों की तरह! जिस विचार को झटकना चाहती थी, वह पुनः उमड़ पड़ा...अम्मा और उनकी मछलियां! उनको तो मत्स्य विभाग में होना चाहिए था। मछलियों की अच्छी पहचान थी उन्हें। बाजार से चुन- चुनकर, करीमीन और अयाला मछलियां लाती थीं। रसोईं में पारंगत रहीं वे। अप्रवाही जल वाले, वाईपिन बंदरगाह पर, मछली बाजार लगता था। मां के साथ, धन्या भी, यदा कदा वहां जाती। एक मच्छी वाली से तो अम्मा की, खूब जान पहचान हो गई थी। उसका नाम वन्या रहा। वन्या चेची (दीदी) मछुवारन थीं। बुलंद स्वर में कहतीं,"मच्छी ले लो , बढ़िया ताजी चूरा माछी... कहीं और ना पाओगे!..." क्या गजब की, मीन - करी (मच्छी का सालन) बनाती थीं अम्मा ! सब उंगलियां चाटकर, खा जाते। अच्चन(पिता) का मिजाज़ सही रखने के लिए, आए दिन, मछलियां तली जातींं। अच्चन को शायद, अम्मा की यह बात पसंद थी। सुस्वादु मछलियों के व्यंजन, कुछ समय तक माहौल को हल्का रखते; किन्तु फिर... अच्चन का कोप बरसने लगता। धन्या के पिता से, कौन नहीं डरता था?! एक झगड़ालू, शराबी के रूप में, उनकी छवि स्थापित हो गई थी।अम्मा भी न जाने किस मिट्टी की बनी थीं। इतनी मार खाने के बाद भी हंसती, मुस्कुराती रहतीं। ग्रीष्मा- कैसा सुन्दर नाम रहा मां का! देखने सुनने में आकर्षक...घर के कामों में सुघड़, परिश्रमी और मिलनसार स्त्री... फिर भी अभिशापित!! धन्या का बड़ा भाई अशोकन, इस सबसे पहले ही बच निकला। वह मौसी संग रहकर, पढ़ाई करने गया था; फिर वहीं का होकर रह गया। दुबई से उड़ती उड़ती खबर आई थी कि मौसाजी ने अपने निधन के पहले, छोटे भाई कृष्णन को बुलवा भेजा था, अपने 'गोरखधंधे' में शामिल होने के लिए। आश्चर्य इस बात का कि कृष्णन की बेजा हरकतों की वजह से, उसे बहुत पहले, अपने ही परिवार ने त्याग दिया। बरसों से उसकी शकल, किसी ने नहीं देखी। कभी यही कृष्णन, फौज की रसोई में, धन्या के नानाजी का, सहायक हुआ करता था; ऐसा मौसी के मुख से, अनजाने ही निकल गया। वे तो उसकी चर्चा मात्र से, बचती रहीं। लोग यह भी कहते थे, निस्संतान मौसा, मौसी के हाथों, अच्चन ने अशोकन को बेच दिया... दो नम्बर की संपत्ति के लालच में! यूँ भी मातृसत्ता के चलते, मलयाली समाज में अभिभावक, बेटी को ही बुढ़ापे की लाठी बनाते हैं। बेटे को गोद दे देने में, उन्हें काहे का कष्ट?! बल्कि उसकी जिम्मेदारियों से, सहज ही मुक्ति, मिल जानी थी! जो भी हो, धन्या अपने बड़े भाई अशोकन की कमी, शिद्दत से महसूस करती है। अशोकन के लिए भी तो दुबई का माहौल, अच्छा नहीं। कृष्णन जैसा बदनाम व्यक्ति, भैया की संगति, बिगाड़ रहा है। और फिर चेट्टन (बड़े भैया) होते तो उसे माँ बाप के सम्बन्धों का डरावना सच, अकेले ही ना भुगतना पड़ता! एक दिन उसने अम्मा को पड़ोस वाली विभा आंटी से कहते हुए सुना, " धन्या को इस आदमी के साथ अकेला नहीं छोड़ती... जाने क्या कर दे मेरी बच्ची को!" लेकिन धन्या मन ही मन जानती थी कि यह गलत आरोप है। घर में यदि अच्चन किसी से प्यार करते हैं तो वो है उनकी बेटी ... यानी वह खुद! वे शान से कहते रहे, " मेरी बिटिया, हूबहू, मुझ पर गई है... वही शकल ... वही कदकाठी ! " सुनने वाला, तुरत हामी भर देता, " सच कहते हो भैया!" अच्चन का झुकाव, निसंदेह उसकी तरफ था! उसका लिहाज करते हुए भी, वे अम्मा को बख्शते नहीं। ऐसा क्या कर दिया था अम्मा ने ? जो दिनोंदिन, पति के हाथों, नर्क भोग रही थीं ! फोर्ट- कोच्चि के चाइनीज फिशिंग नेट में, फंसी मच्छी की तरह, अम्मा बेबस हो गईं। चाइनीज फिशिंग नेट- जिसके बड़े से जाल में, उछलती, फिसलती नन्ही मछलियां... पर्यटकों को लुभाने वालीं, तड़पती, मचलती मछलियां...मानों छोटे से जीवन को समेटने वाला वृहद कैनवास; ढेरों तमाशबीन, पर बचाने वाला कोई भी नहीं ! धन्या को लगता था, दुनिया ही एक बड़ा मछलीघर है याकि एक बड़ा सागर, जिसमें अनेकों छोटी बड़ी मछलियां तैरती रहती हैं; छोटी मछलियों पर घात लगाती बड़ी मछलियां... और उन पर घात लगाए मगरमच्छ। अच्चन भी तो नित, मगर की भांति घातक हो जाते; कुटुंब की खुशियां, लील जाने को आतुर!! जब तब अम्मा पर बरस पड़ते थे, "कलमुंही! चली जा, अपने उसी दो कौड़ी के, फौजी के पास। तू उसके ही पापों की परछाईं है..." स्वर्गीय नानाजी का ऐसा अपमान... और तो और, माँ को भी उनकी तरह, मर जाने का ताना! उसने सोच लिया कि जब वह किसी काबिल बनेगी; अच्चन को संवेदनशीलता का अर्थ, अवश्य समझाएगी। बरसों तक जिस पत्नी ने, उनके जीवन की बगिया पुष्पित पल्लवित की; उनके लिए, सुख का संसार सिरजा... वह ही सबसे बड़ी दुश्मन हो गई! एक दिन धन्या, सब कुछ बदल देगी। अच्चन को सवालों के कटघरे में खड़ा कर... उनसे उनकी पत्नी और परिवार की दुश्वारियों का हिसाब लेगी। और तब ...उनको शर्मिन्दा होकर, माफी मांगनी ही होगी, उसकी अम्मा से!! किन्तु वह नौबत ही कहाँ आयी...अच्चन तो कबके लिवर सिरोसिस के ग्रास बन गए! अतीत ने धन्या के मन पर, कितने ही जाले लगाए हैं ... वह उन्हें, रगड़कर साफ करना चाहती है; किन्तु वे जिद्दी मछुवारे की तरह, चेतना पर जाल बिछा देते हैं... उसको जोरों से जकड़ लेते हैं। पर धन्या, अम्मा की तरह अभागी नहीं। कोच्चि के यूथ फेस्टिवल में, मुरली से दिल के तार जुड़े... तो सदा के लिए जुड़ गये! पति की आहट पाकर धन्या, अपने विचारों से बाहर निकली। मुरली अचानक, बागान से कैसे चले आए? आशंका ने उसे विचलित कर दिया। आशंका अकारण नहीं थी। पति ने बताया, " अम्मा की तबीयत कुछ ठीक नहीं। फ्लाइट के टिकट करवा लिए हैं।" धन्या तत्क्षण जान गई, मुरली उससे कुछ छुपा रहे थे। उसने पूछा, " इतनी जल्दी टिकट, कैसे मिल गए? " "मिल गए ... बिजनेस क्लास में सीटें, अक्सर खाली रहती हैं...""इतने महंगे!"धन्या समझ गई, अम्मा को जरूर कुछ हो गया है ... दो दिन पहले ही तो उनसे बात हुई थी। उनका स्वर थका थका सा लग रहा था। मुरली भी ज्यादा देर छुपा ना सके। अम्मा हृदयाघात से चल बसी थीं। धन्या के मुंदे हुए नैनों से, गर्म पानी बहने लगा था। मुरली ने सहानुभूतिपूर्वक, उसके कंधे पर हाथ रख दिया। जैसे तैसे करके, वे कोची पहुंचे थे। वहां मौसी की खुली हुई बाहें, उसकी प्रतीक्षा में थीं। वह उनसे लिपटकर, फफक फफककर रोई। अम्मा चिरनिद्रा में, कैसी तसल्ली से, सो रही थीं! शवयात्रा शुरू होने वाली थी। इतने में उसे अपने बड़े भाई,अशोकन की झलक मिली। वह दूर से चोरी छिपे, अम्मा को देख रहा था। धन्या पास गई तो भाई संग , एक दूसरे व्यक्ति का चेहरा भी दिखा। अशोकन और वह व्यक्ति - जानों एक ही सिक्के के दो पहलू... एक भोर तो दूसरा सांझ... चेहरों में, इतनी अधिक समानता...!! उसे पास आते देख, वे दोनों वहाँ से निकल लिए। धन्या अचंभित थी। क्या यह इन्सान, उसका कोई निकट रक्त संबंधी था? वह वापस आ गई। अर्थी उठ रही थी पर अशोकन का कुछ अता पता नहीं। अम्मा को अन्तिम विदा देने के बाद, वह आने जाने वालों को भी विदा कर रही थी कि पिछवाड़े, एक कार की झलक मिली। खिड़की के पास जाकर झांका तो ड्राइविंग सीट पर वही अशोकन का हमशक्ल! मौसी भी चुपके से, वहाँ आ गई थीं। उन्होंने उससे, रहस्यमय स्वर में कहा, " चलो कृष्णन " "हाँ भाभी " कहते हुए कृष्णन ने गाड़ी स्टार्ट कर दी। तो यह कृष्णन था, मौसी का मनहूस देवर! धन्या मानों जम सी गई। अच्चन का व्यंग, दर्द की लकीर बन, उसके भीतर धधक गया,"कलमुंही! चली जा, अपने उसी दो कौड़ी के, फौजी के पास। तू उसके ही पापों की परछाईं है..."तो माँ पर चलाया गया वह तीर, नानाजी को लपेटे में नहीं लेता था... वह तो लपेटता था, उनके ' फ़ौजी ' सहायक कृष्णन को! धन्या को जान पड़ा, वन्या चेची की जगह, वह खुद ही, छोटी सी कड़ा (दुकान) में बैठी है। हाथ में मच्छियों से भरा टोकरा... सहसा वह टोकरा, हाथ से छूटकर, रेत से भरी जमीन पर, पलट जाता है... मछलियां तड़फड़ाकर, कूद रही हैं... धन्या का दिल बैठने लगा। वह अचेत होकर गिर पड़ी!!
