पूजा के बहाने
पूजा के बहाने
श्रीमती नित्या शर्मा ने, अपनी रेशमी साड़ी, वार्डरोब से निकालकर, कंधे पर रखी और कई कोणों से, खुद को, दर्पण में निहारा। सुबह का नाश्ता करके, ऑफिस जाते हुए, शर्मा साहब ने, पत्नी के जलवे देखे और मुस्करा दिये। गलती से, उनके मुँह से, निकल गया, “कहाँ की तैयारी है, सुबह- सबेरे?”
“अरे बाबा, अभी नहीं जा रही हूँ...शाम को जाना है- छह बजे के बाद। शोभना के यहाँ, वरलक्ष्मी- पूजन, है!” नित्या जी ने, बड़ी अदा से, आँखें नचाईं।
“तो अभी से, काहे जुटी हो, भागवान? छह बजने में तो, बहुत समय है!”
इतना सुनना था कि नित्या, क्रोध से उबल पड़ीं, “आपके जैसा, ढीला इंसान तो, पूरी कॉलोनी में नहीं मिलेगा...खुद तो कहीं ले नहीं जाते। पत्नी सारा दिन, घर में सड़ती रहे- आपकी बला से! आउटिंग तो उसे भी, चाहिए या नहीं?!”
“पूजा वाली आउटिंग...!” शर्मा जी को, झटका सा लगा। किन्तु फिर वे, चुपचाप, वहाँ से, खिसक लिए। ज्यादा कुछ पूछना, साँप के बिल में, हाथ देने जैसा था। उनकी सहधर्मिणी, सदैव, आउटिंग की आड़ में, शॉपिंग करना चाहती थी- जिसके चलते…उनकी जेब को, तगड़ी चपत लगती! पहली बार, श्रीमती जी ने, आउटिंग को; किसी दूसरी अवधारणा(पूजा) से, जोड़ा था… अतएव, शर्मा जी का, चकित होना, स्वाभाविक ही था!
श्रीमती शर्मा ही क्यों, श्रीमती राय की, तत्परता भी, देखते ही बनती थी। मोनिका राय, अपनी, जरी वाली साड़ियों संग; आभूषणों को रखकर, देख रही थीं कि कौन सी साड़ी और किन गहनों का तालमेल, उन पर, सबसे अधिक फबेगा। इस हेतु, पड़ोसन की सलाह भी, लेना चाहती थीं; परंतु उसे, घर के कामकाज से ही, फुरसत ना थी। लिहाजा व्हाट्सएप पर, सभी वस्त्राभूषणों की फोटो लेकर, परिचित सहेलियों और भाभियों को, फॉरवर्ड कर दीं- उनके विचार, जानने के लिए।
व्हाट्सएप के ‘सौजन्य’ से, मोनिका जी को, ढेरों सुझाव मिले। उन तमाम सुझावों पर, ‘मंथन’ के बाद, अंततः, एक साड़ी और कुछ एक्सेसरीज़ (जेवर, हैंडबैग व घड़ी) ‘फ़ाइनल’ कर पाईं। अन्य आमंत्रित स्त्रियाँ भी, पीछे रहने वाली, नहीं थीं। सुहागन औरतों के लिए, यह, करवा- चौथ के समकक्ष, उत्सव ही था। उनको बढ़िया से बढ़िया, बनाव- सिंगार, करना था। तेलगुभाषी शोभना राव ने, हाल ही में, सबको निमंत्रण दिया था; वह भी, फोन- कॉल के जरिए। अल्पावधि में, सारा प्रबंध कर पाना; स्त्रियॉं के लिए, महाभारत का युद्ध, लड़ने जैसा था।
किसी की साड़ी को, ‘ड्राई- क्लीनिंग’ की आवश्यकता थी तो किसी को, ताजे फूलों का, गजरा चाहिए था। किसी की मेकअप- किट में ‘ब्लशर’ नदारद था तो किसी को, अपना पसंदीदा, चूड़ियों का सेट, नहीं मिल रहा था!
उन महिलाओं के लिए, दिखावा आवश्यक ठहरा। उनका सामाजिक- वृत्त, एक जो था। नियत समय पर, वे सभी, शोभना राव के दरवाजे पर थीं। श्रीमती राव ने उनके आते ही, अपने दक्षिण के व्यंजन परोसे। उनकी पाक दक्षता से, कुछ स्त्रियाँ कुंठित हुईं; फिर भी वाहवाही तो बनती थी! खाने- पीने के, दौर के बाद, ‘फोटो- सेशन’, हुआ था।
साड़ियों के रंग को, आधार बनाकर, महिलाओं के समूह बने। गुलाबी साड़ी वाली महिला को नीली साड़ी वाली संग खड़ा होना पड़ा; ताकि तसवीर में रंगों का संयोजन अच्छा हो। जो स्त्रियां एक दूजे को पसंद नहीं करती थीं; उनके लिए भी साथ में'पोज ' देना मजबूरी हो गई! फिर एक जैसे रंगों की साड़ियों पहने, औरतों को अलग किया- फोटो लेने के वास्ते। किसी को खड़ा कर, किसी को बैठाकर, पुनः कैमरे को क्लिक कर दिया। अदाएं भी अलग अलग। कभी गलबहियां डाले तो कभी हाथों में हाथ लिए, मुद्रा बनाई गई। एकल छवियां भी कैमरे में उतारी गईं। कुछ ने, अपनी ‘बेस्टी’(खास सहेली) संग, फोटो खिंचवाई। बाद में उन्होंने, ग्रुप फोटो और सेल्फ़ी भी ली थी। कहना न होगा , हर तरह के मेल मिलाए गए- उन 'पिक्स' में।
आखिर उनको जोड़कर, रील बनानी थी। छायाचित्रों की विविधता, रील को प्रभावी बनाने के लिए, आवश्यक जो ठहरी! कोई बढ़िया भजन भी जोड़ना था, ऑडियो में। आजकल दिखावे का चलन ही तो है।
पेटपूजा और फोटो खिंच जाने के बाद, किसी को याद आया कि उनकी ननद, आने वाली थी; उन्हें श्रीमती राव को, बताना पड़ा कि अब निकलना पड़ेगा। शोभना राव, उनको पूजागृह ले गईं। दोनों स्त्रियॉं का, प्रस्थान होते ही; मोनिका जी ने, अपनी पड़ोसन, रीमा चौधरी के, कानों में फुसफुसाया, “शोभना कभी किसी को, अकेले- दुकेले, पूजाघर, नहीं जाने देती...मजाल है- कोई खुद से जाकर, लक्ष्मी माता के, हाथ जोड़ ले; झट साथ, लग लेती है1”
रीमा प्रत्युत्तर में, कुछ बोलीं तो नहीं; किन्तु उनकी आँखों में, प्रश्न उभर आया। मोनिका, जिज्ञासा का समाधान करते हुए, दबे सुर में, कह उठीं, “वहाँ इसने, लक्ष्मी बनाई हैं ; नारियल के, खोल के ऊपर, कपड़ा लपेटकर...”
“हाँ तो?” रीमा भी, खुसपुसाकर, बोलने लगी थीं। “हर बार देवी को, सोने की, कई सारी जंजीरें पहनाकर, सजाती- संवारती है..। सोने की गिन्नियाँ और चांदी के सिक्के, अर्पण करती है...थाल भी चांदी का और दीपदान भी...”
“आप कहना क्या चाहती हैं?”
“इतना सब तो, खोलकर बता दिया...भली औरत! कुछ, अपनेआप भी, समझ लिया करो!!” मोनिका जी ने सायास, अपने चढ़ते हुए स्वर को, धीमा किया, “दिखावेबाजी है सब... हर साल, वरलक्ष्मी पूजन पर, नई साड़ी और गहने पहनती है- त्योहार के नाम पर, राव साहब से, ऐंठ लेती होगी...!”
तभी श्रीमती बॉस ने, ‘एंट्री’ मारी और मोनिका राय की, जिह्वा पर, स्वतः, अंकुश लग गया! नवागंतुक स्त्री से, बतियाने का अवसर, ‘मंडली’ के लिए, ‘टर्निंग- पॉइंट’ जैसा था!! महिलाएँ गपशप भूलकर, उनकी लल्लो- चप्पो, करने लगीं। रीमा ने, औपचारिकतावश, श्रीमती बॉस का अभिवादन, अवश्य किया; परंतु सबकी देखादेखी, उनकी ठकुरसुहाती ना कर सकीं।
उनके दिमाग में तो, श्रीमती राय की बात, नाच रही थी। वे बारंबार, यही विचार कर रही थीं कि क्या वाकई में, भद्र महिलाएँ, पूजाघर से, कुछ चुरा सकती थीं?!
इतने में शोभना जी, पूजा के कमरे से, निकल आयीं और श्रीमती बॉस की, झलक पाते ही, उनके सत्कार में, लग गईं। तदन्तर, ‘विशिष्ट अतिथि’ को, दूसरी स्त्रियॉं के साथ, लक्ष्मी मैया के समक्ष, ले जाया गया। वहाँ सुहागिनों को, भेंट देने के लिए, पैकेट रखे थे। आरती का दीपक, जल रहा था। माँ को, प्रणाम करने के बाद, आरती ली गयी। शोभना जी के, रजत- पात्र से, हल्दी- कुंकुम लेकर, सबने टीका लगाया। एकाध तस्वीर भी खिंची।
सुहागनें, अपना- अपना पैकेट लेकर, चलने को उद्यत हुईं; पर चल न सकीं। बतकही, खतम होने का, नाम ही, नहीं ले रही थी। श्रीमती बॉस, जाने के लिए उठीं तो सभा, विसर्जित होने लगी। नित्या शर्मा ने, उनके उपहार को, कनखियों से देखा। जाने क्यों वह पैकेट, उन्हें, कुछ बड़ा सा लगा!
उन्होंने, सबसे नजर चुराकर, अपनी ‘भेंट वाली’ पॉलीथीन के, भीतर झाँका। हर बार की तरह, इस बार भी, भीगे हुए चने थे; पाँच रुपए के, सिक्के के साथ। फल के नाम पर, एक केला और सेब था। छोटा सा नारियल और पान का पत्ता, स्पष्ट तौर पर, दिख रहे थे और हल्दी- कुंकुम के, पाउच भी। सप्रयत्न देखने पर, अखबार के, टुकड़े में लिपटी, चूड़ियों की झलक मिली। उनकी सरसरी निगाह, एक आकर्षक गिफ्ट- बॉक्स पर पड़ी।
श्रीमती शर्मा, संतुष्ट हुईं। हमेशा जो आयटम, शोभना देती थी; वही सब, इस बार भी दिया था। गिफ्ट- बॉक्स में या तो साज- शृंगार का सामान होगा; या फिर कोई शोपीस। फिर भी यह प्रश्न, जस का तस- ‘आखिर बॉस की पत्नी को, ऐसा क्या दे दिया, जो उनका पैकेट, बड़ा लग रहा था?!’
जाते जाते, नित्या ने, सामने वाले ब्लॉक में, रह रही, मंजूषा से पूछा, “रम्या नहीं आई?” प्रतिक्रिया के तौर पर; मंजूषा ने, चुप रहने का, संकेत दिया तो...नित्या जी के, पेट में, खलबली मच गयी!
इधर राय जी ने, शर्मा जी को, कॉल करके पूछा, “कुछ आइडिया है...ये ‘देवियाँ’, कब तक लौटेंगी?” “भई, हमारी वाली तो कहके गयी है कि देर होने लगे तो ‘स्विगी- जोमैटो’ से, खाना ऑर्डर कर देना।”शर्मा जी, हँसकर बोले। “हमारी ‘मलकिन’ तो, तहरी बनाकर, रख गयी है...लेकिन आज, तहरी खाने का, बिलकुल मन नहीं है। सोचते हैं, हम भी, बाहर से, खाना मँगवा ही लें!” राय जी ने, वार्तालाप शुरू किया था; सो उपसंहार भी, उन्होंने ही किया।
शोभना से विदा लेकर, नित्या और मंजूषा, बाहर आईं। मौका देखकर, मंजूषा जी, तुरत- फुरत; नित्या जी को, पार्क तक, खींच ले आईं। दोनों वहीं बेंच पर, बैठ गईं। प्रपंच के लिए, वह स्थान, सर्वथा उपयुक्त और निरापद था। शुरुआत, मंजूषा ने ही की , “आप पूछ रही थीं ना- रम्या क्यों नहीं आई?” श्रीमती शर्मा की आतुरता, छिपी न रह सकी। उनकी मनोदशा भाँपकर, मंजूषा आगे बोलीं, “दरअसल रम्या, कुछ ज्यादा, होशियार है...अंगरेजी में, गिटर- पिटर करती है...उसे देख, शोभना में, असुरक्षा की भावना आ जाती है।”
“असुरक्षा की भावना...तुम्हारा मतलब है, इनसिक्यूरिटी की फीलिंग?!”
“वही तो! उस पर तुर्रा यह कि रम्या, झीनी पोशाकें, पहने रहती है...उसकी ‘फिगर’ भी लाजवाब है। इसलिए... शोभना ने उसे पूजा में नहीं बुलाया।"
" झीनी पोशाक पहनने वाली को, पूजा में नहीं आना चाहिए; मानती हूँ । उसकी अच्छी अंग्रेजी से, शोभना को हीनभावना होती है , यह भी समझ सकती हूँ। लेकिन उसे पूजा में ना बुलाने की वजह, उसकी अच्छी फिगर...?!" नित्या बुरी तरह, चकरा गई थीं।
बात को स्पष्ट करते हुए, मंजूषा ने कहा, "आप बहुत भोली हैं, नित्या जी। शोभना के यहाँ जाती तो... अब कैसे कहूँ ....?!"
पल भर के विराम के बाद, चर्चा आगे बढ़ी,"शोभना चाहती है- वह उसके पति... आई मीन, राव साहब के सामने ना पड़े।"
“तो इस कारण, हो रहा, रम्या का बॉयकाट!”
बात साफ होने पर, नित्या, खूब हँसीं। गपबाजी में, समय का पता नहीं चल रहा था। स्त्रियों के पति, सोच रहे थे कि पत्नियाँ, उनकी खातिर, लक्ष्मी को, पूज रही थीं। वे इस तथ्य से, अंजान थे कि पूजा तो मात्र, शोभना जी ने की थी। उपवास से लेकर, रंगोली बनाने व पकवान तैयार करने का परिश्रम...देवी मैया की, साज- सज्जा, उपहारों का प्रबंध, इत्यादि...इत्यादि।
अन्य महिलाओं ने तो, बस, सुहागिनों को दी जाने वाली, दान- दक्षिणा, लपक ली थी...कहने के लिए, टीका लगाने और आरती के धुंवे को, अंजुरी में सहेजकर, माथे से छुवाने की, औपचारिकता भर निभाई थी।
सही- सही बात क्या रही...शोभना के यहाँ, पूजा- अर्चना हेतु, स्त्रियाँ, उतावली, क्यों हो जाती थीं; बेचारे पति, कैसे जान पाते?!
