पुल
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मंगला जी के, एक हाथ में, आरती की थाली थी; दूसरे हाथ में घंटी। थाली घुमाने और घंटी हिलाने का काम, वे बड़ी मुस्तैदी से, कर रही थीं; साथ ही, कोई भजन, गुनगुनाती जाती थीं… अपेक्षाकृत ऊंचे सुरों में। उनके पोता- पोती, दूर से, ये नजारा देख रहे थे। पोता, दिल्लगी करते हुए बोला, “बस भी करो, दादी अम्मा...! भगवान जी की, ऐसी मक्खन- पॉलिश, मत करो। हाथ लचक जाएँगे...डॉक्टर अंकल के, पास जाना पड़ेगा।”
“हाथ ही क्यों...गला भी दिखाना पड़ेगा; डॉक्टर को। गाने पर ज़ोर, मार दिया है!” पोती ने भी मजा लिया। इतने में, बच्चों की माँ, सुमेधा आ पहुँची। उसने आते ही, दोनों को, आँख दिखाई। बच्चों को, माँ का दखल, रास नहीं आया। वे बुरा सा, मुँह बनाते हुए, वहाँ से, निकल लिए। सुमेधा ने, चैन की साँस ली। यह तो अच्छा हुआ, सासूमाँ का, पारा नहीं चढ़ा। अपने ‘कुलदीपकों’ को, तो वे, कुछ कहेंगी नहीं; उनकी सारी खुन्दक, निकलती है, बहुरिया पर… हर ‘काण्ड’ में, उसी की पेशी!
भगवान जी के दरबार में, गुस्ताखी, मंगला जी के लिए, अक्षम्य अपराध ठहरा। बच्चों को, संस्कारित न करने का, उलाहना; वे बहुरिया को, जब- तब, दिया करती हैं...इसमें, उन्हें प्रभुता का सुख, मिलता है! उसके खानदान को, कोसते हुए; उस पर, ‘चढ़ाई’ कर बैठना - उनका पसंदीदा शगल रहा! किन्तु अब वह भी, पुरानी हो गयी है; नयी- नवेली तो रही नहीं। अब तो ऐसा ‘सुअवसर’, तभी आता है; जब बच्चों ने, कोई गंभीर भूल, की हो।
सुमेधा, ऐसे अनुभवों पर, पर्दा डालती आई है। मैके में, पता चला तो दस बातें बनेंगी; ससुराल की बदनामी होगी ... सो अलग! नववधुओं को उपदेश देते हुए, सयानियाँ अक्सर कहती हैं, " औरत के कंधों पर दो कुलों की लाज होती है।" सुनने में यह, बॉलीवुड की किसी पुरानी मूवी के डायलॉग जैसा लगता रहा। लोकलाज का जिम्मा, स्त्रियों मत्थे मढ़ने का, चलन जो ठहरा!
सुमेधा ने अपनी युवावस्था में कोई रोमांटिक उपन्यास पढ़ा था ; जिसकी नायिका, मिस यूनिवर्स के फाइनल राउंड की, प्रतिभागी के समान, जुमला उछालती है, "औरतें मायके और ससुराल के बीच का पुल होती हैं।"
तब सुमेधा को, यह संवाद बहुत भाया था। उसकी नाजुक उम्र थी; वह उमर- जिसमें कोरी भावुकता, मन में हलचल मचा देती है। समय की मार, सुमेधा को, उस भावुक अवधारणा से दूर खींच लाई है... बहुत, बहुत दूर...!
मान्यताओं की बंधक बन, पहले ही, बहुत कुछ, सह चुकी है... मानों अभी कल की बात हो, बड़ी जेठानी के बेटे का, मुंडन था। पुराने रिवाज़ों के अनुसार, उसके पैतृक घर से भी, श्रद्धानुसार, ‘चढ़ावा’, आना चाहिए था। किन्तु वहाँ, शहरी संस्कृति होने के कारण, किसी को भी, इस रस्म का, पता न था। सुमेधा, मुँह खोलकर, माँगना, नहीं जानती थी; लिहाजा नाक बचाने के लिए, उसको, अपने जोड़े रुपए, खर्च करने पड़े। तिस पर भी, जेठानी का मुँह, बना रहा। हर उपहार में, मीन- मेख निकालती रहीं।
मइके वाले भी कुछ कम नहीं। भतीजे के अन्नप्राशन पर, भैया ने उसे, अपने कमरे में बुलाया। वहाँ कई सारे गिफ्ट, रखे थे। उसके लाये, बाबा- सूट को दिखाते हुए, उन्होंने कड़ाई से पूछा, “ये क्या लाई हो ?” सुमेधा के आँसू, निकलने वाले थे लेकिन उसके आँसू, कोई देख लेता तो परपंच हो जाता। वह सबके आगे, जगहँसाई, नहीं चाहती थी; अतः चुप लगा गयी। भाभी के, कहे में आकर भैया; जब– तब, यूँ ही, ऐंठते रहते हैं। इसकी चर्चा वह, अपने पति, अखिल से भी, नहीं कर सकी। वे तो अपने, ससुराल वालों को, भेंट देना भी; परम्परा के विरुद्ध, मानते हैं।
परंपरा कहती है- उन सबको, बिटिया के घर का, पानी तक, नहीं पीना चाहिए। अखिल, भैया के, असभ्य व्यवहार के, बारे में; जान लेते तो उसकी ही, नाक कटती। बाद में वे, रस ले- लेकर, निंदा करते - ‘कैसे कैसे लोग हैं, तुम्हारे यहाँ के...खुद को, कपड़े पहनने की, तमीज नहीं... हमारी पसंद पर, उंगली उठाने, चले हैं। आगे से वहाँ जाने की, जरूरत नहीं तुम्हें!’ यदि ऐसा हो जाता तो...माँ से मिलने में भी, रोक लग जाती!
हर बार, अपनी भावनाओं को, दबा लेना; अपमान के घूंट, चुपचाप पी जाना- क्या यही है, स्त्री की नियति?! ब्याह के पहले का और ब्याह के बाद का- कहने को तो उसके दो, दो ठिकाने हैं पर सही में, कोई नहीं। पतिदेव से लड़ाई हो तो कहते हैं, जहां से आई हो, वहीं चली जाओ और पिता के घर, कोई अनबन हो जाये तो सुनने को मिलता है- ‘ तुमको अच्छा नहीं लगता तो यहाँ मत रहो; अपने घर जाओ”
दोनों पक्षों से जुड़े रहने और उन्हें जोड़े रखने में, कितना टूटना पड़ता है, कितना तिरुस्कृत होना पड़ता है- यह तो वही जानती है! किसी से भी, बिगाड़, न करने की सोच...सबसे बनाकर, चलने की सोच- कितना दुख देती है! कभी- कभी, उसका भी, जी करता है- सासूमाँ की तरह, रौब झाड़े; उनके गलत व्यवहार का, विरोध करे…बात- बेबात इतराने वाले, ससुरालियों की पोल खोले और नैहर वालों को भी उनके ‘बड़बोलेपन’ का कड़ा जवाब दे!
परंतु होता इसका उल्टा है। माँ से, पति के घर में होने वाले, बुरे बर्ताव की, शिकायत नहीं कर पाती. साथ ही, पति को...उनके कुटुंब को, भला- बुरा, कहने वाली, भाभी का भांडा भी, फोड़ नहीं पाती। काश...वह अखिल को, बता सकती कि भाभी, उनके लिए; क्या- क्या, बका करती हैं! सारे गिले- शिकवे भी, उसी से, किए जाते हैं...जिनका उसके पास, कोई समाधान नहीं; तभी तो, दोनों पक्षों के बीच, पुल बनने का उपक्रम… हर बार, सुमेधा को ही, बुरा बना देता है; हर बार, यह मध्यस्थता, उस पर, भारी पड़ती है!
बड़ी दीदी, सुनन्दा के बारे में, क्या कहे! वे सदैव, उस पर स्नेह, बनाए रखतीं। उनकी स्नेह- वर्षा उसे, मरुथल में, मरुद्यान जैसा आभास देती रही । सुनन्दा दी के पति, निरंजन जीजू की ठसक, कुछ और ही है। जाने- माने कारोबारी, जो ठहरे। ‘लेनदेन’ के गुर तो, उनकी परवरिश में, रचे- बसे हैं। ब्याह के, चंद दिनों के, भीतर ही; उनके हिस्से की फैक्ट्री, अलग कर दी गयी; ताकि परिवार शुरू करने से पहले, वे उसका बोझ उठाने में, समर्थ हो जाएँ। उनके प्रतिष्ठित, धनी कुनबे के लिए, यह कोई, बड़ी बात न थी। विवाहोपरांत, उनकी निजता का खयाल कर, कारोबारी पिता ने उन्हें; अपने घर के पास ही, दूसरा फ्लैट भी, लेकर दे दिया।
इस सबके चलते, सभी संबंधी और परिचित, मानते रहे - दी, हर तरह से, भाग्यशाली हैं। उनके अपूर्व सौंदर्य ने, उन्हें, एक बड़े घर की, बहू बनाया। सुमेधा का भी, वहाँ, बहुत स्वागत होता था। गृहस्वामिनी की, एकमात्र बहन जो ठहरी! किन्तु उसके ब्याह के बाद, सारे समीकरण, बदल गए। जब तक डैडी, रहे; किसी की हिम्मत न हुई – उससे पंगा लेने की। वह उनकी, सरचढ़ी बेटी थी। तीन बच्चों में, सबसे छोटी संतान! सबसे बड़े सर्वेश भैया, फिर सुनन्दा दी और दी के बाद वह...उसका लगन भी, डैडी ने, अपने हिसाब से; समृद्ध घर में, किया। किन्तु यहीं, चूक हो गयी।
सारा व्यापार, सुमेधा के, ससुर जी के, कब्जे में था। बेटे, उस व्यापार का, हिस्सा जरूर थे; पर पाई- पाई के लिए, पिता का मुँह, देखना पड़ता। ससुर जी के, निधन के बाद, जब कारोबार, भाइयों में बँट गया; उन सबने, स्वतंत्र रूप से, कमाना शुरू हुआ। किन्तु तब, पहले जैसी, बात नहीं रही। व्यवसाय, खंड- खंड, हो चुका था... अतएव, आमदनी भी कम! ऐसे में, माँ ने, अपनी जमापूँजी से; कुछ मदद कर दी तो निरंजन जीजू का, मुँह फूल गया।
माँ, डैडी की, पेंशन पाती थीं। मायके में, उनके नाम, कुछ खेत थे; सो बटाई का पैसा, मिल जाता। डैडी ने, अपना खानदानी मकान, उनके नाम, कर रखा था। वहाँ से भी, किराया आता । वे सर्वसमर्थ थीं। अपनी इच्छा से, किसी पर भी, ‘कृपा दृष्टि’ बरसा सकती थीं। हालाँकि, भाभी को, यह बात अखर गयी कि वह कृपा- दृष्टि, छोटे दामाद पर, बरसी! भैया भी, निरंजन जीजू के बहकावे में आकर… यदा कदा, शिकायती लहजे में, भुनभुनाने लगे। माँ पर भी, एकलौते बेटे का दबाव, कुछ कम न था। उनकी अपनी सीमाएँ थीं। आखिर में तो,’ सपूत’ ही, उनकी चिता को, आग देने वाला था!!
हद तो तब हुई जब- निरंजन और अखिल के, मनमुटाव, का असर; सुनन्दा और सुमेधा के, आपसी मेलमिलाप पर पड़ा। एक- दूजे के विरुद्ध, कमर कसने वाले पुरुष; अपनी पत्नियों को भी…उस झड़प में, खींच लेना चाहते थे । दोनों तरफ से, तनातनी होने लगी। रिश्तों की शतरंज में, बिसात बिछाता कोई है; परंतु उस बिसात के फैलाव में, उलझता कोई और ही है! सुनन्दा और सुमेधा, अनचाहे ही, उस शतरंज की, गोटियाँ बन गईं। अखिल से छुपकर, सुमेधा, कभी- कभार; दीदी से, फोन पर बतिया लिया करती...किन्तु पहले जैसा नेह- संबल, उसे, उनसे, नहीं मिल पाता!!
इतनी खलबली, उसके भीतर मची हुई थी; कभी न कभी, विस्फोट तो होना ही था; पर उसकी पहल, पतिदेव से होगी- यह, उसे ही, कहाँ पता था!
वह एक बहुप्रतीक्षित, रविवार का दिन था। बच्चे, अपने दोस्तों संग, स्कूल- पिकनिक पर गए थे और माँजी सत्संग के लिए। पति- पत्नी की, बाहर; घूमने- फिरने, खाने- पीने की योजना रही। जाने क्यों, अखिल के मुँह से, निकल गया- “सुमि...शोभित और रिया को, साथ ले लेते तो और भी अच्छा होता।” सुमि बनाम सुमेधा, पहले से, भरी बैठी थी। दिल की भड़ास, निकल ही गयी, “भले ही शोभित, तुम्हारा दोस्त हो...लेकिन मुझे वह, बेहद अक्खड़ और बेतकल्लुफ लगता है; उसकी पत्नी रिया तो, और भी ‘महान’ है ...जाने क्या, समझती है, खुद को…एक नम्बर की, घमंडी औरत है!”
“आखिर चाहती क्या हो?! अपने दोस्त से संबंध तोड़ लूँ...जिससे तुम चाहो, उसी से बात करूँ और जो तुम्हें पसन्द नहीं...उसे छोड़ दूँ??” अखिल ने भड़ककर, तंज कसते हुए कहा। ऐसा कहकर, उन्होंने; मानों, फूस की चिंगारी को, हवा दे दी हो!
“बहुत बुरी हूँ? फिर भी, तुम्हारी अम्मा को तो, मैंने ही रखा... उनके नखरे, मैंने झेले... तुम्हारे भाइयों से तो, उनकी दवा- दारू...उनके कपड़े- लत्तों का, खर्चा भी, उठाया नहीं जाता!”
“ तो कौन सा, पहाड़ उठा लिया? पत्नी का कर्तव्य, यही होता है!”
मामला गरम था...दोनों ओर से, अंगारे बरस रहे थे।
कुपित होकर, सुमि बिफर पड़ी, “सारे कर्तव्य, पत्नी के मत्थे; और पति...! क्या उसका, कोई कर्तव्य नहीं...? औरत की भी, कुछ इमोशनल नीड्स...कुछ भावनात्मक आवश्यकताएँ, होती हैं। वह पति के संबंधियों, उसके इष्टमित्रों का खयाल करे...लेकिन पति...! पति, उसकी जड़ें ही काट दे… उसके खून के रिश्तों को- पानी पानी, कर दे... अपनी ही बहन से, बातचीत बन्द करवा दे?!” कहते कहते, उसका मुँह तमतमा गया और वह, हाँफने लगी।
पत्नी का, चंडी- रूप देख, पति दंग रह गए। हालात की नज़ाकत, कुछ ऐसी- कि उन्होंने, चुप रहना ही, बेहतर समझा!
अगला नम्बर, निरंजन जीजू का लगा! हुआ कुछ यूँ कि माँ ने, सत्यनारायण की कथा, रखी थी- घर पर। अखिल, काम के झमेले में, ऐसे फंसे कि आयोजन में, भाग न ले सके। सुमेधा को, अकेले ही, वहाँ जाना पड़ा। पूजा सम्पन्न होने के बाद, पंडितजी और इक्का- दुक्का बाहरी लोग, चले गए; और तब...दीदी उसे सामने देख, बोले बिना, रह न सकीं। उनके परस्पर वार्तालाप को, जीजू, पचा नहीं पाये और गुस्से से फट पड़े, “चलो सुनन्दा, घर चलो। भिखारी टाइप लोगों से, बात करने की, जरूरत नहीं तुम्हें...इससे कहो, अपने पति को समझाये; वह आदमी, कब बदसलूकी कर बैठे- कुछ पता नहीं!”
सुमि ने झट, नहले पर दहला मारा, “भिखारी किसे कह रहे हैं?! क्या हम, आपका दिया खाते हैं? यहाँ एक माँ ही है- जो मुझे कुछ देती है...और माँ, बेटी के बीच, देश का कोई कानून, दखल नहीं दे सकता!”
“साली जी, मैं तो मजाक कर रहा था...आप मजाक भी नहीं समझतीं” सासू माँ को, क्रोध से, लाल होता देखकर; निरंजन ने, पैतरा बदल दिया और एक कुटिल मुस्कान, होठों से, चिपका ली।
“लेकिन जीजू...मजाक का, जवाब देना तो बनता ही है...आप मेरे पति की, बदसलूकी के बारे में, बोल रहे थे; पर आप ही, कौन सी, शराफत दिखा रहे हैं? जब दो भली औरतें, बोलें- बतियाएँ...तो बीच में, दखल देना, ‘बैड- मैनर्स’ कहलाता है!”
बहसबाजी होते देख, भाभी, बीचबचाव करने आयीं। किन्तु बीचबचाव की आड़ में, उनको; घर के, बड़े दामाद का ही, पक्ष लेना था। कहने लगी- “ हमारे इतने काबिल जंवाई हैं, निरंजन जी...कई दिनों बाद तो, आ पाते हैं; तुम ही थोड़ा...शान्त हो जाओ, सुमि!”
सुमेधा का कोप, भाभी पर, बरसना बाकी था। आग्नेय नेत्रों से, वार करते हुए, बोली, “वे काबिल हैं तो मैं, नाकाबिल हूँ क्या?? ब्याह करके, ‘निपटाने’ की जल्दी थी, आप लोगों को! नहीं तो आज...मैं भी कुछ होती!!”
“सुमि… बड़ों से, ऐसे बात की जाती है?!” भैया, हर बार की तरह; अपनी पत्नी के, खेमे में, आ गए।
“बड़ों का लिहाज, आप कबसे, करने लगे भैया?? माँ के सामने, कलेश करते रहते हैं...कभी सोचा- उन पर क्या बीतती होगी?!”
“सुमि...!” सर्वेश, आपे से बाहर, हो रहे थे।
“चिल्लाइए मत भैया! आपको मालूम है- लगन के समय, घर की बेटी के, पाँव क्यों, पूजे जाते हैं? ताकि जब वह नैहर आए, उसे यथोचित सम्मान मिले...आप लोग, सम्मान, नहीं दे सकते। कम से कम, अपमान तो ना करें।” यह कहकर, सुमि; तीर की तरह, उधर से, चली आई।
बड़े भैया, अपनी छोटी बहन के, तर्क के आगे- निरुत्तर थे...निस्तब्ध थे!
वापस आने पर, सासूमाँ, उसे ‘तैयार’ मिलीं। देरी किए बिना, पूछ बैठीं, “वहाँ कुछ, कहासुनी, हो गयी थी क्या?!”
“कहासुनी, किस घर में, नहीं होती, माँजी??” बहू के, कड़े लहजे ने, सास को; आगे कोई, प्रश्न करने से, रोक लिया। इधर सुमेधा, सोच रही थी- '… दो कुनबों को, जोड़े रखने की मर्यादा, क्या केवल महिलाओं के लिए है?? पुरुष क्या समाज का हिस्सा नहीं?!’
हठात ही सुमि को, यौवन की स्मृतियों से जुड़े...अपने प्रिय उपन्यास का अंश, स्मरण हो आया,"औरतें मायके और ससुराल के बीच का पुल होती हैं।" वह तिक्तता से हंस पड़ी। उसे अब, ‘पुल बने रहने में’; कोई दिलचस्पी नहीं थी!!
