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Vinita Shukla

Inspirational

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Vinita Shukla

Inspirational

जीवन रेखा

जीवन रेखा

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समय का पहिया, कब, कैसे, कितना आगे खिसक गया; पता ही नहीं चला...मानों जीवन रेत के समान, हाथ से झरता जा रहा हो। मुक्ता किसी वैरागन सी, डूबते हुए सूरज को तक रही थी। रेवा का व्यंग्य, उसके मन में, ज्वार के समान शोर मचाते हुए, उठ खड़ा हुआ, "तो आप सिंगल पेरेंट हैं।" 

" जी..."

"माफ कीजिएगा, आपके पति ने बहुत पहले आपको छोड़ दिया था; समाज में आपकी छवि बहुत अच्छी नहीं।" "आप कहना क्या चाहती हैं, रेवा जी?" विनम्र बने रहने का कोई जतन, काम न आया और ना चाहते हुए भी मुक्ता का स्वर, तीखा हो गया।

" व्यवहारिक बनिए मुक्ता जी। मेरा बेटा, आपकी बेटी का हाथ थाम रहा है; यह आपके लिए, सौभाग्य का विषय होना चाहिए।" मुक्ता को विचलित पाकर, वह आगे बोली, "आप जानती हैं... हमारी बिरादरी में कितनी इज्जत है, क्या प्रतिष्ठा है।"

इतना कुछ सुनते हुए, मुक्ता अधीर होने लगी। रेवा की तरकश के तीर, खत्म ही नहीं हो रहे थे; बल्कि उनकी चुभन बढ़ती जा रही थी। रेवा ने एक विचित्र शर्त रखी थी। यह कि मुक्ता की बेटी सुवर्णा, वधू रूप में, उनके खानदान में, तभी स्वीकारी जायेगी; जब वह, अपनी ही बेटी से दूरी बना लेगी! 

सुवर्णा के प्रेम विवाह करने का हठ, उसे कैसे दोराहे पर ला खड़ा करेगा; वह कभी, स्वप्न में भी सोच नहीं पाई! उसके भीतर, विचारों की रस्साकसी चल ही रही थी कि सुवर्णा ने पीछे से आकर, गलबहियाँ डाल दीं। 

बिटिया के शब्द मानों, किसी गहरी खाई से, उसे खींच लाए थे, " माँ ...!  प्रेम को भी, व्यापार बना रखा था, उन लोगों ने। मेरी माँ, मेरा अभिमान है... मेरी *जीवनरेखा* है। मैंने साफ कह दिया, जिस घर में, उनकी पूछ नहीं; सम्मान नहीं... वह घर मेरा घर, नहीं हो सकता ... कभी नहीं!"

मुक्ता की आँखें बहने लगी थीं। क्षितिज की रक्ताभा, दिशाओं को, आलोकित कर रही थी!



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