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Sandeep Mohan

Abstract Inspirational Children

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Sandeep Mohan

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समर्थन

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"संसार मे सदैव हर व्यक्ति किसी न किसी समस्या से कभी न कभी जूझ रहा होता है। समस्याएं हर एक व्यक्ति को होती हैं। जिनको अभी नहीं हैं, उन्हें पहले कभी रही होंगी। जिन्हे पहले भी नहीं रही, उनकी प्रतीक्षा समस्याएं भविष्य मे कर रही होंगी।

जीवन की यह एक विशेषता है, यह सदैव परिवर्तनशील रहता है। निरंतर यह परिस्थितियों को बदलता रहता है। और हर व्यक्ति की यही उलझन होती है के वह किस तरह उन परिस्थितियों को अपने अनुकूल रख सकता है। पर दोष परिस्थितियों का नहीं होता, उनका तो स्वाभाव ही बदल जाने का है। परन्तु, व्यक्ति को यह ज्ञात रहना चाहिए के दुखद परिस्थिति मे सुखी रहने का प्रयास कर कर वह सुखो को आमंत्रित कर सकता है, वैसे ही सुखद परिस्थिति मे अधिक की अभिलाषा रख कर दुखी रहने से वह दुखो को आमंत्रित करता है।

यह मानव प्रवृत्ती है, इसमें किसी व्यक्ति का कोई दोष नहीं होता। इन्हीं परिस्थितियों मे हमारा सामाजिक होना हमें सहारा देता है। दुखो मे हमें हमारे मित्र, परिवार जन, और सम्बन्धी हौलसा देते है और बीती बातो को भुला कर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। परन्तु यह प्रत्यक्ष हैं के वर्तमान काल मे हमारे शुभ चिंतक हमारे सुखो मे हमारा समर्थन करने मे असमर्थ हैं।"


शिक्षक के इतना कहते ही कक्षा मे एक बालिका ने अपना हाथ उठाया।

"वह कैसे आचार्य जी?" वह खड़ी हो कर बोली।

"चलो इस बात कों समझने के लिए मैं तुम्हे एक लघु कथा सुनाता हूँ जो मुझे मेरे पिताजी सुनाया करते थे।" आचार्य अपनी कुर्सी से उठ कर कक्षा मे बच्चों के बिच टहलने निकल गए।

"एक गांव मे एक कुम्हार अपने किशोर पुत्र कों मिट्टी के बर्तन बनाना सीखा रहा था। अब तक उसके पुत्र ने केवल गमले और दीपक बनाना ही सीखा था। वह जब भी घुमते हुए चाक पर एक मटका बनाने का प्रयास करता, तब उसके गले का आकार छोटा करते हुए वह मटका ढह जाता। उसके पिता यह देख उससे बहुत निराश होते। पुत्र भी अपने आप से निराश हो जाता और अभ्यास छोड़ देता। एक दिन वह मटका तैयार करने मे कामियाब हुआ और उसके पिता भी उसकी सफलता से खुश हुए। परन्तु निकट आ कर देखने पर कुम्हार को उसके पुत्र के बनाए मटके मे कोई कमी दिखाई दी। उसने अपने पुत्र कों गुस्से से देखा। रसोई से यह सब देख रही उसकी माँ बड़ी चिंतित थी। 'यह मटका भट्टी मे रखते समय ही टूट जायेगा। क्या तुझ मे इतनी अक्ल नहीं? मुर्ख! बचपन से मुझे देख रहा है, सालो से मटके बेच रहा है, इसकी मोटाई कितनी होना चाहिए तुझे पता नहीं?' कुम्हार ने अपने पुत्र कों डाँटते हुए कहा। क्या कोई बता सकता है के यहाँ तक इस कथा मे मेरी पहले बताई हुई बात से कितना सम्बन्ध है?" शिक्षक ने अपनी कक्षा से पूछा। सभी बच्चे सोच मे थे तभी उसी बालिका ने अपना हाथ उठाया।

'हाँ नेहा, बताओ।"

"आचार्य जी, यह उदाहरण हो गया आपकी बात का के दुख की परिस्थिति मे सुखी होने का प्रयास करने से सुख आता है, पर कुम्हार अपने पुत्र की दुखद परिस्थिति मे उसे और दुख दे रहा है।" बालिका ने गर्व के साथ प्रश्न का उत्तर दिया।

"बहुत खूब नेहा। हाँ, किसी भी दुखद परिस्थिति मे हमारे अपने हमें हौसला दे कर ही हमारा समर्थन कर सकते हैं। जो हुआ वह बुरा था, किन्तु हमें अब भविष्य के बारे मे विचार करना चाहिए। कुम्हार अपने क्रोध और निराशा मे घर से बाहर चला गया। किशोर पुत्र अपने हाथो मे कला की कमी कों कोसते हुए रोने लगा। तभी उसके लिए चिंतित हो कर उसकी माँ उसके पास आई। 'उदास मत हो पुत्र कितना सुन्दर मटका बनाया हैं तुमने, यह देखा?' अपनी माँ कों अपने सर पर हाथ फेरते हुए महसूस कर कर युवक ने अपने आँसू पोछे और अपने बनाए हुए मटके कों गौर से देखा। माँ की बात तो सही हैं, मटका थोड़ा कमज़ोर ही सही परन्तु बहुत सुन्दर बना है। उसके पेट की गोलाई और गर्दन का घुमाव उसके पिता के हाथो बने किसी भी मटके से सुन्दर है। यह सोचते हुए उसे हार न मानने की प्रेरणा मिली। उस शाम से युवक ने मध्यरात्रि तक पुरे पंद्रह सुन्दर-सुन्दर मटके बनाए। अपने पिता कों न बताते हुए उसने उन्हें भट्टी मे पकने के लिए रख दिया।

अगली सुबह जब उसके पिताजी दुकान पर पहुचे, उन्होंने देखा के दुकान के बाहर बहुत से लोग खड़े हैं। देखते ही देखते दोपहर से पहले युवक के बनाए सारे मटके बिक गए। उसके पिता के दिन भर की कमाई से दुगनी कमाई युवक ने दिन के पहले पहर मे ही कर ली।

घर लौट कर उसने यह किस्सा अपनी माँ कों गले लगाते हुए बताया। उसके माता-पिता दोनो अपने पुत्र के लिए बहुत खुश थे।

'बहुत अच्छे बेटे, आखिर मेरी डाँट ने कमाल कर दिखाया।' उसके पिता ने ठहाके मारते हुए कहा। पुत्र ने अपनी माँ की और देख कर मुस्कुराते हुए धन्यवाद कहा। यह उसकी माँ का सही समर्थन ही था जिसने उसे आगे मेहनत करने के लिए प्रेरित किया। देर रात्रि भोजन के बाद सोने से पहले, युवक के पिता ने उसे आवाज़ लगाई, 'अरे पुत्र, तुमने आज वाकई मेरे कलेजे कों ठंडक पहुंचाई है। अब मैं जनता हूँ के तुम काम सीख चुके हो। पर अभी ज्यादा खुश होने का समय नहीं हैं। हमारी दुकान की सुराही आस पास के गावों मे भी प्रसिद्ध है। कल से तुम उन्हें बनाना सीखोगे, तैयार रहना।" अपने पुत्र से यह कह कर कुम्हार सो गया। पूरी रात युवक के मन उसके पिता की डाँट ही चलती रही। सुराही की पतली गर्दन बनाना बेहद जटिल कारीगरी का काम था। इस चिंतन के दौरान उसने अपनी माँ को रसोई मे देखा। वह उसे अपने पास बुला रही थी। अपने पुत्र को एक कटोरी खीर देते हुए उसने कहा, "बेटा, पिताजी गलत नहीं हैं, वे चाहते हैं के तुम जल्दी से काम सीख जाओ और व्यापार कों और आगे ले जाओ, उनके कड़े स्वाभाव से तुम अपना मन छोटा न करो। आज की सफलता का आनंद लो और खुश रहो। बेहतर बनने की चेष्टा करो, परन्तु वर्तमान मे स्वयं की उपलब्धियों से प्रसन्न रहो, भविष्य की जाटिलता मे वर्तमान के नन्हेें कुम्हार कों रख कर डराओ मत। वह समय आते आते बहुत कुशल बन जायेगा।" इस प्रसंग के बाद युवक सुख से अपने पिता की डाँट सुनते हुए सारा काम सीख गया और बहुत धनवान व्यापारी बना।

तो बच्चों, क्या आपको समझ आयी मेरी बात?" शिक्षक ने अपनी कक्षा से कहा। नेहा ने फिर खड़े हो कर हडबड़ी मे उत्तर दिया।

"जी आचार्य जी, युवक की माता ने उसका समर्थन किया सही समय पर सही सुझाव दे कर। उसे दुख मे सुख ढूंढ़ना सिखाया और सुख मे सुखी बने रहना सिखाया।"

"बहुत अच्छे नेहा। समर्थन बच्चों, एक ऐसा उपहार है जो हम सभी कों नहीं देते। यह उपहार हम केवल अपनो को ही देते हैं क्योंकी यह एक उपहार ऐसा हैं जो साथ मे दो और कीमती उपहार ले जाता हैं, समय और सम्मान। सम्मान की अनुपस्थिती मे समर्थन सदैव गलत होता है। जैसे कुम्हार के मन मे अपने पुत्र के प्रति सम्मान न होने के कारण वह उसे बेहतर बनने की चिंता करने कों कह रहा था। उसके उलट युवक की माँ जिसके मन मे अपने मेहनती पुत्र के लिए ढेर सम्मान था, उसने उसे वर्तमान मे प्रसन्न रहते हुए मेहनत करते रहने की प्रेरणा दी।"


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