उपहार
उपहार
किसी भी उपहार का मोल इस बात से निर्धारित होता है के उसे देने वाला अपने संग्रह मे से कितनी कीमत का त्याग करता है। आधुनिक काल मे उपहार केवल औपचारिकता मात्र रह गया है।
एक उपहार जो सबसे ज्यादा कीमती है अब दिया नहीं जाता। लोग उसे संजोह कर रखते पर खुद भी उसे बर्बाद ही करते है। यह एक ऐसी संपत्ति है जिसको बाँट कर ही उसका सही उपयोग किया जा सकता है।
भीम सिंह अपने गांव से बाहर नौकरी के सिलसिले मे अपने दो बच्चों और बीवी को छोड़ कर रहता था। अकेले एक छोटे कमरे मे हर रात वो बस अपने परिवार को याद करता रहता। अपने बूढ़े माँ-बाप के बारे मे सोच कर अक्सर वो रोया करता था। उसे इस बात से थोड़ी राहत थी के उसके माता पिता उसके बच्चों की परवरिश मे उसकी बीवी का हाथ बटा सकते थे।
महीने मे एक बार भीम सिंह का यही प्रयत्न होता था के वह अपने बच्चों से मिल सके। जब भी वह जा पाता, वह अपने बच्चों के लिए उपहार मे कुछ मिठाईया और खिलौने ले जाता। पर उसका छोटा बेटा कुमार सभी उपहारो को परे कर सबसे पहले अपने पिता के सीने से लिपट जाता और नम आँखों के साथ भरी आवाज़ मे सिर्फ एक ही बात कहता, 'पिताजी, अब वापस मत जाना।'
लेकिन हर बार रविवार की रात कुमार के सो जाने के बाद वह बस पकड़ कर शहर लौट आता।
अपनी पंद्रह साल की बेटी नंदनी के जमन्दिन को लेकर भीम सिंह बहुत उत्साहित था। उसके लिए उसकी बेटी पूरे संसार से बढ़ कर थी।
शाम को दफ़्तर से लौटते हुए उसने अपनी बेटी के लिए एक बहुत सुन्दर लेहेंगा, बीवी के लिए एक साड़ी, बेटे के लिए कुछ खिलौने और माता-पिता के लिए फल खरीदे।
शाम की आखिरी बस का इंतज़ार करते हुए वह बस स्टॉप पर खड़ा था। तभी कुछ बदमाश उसके हाथ से उपहारो का झोला छीन कर भाग गए। घबराहट मे वह उन बदमाशों के पीछे भाग पड़ा। कुछ कदम दौड़ा ही था के बस ने सिटी बजा कर उसे चेतावनी दी। यदि वह बदमाशों के पीछे भागा तो अपने बच्चों से मिलने समय से नहीं पहुंच पायेगा।
असमंजस मे कुछ पल खड़े-खड़े उसने बस मे बैठना ही उचित समझा।
पूरे पांच घंटो का सफर भीम सिंह ने इन्ही विचारों मे बिताया के वह अपने बच्चों से क्या कहेगा, महीनों मे एक बार वह कुछ उपहार ही तो अपने बच्चों को दे पाता था। हताश, निराश वह अपने घर की और चलता रहा।
अगली सुबह दहलीज़ के भीतर कदम रखते ही कुमार आकर उससे लिपट गया। 'पिताजी, अब वापस मत जाना' उसने फिर रोते हुए कहा। भीम सिंह ने मजबूरी मे फिर वही झूठा वादा किया के अब वह वापस नहीं जाएगा।
नंदनी को जन्मदिन की बधाई देते हुए उसने माफ़ी मांगी और उसे पूरा किस्सा सुनाया के क्यों वह उसका उपहार नहीं ला सका। नंदनी ने उसके पिता के पास बैठ कर प्यार से कहा, 'आप अपनी इतनी व्यस्त दिनाचार्य मे से हमसे मिलने के लिए इतना समय निकाल लेते हैं, इतना लम्बा सफर कर के हम से मिलने आते हैं, आपका यह उपहार किसी भी अन्य उपहार से बढ़ कर हैं।'
यह सुन भीम सिंह की आँखों मे आंसू आ गए। उसने दूर बैठ कर मुस्कुराते हुए अपने पिता को देखा।
'दादा जी कहते हैं, समय से बड़ा कोई उपहार नहीं। किसी को समय दे पाना और किसी से समय मिलना सबसे बड़ा उपहार हैं।' मुस्कुराते हुए भीम सिंह ने नंदनी को गले से लगाया और उसके बूढ़े दादा जी उठ कर करीब आये।
'बेटा भीम, हम जानते हैं के कितनी मेहनत से तुम अपने परिवार के लिए पाई पाई जोड़ते हो, हमें गर्व हैं तुम्हारे इस समर्पण पर। और उपहार के खिलौने चार दिन मे टूट जाते हैं, कपडे दो दिन मे मैले हो जाते हैं, मिठाईया उसी दिन खा ली जाती हैं, पर तुम्हारा यह समय का उपहार हमें अगली मुलाक़ात तक ताकत देता हैं।'
भीम सिंह ने अपने चालीस साल के जीवन मे अपनी पंद्रह साल की बेटी से एक बहुत बड़ा सबक सीखा। समय सबसे ज़्यादा मूल्यवान हैं। और इसकी भेट सबसे बड़ी होती हैं। अपने इस्तीफे पर दास्तखत करते हुए भीम सिंह के मन मे केवल यही विचार थे। उसने जाना के जीवन मे अपने ख़ास लोगो को समय से बड़ा कोई उपहार नहीं दिया जा सकता। और वही हमारी मृत्युशय्या पर हमें याद आता हैं, अपनों के संग बिताया समय।
