Bhanu Soni

Romance


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Bhanu Soni

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सिलसिले प्यार के

सिलसिले प्यार के

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प्यार से दुनिया बनी, प्यार के आगे हर वजूद झुक जाता है, और इस सृष्टि को रचने वाला भी तो, स्वयं प्यार की ही कहानी कहता है, लेकिन तब जब एक ही तरह की आत्मीयता दोनों तरफ हो, निश्छल और निस्वार्थ ,जहाँ इसका ऐसा रुप हो, वो कभी असफल हो ही नहीं सकता। 

ऐसे ही प्यार को अभिव्यक्ति प्रदान करती हैं कहानी 'सिलसिले प्यार के'।

विद्यालय की अनबन और मासूम दोस्ती से शुरू हुआ यह सिलसिला, कौन जानता था, कि प्यार के गहरे निशान छोड़ जायेगा। 

प्रज्ञा और अनिल दोनों एक ही कक्षा में पढते थे। शायद यही वह यह उम्र होती हैं, जिसमें नि:श्छलता और मासूमियत समायी होती है।

उन दोनों का प्रथम परिचय आपसी अनबन से शुरू हुआ था।

प्रज्ञा एक शान्त और सरल स्वभाव की थी, उसे बस अपने काम से काम रहता था। 

लेकिन अनिल, का स्वभाव इसके विपरीत, संगति भी तो अच्छी नहीं थी उसकी। 

प्रज्ञा की यही कोशिश रहती थी, की बस उससे सामना ना हो।

दूसरी तरफ अनिल अवसर की ताक में रहता कि, उसे कैसे परेशान करे, 

कभी उसकी बैच गंदी कर देता, तो कभी चाॅक से उसके बैग पर लकीरे बना देता। 

कह नहीं सकते थे कि वो यह सब प्रज्ञा को परेशान करने के लिए करता था या, उसका ध्यान खींचने के लिए। 

प्रज्ञा को पता था, ये सब कौन करता हैं, लेकिन वो कुछ बोल नही पाती थी। 

लेकिन एक सिलसिला सा बन गया था, अनिल का उसको परेशान करना और प्रज्ञा का देखकर भी चुप रहना। शुरुआत में जो नापसन्द थी उसको लेकर, वह भी शायद अब कम हो गयी थी। लेकिन वो ये बराबर देखती जरूर थी की, उसने आज क्या शरारत की हैं। शायद अब ये सब उसे भी अच्छा लगने लगा था। 

लेकिन कुछ दिनों से अनिल दिखाई नहीं दिया, तो जाहिर है, उसकी तरफ से कोई शरारत भी नहीं हुई थी, अब जहाँ उसे राहत मिलनी चाहिए थी, कि उसकी परेशानी खत्म हो गयी थी, वहीं वह उदास परेशान रहने लगी, 

और इसी उदासी से जब वह घर गयी, और उसकी माँ ने किसी बात पर डाँट दिया, तो वह फूट-फूट कर रोने लगी। 

माँ की डाँट इतनी तेज न थी कि, वह इस तरह रो दे, लेकिन कारण वास्तव में क्या था, वह स्वयं नही जानती थी। 

उसने काफी दिन अनिल का इंतजार किया, फिर पता चला उसके पापा का तबादला दूसरे शहर में हो गया है। 

विद्यालय का अंतिम वर्ष था, गुजर गया, उसके बाद भी कुछ दिनों तक उसकी याद बनी रही। 

लेकिन समय है, किसी की याद के लिए कहाँ रूकता है, और हर याद समय के साथ धुँधली हो जाती हैं।

अनिल कि याद का पन्ना भी प्रज्ञा के जीवन की डायरी से धीरे-धीरे 

अलग हो गया। 

इस बीच उसके जीवन में बहुत से बदलाव हुए उसके पिता की मृत्यु और घर भी बदल लिया था उन्होने, एक इंश्योरैंस कप्पनी में काम करती थी वह, जहाँ से अब उसकी पद्दौन्नति होने वाली थीं। 

 सम्मान बढने की खुशी के साथ ही, उसे आज ही इस दफ्तर का सारा काम खत्म भी करना था। 

उसने सभी काम निपटा कर, सभी से विदा ली, और चल पड़ी 

एक नये सफर की ओर। 

आज उसे अपना नया ऑफिस और नया काम सम्भालना था। 

जब वह अपने बाॅस से मिली, तो उन्होने उसे सारे काम समझाते हुए, यह भी कहा कि यह काम आपके लिए नया हैं, इसलिए आपको एक साल, आपके सीनियर के साथ काम करना होगा। यह कहते हुए उन्होने उसे वही काम करने वाले मेहता जी से मिलने के लिए भेज दिया। 

जब वह वहां पहुंची तो मेहता जी वहां नही थे, कुछ देर इंतज़ार करने के बाद वह वही बाहर गलियारे में घूमने लगी, जब वापस लौटती है, तो देखती है, उसके बैग पर कुछ निशान बने हुए थे, कुछ निशान जो उसके जाने पहचाने से थे। 

प्रज्ञा ने जैसे ही सिर उठाया, तो सामने अनिल खड़ा था। 

उसने अपना परिचय दिया, मेरा नाम अनिल मेहता है, अगले एक साल आपको मेरे ही साथ काम करना है। 

और.................. 

और ये निशान तुम भूली तो नहीं होगी शायद........?? 

प्रज्ञा ने पूछा तुम गायब कहाँ हो गये थे, एकदम से बिना बताये?? 

सोचा था बता दूँ, लेकिन मैं तुम्हें फिर से परेशान नहीं करना चाहता था, लेकिन सच मानो जो सिलसिला तब शुरू हुआ था, वो अब तक भी वैसा ही है।

 कैसा सिलसिला प्रज्ञा ने पूछा?? 

मेरी तरफ से प्यार का............. 

तुम्हारी तरफ से........... पता नहीं,अनिल ने कहा। 

यह सुनकर प्रज्ञा भी सिर झुका कर मुस्कुरा दी, जैसे वह भी यही सुनना चाहती थी। 


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