सिक्के के दो पहलू
सिक्के के दो पहलू
आफ़ताब के अब्बू जैसे ही घर में घुसे , अपनी बीवी के चेहरे पर चिंता देख घबराते हुए बोल पड़े " क्या हुआ बेगम ? सब ठीक तो है इस तरह मुँह क्यू उतरा हुआ है ? कुछ है तो मुझे बताइये और ये आफ़ताब नज़र नही आ रहा है? "
"क्या बताऊ ? आप जानते तो है आज वही दिन है, ज़ब उसने ख़ुशी ख़ुशी अपना कारोबार जमाया था और अब देखो एक साल पहले उसने क्या सोचा था अपने कारोबार की तरक्की को लेकर और देखो क्या हो गया।
मुये कोरोना ने सब कुछ तहस नहस कर दिया, बेचारा मेरा बेटा उसी का सदमा लिए बाहर आँगन में बैठा है , पैसे तो डूबे ही डूबे समय भी कितना बर्बाद हो गया उसका, यही गम उसे खाये जा रहा है, मुझे तो डर है कही हमारा इकलौता बेटा कही कुछ ऊंच नीच न कर बैठे , उसके सिवा हमारा है ही कौन।
आप ही समझाये उसे, मुझसे तो समझ नही रहा। " आदिल साहब की बीवी आसिया जी ने कहा।
"ठीक है, मैं समझाता हूँ उसे, आप जाकर चाय बना कर लाइए चाय पिऊँगा तो थोड़ी थकान भी उतर जाएगी " आदिल जी ने कहा और बरामदे में बैठे अपने बेटे आफताब की और चलने लगे।
आफ़ताब जो की हाथ में एक पत्ता पकड़ा था और उसे तोड़ तोड़ कर फेक रहा था , अपने कांधे पर किसी का स्पर्श महसूस होता देख उसने पीछे देखा और अपने पापा को पीछे खड़ा देख घबराते हुए उठने लगता है , किन्तु आदिल जी, आफ़ताब को वही बैठने का कह कर स्वयं भी उसके पास बैठ जाते हैं।
और उसकी तरफ देखते हुए कहते है " क्या हुआ? क्यू इस तरह उदास चेहरा लिए यहाँ बैठे हो?
आफ़ताब ने अपनी झुकी नज़रे उठाते हुए अपने पापा की तरफ देखा और बोला " पापा आप जानते तो है , आज पूरा एक साल हो गया, आज के दिन मैं, आप और अम्मी कितना खुश थे ज़ब मैंने अपनी और आपकी जमा पूँजी लगा कर हलवाई की दुकान खोली थी।
सब ने कितनी बधाई दी थी मुझे मेरे अपने काम को लेकर, सब कुछ कितना अच्छा जा रहा था, ग्राहक भी जुड़ने लगे थे , थोड़ा बहुत मुनाफा भी होने लगा था, लेकिन न जाने किसकी नज़र लगी और सब कुछ बर्बाद हो गया, पूरे साल भर की मेहनत मिट्टी में मिल गयी, जितनो से कर्जा लिया था वो भी नही चूका सके कम्बख्त कोरोना ने पूरा कारोबार तहस नहस कर दिया, मेरे एक साल की मेहनत सब मिट्टी में मिल गयी।
बस इसी वजह से उदास हूँ, अच्छा होता की अपने गुज़रे उस एक साल को कही और लगा देता, कही जॉब कर लेता कम से कम इतना पैसा और लोगो का कर्जा तो नही चढ़ता, जिसे चुकाने में जो कुछ भी था सब चला गया, दुकान भी बिक गयी कितनी मेहनत और प्यार से उसे सजाया था, सब बेकार हो गया, शुक्र है आपकी पैंशन का सहारा है नही तो न जाने क्या हो जाता
आदिल साहब ने उसकी तरफ देखा और विनम्रता पूर्वक उसे अपने सीने से लगाते हुए बोले " कोई बात नही बेटा, ये सब होना तय था, इस बारे में सोच सोच कर खुद को परेशान मत करो।
हम सब जानते है की तुमने उस मिठाई की दुकान के लिए कितनी मेहनत की थी, अपना कारोबार करने का जो जज्बा मैंने तुम्हारे अंदर देखा था, वो कभी मेरे अंदर भी हुआ करता था, लेकिन शायद मुझमे तुम्हारी तरह हिम्मत नही थी और न ही मेरे हालातों ने मुझे कुछ करने की इज़ाज़त दी और फिर बस नौकरी का होकर रह गया , और अब रिटायर हो बैठा।
बेटा सिर्फ तुम्हारा ही नही इस कोरोना में न जाने कितनो के कामों पर ताला लग गया, बेटा हर सिक्के के दो पहलू होते है एक चित और एक पट, इसी तरह जिंदगी रुपी सिक्के के भी दो पहलू होते है, एक वो पहलू जिसमे हमारे साथ अच्छा या बुरा हुआ होता है, और दूसरा वो पहलू जिसे हम पहले पहलू वाले के बारे में सोच सोच कर ख़राब कर देते है
बेटा मैं जानता हूँ ये साल तुम्हारे लिए अच्छा नही गुज़रा, सिर्फ तुम्हारे लिए नही पूरी दुनिया सिमट कर रह गयी थी इस कोरोना काल और लॉकडाउन में
बेटा तुम सिर्फ इस एक साल की बुरी यादों के पहलू को क्यू देख रहे हो, इसके दुसरे पहलू को भी देखो। तुमने जितना समय अपनी दुकान पर लगाया उसमे तुमने बहुत सारा अनुभव प्राप्त किया, उसी के साथ साथ ग्राहकों को किस तरह से संभालना है वो भी तुमने इस एक साल में सीख लिया
भले ही कोरोना की वजह से लगे लॉक डाउन के चलते तुम्हारी दुकान बंद हो गयी लेकिन उस दुकान में प्राप्त किया अनुभव तो तुम्हारे पास है, उसे तो कोई तुमसे नही छीन सकता
और बेटा दूसरी बात, तुम पैसों के बारे में चिंता कर रहे हो, तुम्हे ये सदमा है की तुम्हारे और मेरे दोनों के पैसे कर्ज़े में चले गए और साथ ही साथ दुकान भी बिक गयीबेटा ज़रा इसे इस तरह सोचो की अगर इस कोरोना के चलते मुझे तुम्हे या फिर तुम्हारी अम्मी को कुछ हो जाता, तब क्या होता, क्या हम उन्हें कभी वापस ला सकते थे।यहाँ तक की अपनों का चैहरा भी नही देख सकते थे , न जाने किसे अपने हाथो से कब्र में उतारते कुछ पता नही होता
बेटा ज़रा सोचो पैसे तो दोबारा भी कमाए या इकट्ठे किये जा सकते हैं लेकिन हम तीनो में से किसी को कुछ हो जाता तो फिर क्या होता?
अगर खुदा न करें तुम्हे कुछ हो जाता, तुम तो हमारा सब कुछ हो, तब हम कैसे ज़िंदा रहते और किसके सहारे ज़िंदा रहते ।
इसलिए बेटा ज़्यादा परेशान न हो, परेशान और उदास हो कर अपनी जिंदगी के दुसरे पहलू को बर्बाद मत करो , अभी भी समय है, और मुझे यकीन है आज नही तो कल तुमने जो अनुभव एक साल में कमाया है, उसके बल बूते तुम जल्द ही दोबारा अपनी दुकान बना लोगे
शर्त ये है की तुम्हे उस गुज़रे पहलू की यादों को अपने दिलो दिमाग़ से निकालना होगा, और सोचना होगा की अगर इससे बुरा कुछ हो जाता तुम्हारे साथ तब तुम क्या करते।
आदिल साहब की कही एक एक बात आफ़ताब के अंदर हौसला भर रही थी, अब उसे समझ आ गया था की उसे गुज़रे पहलू की बुरी यादें याद कर उदास नही होना बल्कि उस गुज़रे पहलू में जो कुछ अच्छा हुआ उसे याद कर जिंदगी में आगे बढ़ना है।
