Shailaja Bhattad

Inspirational


5.0  

Shailaja Bhattad

Inspirational


सीख

सीख

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कई बार सुनने में आता है उसने कहा इसलिए मैंने ऐसा किया मेरी क्या गलती है ।

यानी सामने वाला अपने दिमाग का इस्तेमाल करके आपसे कुछ भी करवा लेता है लेकिन आप स्वयं की बुद्धि का इस्तेमाल कर उसके सही या गलत होने का आकलन करने में सक्षम नहीं हैं। 

अपनी यादों के झरोखों से एक घटना निकालकर आपको बताती हूं। मेरे कॉलेज दिनों का एक वाकया है। हमारे महाविद्यालय में कुछ सीनियर लड़कियां दीवाल पर किसी का नाम लिख रही थी और मुझे भी लिखने के लिए कहा, तब मेरा जवाब था ,नहीं मैं नहीं लिखूंगी क्योंकि यह करना मेरी आदत बन सकती है इसका परिणाम इतना अच्छा निकला कि, मैं तो गलत कार्य करने से बची ही साथ ही वे लड़कियां भी लिखा हुआ पोंछकर वहां से चली गई। कहने का अर्थ है हमें क्या करना है और क्या नहीं इसका रिमोट हमारे पास ही होता है। बस उसका सही इस्तेमाल करने की आवश्यकता है । कई लोग दूसरों के अहित में खुद का हित देखते हैं और खुश रहते हैं लेकिन अगर हम सोच और कर्म से पाक हैं तो गलत मंशा रखने वालों की कभी जीत नहीं हो सकती ना ही हमारे जीवन में भटकाव की स्थिति उत्पन्न हो सकती है फिर हम यह भी नहीं कह पाएंगे कि मेरे भाग्य में तो बहुत कुछ था लेकिन प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण मैं वह सब हासिल नहीं कर पाई या पाया।

 खुद को संभाल कर चलना ही जिंदगी की सबसे बड़ी सीख है अगर हम सभी संभले हैं तो फिर यह धरती भी जन्नत ही है। परिस्थितियों के सामने झुक जाना या परिस्थितियों से समझौता करना अथवा घबराकर पीछे हटना आमतौर पर कहने और सुनने में आता है। डरना ही सारी समस्याओं की जड़ है और समाज के लिए अभिशाप भी क्योंकि डर के कारण ही व्यक्ति अपने कर्तव्य पथ से विमुख होता है , डर से सोचने समझने की शक्ति सुप्त अवस्था में आ जाती है और देखते ही देखते व्यक्ति गलत रास्ते की ओर अग्रसर होकर समाज को दूषित करने लगता है।

कई लोग स्वयं को आगे रखने के लिए षड्यंत्रकारी जीवन शैली अपनाते हैं। वहीं कई लोग ऐसे भी हैं जो जानते हैं कि दूसरों की लाइन को छोटा करने के लिए खुद की लाइन को बड़ा कर लेना चाहिए अर्थात् सही पथ पर अग्रसर रहते हैं।

हम सभी सुर-असुर युद्ध से अच्छी तरह वाकिफ हैं। जीत हमेशा धर्म की ही होती है सद् कार्य करने वाले ही सर्वदा बने रहते हैं व सुखी और आनंदित रहते हैं यहां भी यही हाल है कई लोगों का आचरण सुर की भांति है तो कईयों का विपरीत और कौन ज्यादा सुखी है हम सब भलीभांति जानते हैं।

कई बार देखने व सुनने में आया है कि किसी के प्रतिस्पर्धा में बार- बार जीतने पर उसे और अधिक प्रोत्साहित करने की बजाय, शाबाशी देने की बजाय व उससे अच्छा सीखने की बजाए लोग उसे अब प्रतियोगिता में भाग न ले, औरों को भी मौका दे कहकर निरुत्साहित करने लगते हैं ।भई उसने तो किसी को भाग लेने से या जीतने से रोका नहीं है वह तो पूरी तन्मयता से अपनी साधना कर रही है या कर रहा है तो आप भी उसका यह गुण अपनाएं नाकि उसके भविष्य का निर्धारण कर उसमें भटकाव की स्थिति उत्पन्न करें।आप खुद के रास्ते चलिए ना कि दूसरों की लाइन को पोंछकर छोटा कीजिए।

 किसी के फटे में टांग अड़ाना तो सुना है लेकिन किसी के अच्छे में तो टांग मत अड़ाइए ।

मैं अपनी लेखनी को एक बहुत ही सुंदर श्लोक से विराम देना चाहुंगी आत्मदुर्व्यवहारस्य फलम भवति दु:खदम् ।

तस्मात् सद्व्यवहर्तव्यं मानवेन सुखैषिणा ।।

अर्थात् अपने द्वारा किए गए दुर्व्यवहार का परिणाम दुख देने वाला होता है अतः सुख चाहने वाले मनुष्य को दूसरों के साथ अच्छा व्यवहार करना चाहिए।


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