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Arya Jha

Drama

4  

Arya Jha

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श्वसुर का पश्चाताप

श्वसुर का पश्चाताप

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आज फिर बेटे ने धक्का दे दिया था ,घर मे उस वक़्त कोई ना था ,पिता के कराह का उसपर कोई असर ना था ,असर होता भी तो कैसे? वह तो बरसों पूर्व नशे की काली दुनिया में खो चुका था,वो तो नौकर बाज़ार से सब्जी लेकर लौटा तो उन्हें जमीन पर पड़े देखकर एम्बुलेंस मंगवाया,डॉक्टर के बहू त पूछने पर भी वह असलियत कह ना सके ,उन्हें कुछ दिनों तक नर्सिंग होम में ही रहना था ,70 की उम्र में हड्डियाँ कब आसानी से जुड़ती हैं,अपने ही पुत्र के किए पर आँखे नम थी और दिल भरा-भरा सा था।

दोपहर में बहू स्कूल से लौटते वक्त सास को पार्लर से लेती हुई घर आयी तब उसे घर की दुर्घटनाओं के विषय मे पता लगा,द्वारिकाप्रसाद जी ने वकील को नर्सिंगहोम में ही बुला लिया था और अपनी समस्त सम्पति बहू के नाम कर दी ,इस बात का पता लगते ही धर्मपत्नी आशा जी आगबबूला हो उठीं, "मेरे जीते जी इस सारी संपत्ति का मालिकाना हक बहू को देने का मतलब?" "हम बूढ़े और कमज़ोर हो गए हैं ,विकास हमसे सारी संपति जब्त कर बर्बाद कर देगा ,बहू के नाम पर कर दिया कम से कम पोते - पोतियों की पढ़ाई - लिखाई सही तरह से चलेगी," "ये सब तो मैं अपने हाथों ही करवा देती," "तुम क्या करवाती जो आजतक उसे सुधार तक ना सकी,हमेशा ही तुम्हारे लाड़ - प्यार ने उसे बिगाड़ा ही है ....जब पहली बार सिगरेट पिया तब थप्पड़ ना जड़ सकी ....जब स्कूल फेयरवेल में दोस्तों के साथ बीयर पार्टी कर रहा था तब तुमने मुझसे लड़- झगड उसके हाथों में पैसे दिए,उन्हीं अमीरजादों के साथ जब ड्रग्स लेने लगा तब भी तुम्हारी ममता अंधी रही........आंखों पर गांधारी के समान पट्टी बांध कर उसे बर्बाद होता देखती रही,"बेटे के गलत परवरिश के लिए पत्नी को दोषी मानते थे ,मन खिन्न था,आज सारी भड़ास निकाल रहे थे, "आपने कौन सा ध्यान दे दिया ?आप भी तो पैसे बनाने की धुन में घर से बाहर रहे, मैं अकेली जवान बेटे को कितना संभालती ," "काम कर रहा था ,धन संग्रह कर रहा था ,पर अब जान गया हूँ कि पूत सपूत तो धन का संचय और पूत कपूत तो का धन संचय?दोनों ही हालातों में ये धन बेकार है,इसलिए अब इसे नेक कर्म में लगाना चाहता हूँ," "मैने सोचा था शादी के बाद सुधर जाएगा," "तभी अपने बेरोजगार नशेड़ी बेटे के लिए एक अच्छी लड़की का जीवन बर्बाद कर दिया ,तुम्हारे बिगड़ैल लाडले को जब मैं रिहैब सेंटर में छोड़ने गया तो पीछे से तुमने किसी शरीफ परिवार की लड़की देख उसका ब्याह तय कर दिया और अपने पक्ष में यह दलील देती रही कि शादी के बाद तो अच्छे - अच्छे सुधर जाते हैं," "वह भी तो उसे सुधार ना सकी,मेरे ही बच्चे के सब दुश्मन बने हुए हैं,जो दिल में आए कीजिए ,"बोलकर वह सुबकने लगीं, " विकास की गलतियों पर पर्दा मत डालो,उस पर से मेरा भरोसा जाता रहा,अच्छा है कि बहू सरकारी अफसर है,उसके साथ उसके बॉडीगार्ड्स रहते हैं,उससे ये कोई बदतमीजी नहीं कर पाएगा , अब सही समय आ गया है कि फिर से उसे रिहैब सेंटर में भेज दिया जाय,मकानों से जो किराया आ रहा है बहू उससे बच्चों की पढाई व विवाह भी अच्छी तरह सम्भाल लेगी," "क्या आप भी कुछ भी बोल रहे हो ?मेरे लिए कुछ नहीं रखेंगे?" "मेरा पेंशन तुम्हारे खाने ,पहनने व पार्लर के लिए काफ़ी होगा,थोड़ी शर्म करो आशा ......एक लड़की क्या - क्या ख्वाब लेकर ससुराल आती है?हमने क्षिप्रा को क्या दिया? एक ड्रग्स के नशे में डूबा इंसान,अब तुम्हारी यही सज़ा है कि तुम बहू को सम्पति का एकाधिकार दे दो ," क्रोध से आशाजी तिलमिला उठीं और तड़ाक!ये क्या उन्होंने बहू पर हाथ उठा दिया ,सभी सन्न रह गए ,एकबारगी बहू को विश्वास ही नहीं हुआ कि ये हाथ उसपर उठे थे,चुपचाप कमरे से निकल सरकारी आवास पर जाने के लिए सामान पैक करने लगी,जबतक सब रोकते उसने घर छोड़ दिया था,आशा जी ने सपने में भी ना सोचा था कि गलत - सही ढंग से जमा राशि इस तरह उनके हाथ से निकल जाएगी , हार कर आशाजी ने क्षिप्रा के आगे हाथ -पांव जोड़े और उसे मना कर घर ले आयी ,बेटे के अंदर भी बहू के लिए सम्मान था क्योंकि जेबखर्च अब वही देने लगी थी,सास -ससुर भी कुछ सुरक्षित महसूस करने लगे थे ,अब पैसों के लिए विकास ने उन्हें परेशान करना छोड़ दिया था ,उसे यह विश्वास हो गया था कि जो मेरी पत्नी का है वह मेरा ही है, यह वसीयत ना था बल्कि एक ससुर का पश्चाताप था, एक पढ़ी - लड़की को अपने नालायक बेटे से विवाह कराने के उपरांत उनकी आत्मा उन्हें धिक्कारती रही थी जिसके कारण वह इस नतीजे पर पहुंचे थे,अब घर में सबकुछ तो नहीं बदला था पर एक ससुर की आत्मा को कुछ हद तक शांति मिली थी ,उनके हाथों हुए अपराध की कोई माफी नहीं थी पर वह तड़प जो बहू के निर्दोष चेहरे को देख कर उठती थी और उन्हें ग्लानि में डुबोती थी वह शांत हो गई थी ,विकास को रिहैब सेंटर भेज दिया गया और क्षिप्रा अपने सास - ससुर की बेटी बन आजीवन उनकी सेवा करती रही।


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