शून्य
शून्य
"शून्य को कभी देखा है आपने ?"
इस बात पर तुनकते हुए उसने कहा,"ये क्या सवाल है ?हाँ,बचपन से तो पढ़ते आ रहे हैं और लिखते रहते हैं।उसमें नयी बात क्या है? शून्य,सिफर या zero और nil या not कुछ भी कह लो उसकी हैसियत तो नही बढ़ती है न?"
"अरे, मैं कह रही हुँ,कभी शून्य के आकार पर गौर करके देखा है आपने? पूरा गोल होता है लेकिन अंदर से एकदम खोखला।" कह कर वह एकदम चुप हुयी।लेकिन मैं मन ही मन सोचने लगी, 'हमारी अपनी दुनिया भी तो गोल है और अगर गौर से महसूस करो तो हम सबकी अपनी अपनी दुनिया एकदम खोखली सी ही तो होती है... हम रिश्तों को जिंदगी भर सहेजते रहती है, लेकिन रिश्तों के अपने भरम होते हैं।
जिंदगी की शाम के पड़ाव पर जैसे रिश्तों की उलझन कुछ बढ़ने लगती है।कैसे इन रिश्तों को सहेजे?सारे रिश्ते हाथ की मुट्ठी से सरकती रेत की तरह फिसलते जा रहे है और पीछे बढ़ता जा रहा खोखलापन उन रिश्तों में अंदर कही गहरे तक......
बेहद खौफ़नाक सा अहसास होता है ये शायद।
