Aprajita 'Ajitesh' Jaggi

Drama


0.3  

Aprajita 'Ajitesh' Jaggi

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सगुन के सिक्के

सगुन के सिक्के

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"भाई साहब अपनी निम्मो के विवाह पर तो आपको आना ही पड़ेगा।"

छोटे भाई ने बहुत जोर देकर कहा तो उमेश जी ने मन ही मन संकल्प लिया कि इस बार वो गाँव जरूर जाएंगे।

सोचने लगे, निम्मो भी तो अपनी बिटिया सी ही है। उसके विवाह पर जाना तो जरूरी है। एक सप्ताह पहले ही जाना चाहिए। तैयारी में छोटे भाई की मदद हो जाएगी। वो है भी तो सीधा सा। उससे अकेले इतना कुछ कैसे संभलेगा।

निश्चय किया कि छोटे भाई के अकाउंट में एक लाख रुपए डलवा देंगे। उनकी तरफ से इतना कन्यादान तो बनता ही है। अपनी ही बिटिया का तो विवाह हो रहा है।

"पापा मैं रात को देर से लौटूंगा। आप लोग चिंता मत करना। " किसी पार्टी में जा रहे बेटे की आवाज सुनते ही, उनके मन में शंका डोली।

दरवाजा बंद करते हुए सोचने लगे। ठीक है.... निम्मो मेरी बिटिया सी है। मैं तो एक लाख दे रहा हूँ। पर बेटे का विवाह करूंगा तो.... छोटा भाई थोड़े न एक लाख देगा। लड़कों की शादी में तो लोग कम ही शगुन देते हैं। मेरे तो दोनों लड़के ही हैं।

मन को समझाया। अरे, गाँव में कहाँ ज्यादा खर्चा होता है शादी करने में। एक हलवाई बिठा देते हैं बस। दो -चार पकवान ही तो परोसने होते हैं। यहाँ शहरों में ही आग लगी हुयी है, डेढ़ -दो हजार रुपए प्लेट से नीचे तो खाना पड़ता ही नहीं।

छोटे भाई को पचास हजार देना भी बहुत होगा। इतने में ही सारा गाँव अचम्भा करेगा कि देखो निम्मो के ताऊ का कितना बड़ा दिल है।

अपनी प्रशंसा की कल्पना से उनके होठों पर मुस्कराहट आ गयी।

"अरे वाह। आप किस बात पर मुस्कुरा रहे हैं। जरा मुझे भी तो बताइये। " पत्नी की आवाज सुन वो चौंके।

"अरे कुछ नहीं गाँव से छोटे का फोन आया था। निम्मो के विवाह में आने के लिए बड़ा जोर दे रहा था।" उन्होंने सफाई देते हुए कहा।

"सही तो कह रहा है। हमें तो सगाई पर भी जाना चाहिए था पर तब न सही अब विवाह में तो जरूर ही जाएंगे जी। " पत्नी खुशी -खुशी बोली।

"हाँ बच्चे क्या करेंगे जा कर। पर हम दोनों जरूर जाएंगे। वैसे मैं सोच रहा हूँ छोटे को पचास हजार रुपए भिजवा दूँ। " कुछ झिझकते हुए वो बोले।

"हाँ जी तुरंत भेज दीजिये। अपनी ही तो बिटिया है, सो कम से कम इतना देना तो बनता ही है। "

पत्नी का उत्तर सुन उन्हें कोफ़्त हुयी। जाने कैसी पत्नी मिली है उन्हें। सब की पत्नियां, पति को ज्यादा खर्च करने से रोकती हैं। पर उनकी पत्नी का बस चले तो उनके पास एक भी दमड़ी न बचे। अरे, पच्चीस हजार देना भी काफी है। एक छोटे भाई की ही बेटी तो नहीं है न। कल को बहन की बेटी का भी विवाह होगा। चचेरे भाई बहनों के बच्चों के विवाह होंगे। तीन साले और सालियों के बच्चे भी तो आज नहीं तो कल विवाह करेंगे ही।

उनके चेहरे पर अब सुकून था।

फिर अचानक उन्हें ध्यान आया कि शगुन की राशि तो इक्कीस हजार होगी। बल्कि इक्कीस क्या, ग्यारह हजार ज्यादा मांगलिक राशि रहेगी।

पत्नी बीच -बीच में उनके चेहरे की भाव-भंगिमा को देख रही हैं । विवाह के इतने वर्षों में अपने पति की नस -नस से वाकिफ हो चुकी हैं ।

वो जानती हैं कि पति अंततः कुछ नहीं भेजेंगे। विवाह में न जाने का भी कोई न कोई बहाना ढूंढ ही लेंगे। न सिर्फ पति तंगदिल हैं , बल्कि ये खुशफहमी भी पाले रहते हैं कि वे दरियादिल हैं। पति की इस आदत के कारण उन्हें अक्सर शर्मिंदा होना पड़ता है।

अब तक उमेश जी ग्यारह हजार से कहीं नीचे ..... ग्यारह सौ रुपए, लड़के के लिए घड़ी और निम्मो के लिए एक साड़ी...... तक पहुँच चैन के खर्राटे ले रहे हैं।

बाकी सोच -विचार, वो अब अगले दिन करने वाले हैं।



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