Dr Jogender Singh(jogi)

Inspirational


4.5  

Dr Jogender Singh(jogi)

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सबसे खूबसूरत फ़िल्म

सबसे खूबसूरत फ़िल्म

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“ चलोगे भैया ? शहर तक जाना है ।" हम तीन लोग थे ,शिव , संतोष और मैं । 

"चलेंगे!! पर पन्द्रह रुपये पड़ेंगे ।" रिक्शे वाले ने मानो , न जाने का मन बनाया हुआ था क्योंकि शहर तक तीन सवारी के नौ या दस रुपए पड़ते थे । 

"क्यों भाई ? पन्द्रह क्यों लोगे , जब नौ रुपए पड़ते हैं ।" शिव ने अपनी ज़ोरदार आवाज़ में पूछा । वैसे भी हम तीनों के साथ होने पर शिव ही मोल भाव करता था । 

"देख रहें है भैया जी कितनी धूप है ? चमड़ी काली पड़ जाती है धूप से , फिर उधर से सवारी भी नहीं मिलती , ख़ाली आना पड़ेगा ।" रिक्शा वाले ने बैठे बैठे जवाब दिया ।

"अरे भाई , उठ तो जाओ , क्या पुलिया पर बैठे बैठे रिक्शा चलाओगे ? चलो दस रुपये ले लेना ।" शिव अपने चिर परिचित अन्दाज़ में बोला ।

रिक्शे वाला अपना अँगोछा समेटते हुए , हम सभी पर बहुत भारी अहसान करते हुए उठा । “ देखो भैया बारह रुपये से कम एक पैसा भी नहीं लूँगा । चलना हो तो अभी तय कर लो । इतना बोल रिक्शे वाला सामने लगे हैंडपम्प पर मुँह धोने चला गया । 

हम तीनों ने सड़क पर दूर तक देखा , कोई रिक्शा नज़र नहीं आया ।सामने वाली पुलिया पर दो ऑटो खड़े थे , पर ऑटो का किराया दे पाना हम लोगों के बजट से बाहर था । 

"क्या करें यार ?कहीं पिक्चर न छूट जाये । मुझे यह पिक्चर हर हाल में आज ही देखनी है ।" शिव मानो क़सम खा के आया था ।

"पर कोई दूसरा रिक्शा दिख नहीं रहा और यह साहब तो जाने को तैयार नही ।" संतोष अपनी ख़ास हँसी हँसते हुए बोला । 

"हर बात पर दाँत मत फाड़ा कर , किसी दिन गिर जाएँगें ।" शिव ने संतोष का मज़ाक़ बनाया । 

“ बारह रुपए दे देते हैं , एक रुपया एक आदमी पर अतिरिक्त आएगा । मैंने समझाना चाहा ।

"तुम चुप रहो , मैं कर रहा हूँ न बात ।" शिव ने रिक्शे वाले को आवाज़ लगाई “ आओ चलो भाई ” । 

रिक्शे वाला मुँह हाथ धोकर अपनी सुस्ती मिटा चुका था ।अँगोछा सिर पर लपेट कर बोला “ बारह रुपए ” । 

"चलो !! शिव बैठते हुए बोला ।" मैं और संतोष भी रिक्शे की सीट पर किसी तरह सेट हो गये । 

"तुम कहाँ के रहे वाले हो ?" शिव ने रिक्शे वाले से पूछा ।

“ मऊ के ।" रिक्शे वाले ने अनमने उत्तर दिया । 

त"ब तो अपने ज़िले के हो , मैं भी मऊ का रहने वाला हूँ ।" शिव उत्साह से बोला ।

“तुम्हें कौन सा हीरो पसंद है ?" शिव का अगला प्रश्न ।

"अरे भैया कौन पसंद है, उससे क्या फ़र्क़ पड़ता है , पिक्चर देखने का पैसा कहाँ है मेरे पास ।" 

"फिर भी कोई तो पसंद होगा ?" संतोष बोला ।

"पसन्द तो हमें अक्षय है , अच्छी फ़ाइट करता है , वो ब्लैक बेल्ट रहा है अपने जमाने का ।"

“ अक्षय की पिक्चर देखने जा रहें है हम लोग भी ” शिव जोश से बोला । यह सच था शिव के कारण ही मैं और संतोष नई पिक्चर देखने जा रहे थे । क्योंकि शिव अक्षय को पागलपन की हद तक पसंद करता था । 

"तुम देखोगे पिक्चर ?" शिव ने अपने स्वभाव के विपरीत रिक्शे वाले से पूछा । हम दोनों भी चौंक गए ।

"हमारे पास इतने पैसे कहाँ साहब ? न ही इतना वक्त ।" मायूसी से रिक्शे वाला बोला ।

"देखो , तुम्हें उधर से सवारी जल्दी मिलेगी नहीं , तो ऐसा करो हम लोगों के साथ पिक्चर देख लो , फिर वापिस ले आना । “ तुम्हारी टिकट के पैसे मैं दूँगा किराये के पच्चीस रुपये आना जाना , ठीक ?" शिव का अक्षय के लिए इतना पागलपन हम लोगों के लिए भी नया था । 

“ ठीक है साहब" , रिक्शे वाला ख़ुशी ख़ुशी पेडल मारने लगा ।

रिक्शे वाले ने पूरी पिक्चर हम लोगों के बराबर बैठ कर देखी । अतिरिक्त खर्च के कारण हम तीनों ने बाहर खाने का प्रोग्राम छोड़ दिया । मेस में आ कर खाना खाया । पर रिक्शे वाले की ख़ुशी और जोश देख कर वो पिक्चर हम लोगों के जीवन की सबसे खूबसूरत फ़िल्म बन गई । 

किसी ने सही कहा है "ख़ुशी बाँटने से दोगुनी हो जाती है ।"



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