"सौदा-ए-इश्क"
"सौदा-ए-इश्क"
आज के दौर की हवाओं में अजीब सी बेचैनी है। जहाँ मोबाइल की स्क्रीन पर प्यार शुरू होता है और कोर्ट के कमरों में जाकर खत्म हो जाता है। आर्यन और रिया की कहानी भी उसी अंधेरे रास्ते की एक मिसाल है, जिसे आज की पीढ़ी 'आज़ादी' समझ बैठी है। हकीकत तो यह है कि जब लड़का और लड़की घर की दहलीज लांघकर, अपनों की दुआओं को ठुकराकर सिर्फ एक सर्टिफिकेट के भरोसे जिंदगी बसाने निकलते हैं, तो वो भूल जाते हैं कि मकान ईंटों से बनता है पर घर वफादारी और संस्कारों से। आर्यन और रिया ने भी वही किया जो आजकल एक 'Trend' बन गया है—चुपचाप भागकर कोर्ट मैरिज कर ली। उन्हें लगा कि समाज और परिवार के कायदे-कानून उनकी मोहब्बत की राह में रोड़ा हैं, पर उन्हें क्या पता था कि वही कायदे असल में ढाल थे। शादी के कुछ ही महीनों बाद, जब वो शुरुआती आकर्षण का नशा उतरा, तो कड़वी असलियत सामने आने लगी। जिस आर्यन की आँखों में रिया ने कभी अपने सुनहरे भविष्य के सपने देखे थे, अब उन आँखों में किसी और के लिए हवस और वफ़ादारी का अभाव झलकने लगा था। आर्यन अब अक्सर देर रात घर आता, और उसकी कमीज़ पर किसी और लड़की के इत्र की खुशबू होती। जब रिया सवाल करती, तो जवाब में प्यार नहीं, बल्कि गालियां और मारपीट मिलती। वहीं रिया, जो खुद को इस घुटन भरे कमरे में अकेला महसूस करने लगी थी, उसने भी अपनी रूह की तड़प मिटाने के लिए किसी गैर-मर्द का कंधा तलाश लिया। यह रिश्ता अब पवित्र बंधन नहीं, बल्कि एक 'Toxic' समझौता बन चुका था, जहाँ दोनों ही एक-दूसरे को धोखा दे रहे थे और अपनी ही नज़र में गिर रहे थे। समाज में आज यही तो हो रहा है। बिना सोचे-समझे किए गए फैसले अक्सर मारपीट और क्लेश की भेंट चढ़ जाते हैं। जब लड़का गलत निकलता है, तो एक लड़की का पूरा संसार उजड़ जाता है, और जब लड़की राह भटक जाती है, तो खानदान की पगड़ी मिट्टी में मिल जाती है। कोर्ट की मुहर आपको पति-पत्नी का दर्जा तो दे सकती है, पर वो आपको एक-दूसरे का वफादार नहीं बना सकती। आज के आर्यन और रिया एक ऐसी बंद गली में खड़े हैं जहाँ से पीछे मुड़ने का कोई रास्ता नहीं और आगे सिर्फ अंधेरा है। मारपीट के नीले निशान तो शायद समय के साथ फीके पड़ जाएँ, लेकिन जो घाव रूह पर लगे हैं, वो उम्र भर रिसते रहेंगे। सुखविंदर की कलम से (कहानी का अंत): "रिश्तों की डोर अगर वफादारी के धागे से न बंधी हो, तो वो गले का फंदा बन जाती है। आजकल के युवाओं को लगता है कि बड़ों की सलाह पुरानी पड़ गई है, पर सच तो यह है कि जो घर अपनों के आंसुओं पर खड़ा होता है, वहां खुशियों की शहनाई कभी नहीं बजती। मेरा संदेश उन सब के लिए है जो जल्दबाजी में अपनी जिंदगी का सौदा कर लेते हैं—याद रखना, जहाँ चरित्र की पवित्रता नहीं और जहाँ ईमानदारी का वास नहीं, वहां प्यार सिर्फ एक धोखा है। आज आर्यन और रिया के पास न घर वालों का सहारा है, न एक-दूसरे का विश्वास। अंत में सिर्फ एक मेज़ पर रखे तलाक के कागज़ और ज़िन्दगी भर का पछतावा ही उनकी जमा-पूंजी है। जो भागकर घर बसाते हैं, अक्सर उन्हें ही सबसे ज़्यादा भागना पड़ता है—अपनी ही यादों और गुनाहों से।"
