न्याय की गूंज: कर्मों की किश्त
न्याय की गूंज: कर्मों की किश्त
शहर की सबसे ऊंची इमारत, 'ए.ए. एंपायर', जिसकी चमक सूरज की रोशनी को भी फीका कर देती थी, वह आर्यन और अमन के खानदान की शान थी। उनका कारोबार सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि समुद्र पार तक फैला हुआ था। आर्यन, जो इस साम्राज्य का असली हकदार और दिमाग था, उसकी आँखों में एक ऐसी चमक थी जो सच्चाई और ईमानदारी से उपजी थी। उसकी पत्नी रिया, जो उस ऊंचे ओहदे पर होकर भी जमीन से जुड़ी थी, आर्यन की सबसे बड़ी ताकत थी। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक काला साया पल रहा था—अमन का लालच। अमन को लगता था कि बराबर की हिस्सेदारी होना उसका हक नहीं, बल्कि पूरी सल्तनत पर अकेले उसका राज होना चाहिए। उसे आर्यन की वह सादगी पसंद नहीं थी, जहाँ वह गरीबों के हक की बात करता था। अमन के मन में यह अहंकार बैठ गया था कि "पैसा ही खुदा है और जिसके पास पैसा है, उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता।" अमन ने एक ऐसी साजिश रची जिसने भाईचारे के पवित्र धागे को तार-तार कर दिया। उसने बिजनेस के करोड़ों रुपये चुपके से गायब किए और सारा इल्जाम आर्यन पर मढ़ दिया। इतना ही नहीं, उसने दादा जी के उन पुराने वफादारों को भी खरीद लिया जिन्होंने आर्यन को बचपन से देखा था। एक रात, भरे दरबार जैसी मीटिंग में, अमन ने आर्यन को 'गद्दार' और 'चोर' घोषित कर दिया। आर्यन की आँखों में आंसू नहीं थे, बस एक गहरी खामोशी थी। रिया ने जब देखा कि उसका पति, जिसने इस बिजनेस को अपने खून-पसीने से सींचा, आज उसे ही बेइज्जत किया जा रहा है, तो उसने आर्यन का हाथ थामा और कहा, "आर्यन, यहाँ से चलते हैं। कुदरत की अदालत में इंसाफ की चक्की भले ही धीरे चलती है, पर वह पीसती बहुत बारीक है। आज इसने हमारे साथ जो किया है, उसे उसका हर्जाना यहीं चुकाना होगा।" आर्यन और रिया उस आलीशान महल और करोड़ों के बिजनेस को छोड़कर एक साधारण सी जिंदगी जीने चले गए। अमन अब अकेला राजा था। उसने जुल्म की सारी हदें पार कर दीं। उसने छोटे व्यापारियों के धंधे चौपट कर दिए, मजदूरों की मजदूरी छीन ली और अपने घमंड में यह कहने लगा, "दुनिया में कोई शक्ति नहीं जो मेरा बाल भी बांका कर सके।" वह भूल गया था कि परमात्मा का कानून इंसान के कानून से बहुत अलग होता है। यहाँ ब्याज समेत हिसाब देना पड़ता है। वक्त का पहिया घूमा। अमन ने जो एक परसेंट का पाप किया था, उसका हर्जाना अब दो परसेंट के हिसाब से वसूलने का समय आ गया था। उसे एक ऐसी बीमारी ने घेरा जिसने उसके शरीर को हिला कर रख दिया। उसके पास दुनिया के सबसे महंगे डॉक्टर थे, लेकिन कोई भी उसकी रात की नींद वापस नहीं ला सका। जिन लोगों को उसने धोखा दिया था, वे एक-एक करके उसके खिलाफ खड़े हो गए। जिस दौलत पर उसे नाज था, वही दौलत उसके लिए गले की फांसी बन गई। उसकी कंपनी दिवालिया होने की कगार पर पहुँच गई। जिन 'दोस्तों' के साथ वह जश्न मनाता था, उन्होंने ही उसकी पीठ में छुरा घोंप दिया। एक शाम, अमन अपने उसी आलीशान दफ्तर की खिड़की से नीचे देख रहा था, जहाँ से कभी उसे पूरी दुनिया छोटी लगती थी, लेकिन आज उसे अपनी जिंदगी बोझ लग रही थी। उसे एहसास हुआ कि उसने जो दर्द आर्यन और रिया को दिया था, कुदरत उसे उससे कहीं ज्यादा दर्द लौटा रही है। तभी दरवाजे पर दस्तक हुई। सामने आर्यन खड़ा था। अमन को लगा कि आर्यन अपनी जीत का जश्न मनाने आया होगा, लेकिन आर्यन के हाथ में कंपनी के वो कागजात थे जिन्हें उसने अपनी नई मेहनत से फिर से खड़ा किया था। आर्यन ने शांत स्वर में कहा, "अमन, मैंने तुझे कभी अपना दुश्मन नहीं माना। तूने दौलत छीनी, मैंने मेहनत की। तूने नफरत दी, मैंने सब्र किया। आज तू जिस हाल में है, वह मेरा दिया हुआ नहीं, बल्कि तेरे अपने कर्मों का हर्जाना है। कुदरत का नियम है—जो बोओगे, वही काटोगे।" अमन फूट-फूट कर रोने लगा। उसे समझ आ गया कि इस धरती पर कोई भी कितना भी बड़ा क्यों न हो जाए, वह ऊपर वाले के न्याय से बड़ा नहीं हो सकता। उसने एक कदम गलत उठाया था, और आज उसकी पूरी जिंदगी लड़खड़ा गई थी। सुखविंदर की कलम से एक पैगाम: "इंसान को लगता है कि वह बंद कमरों में पाप करके बच जाएगा, लेकिन याद रखना, ऊपर वाले की डायरी में हर एक आंसू का हिसाब दर्ज होता है। अगर तुमने किसी का एक कतरा खून बहाया है, तो तुम्हें अपनी आँखों से समंदर बहाना पड़ेगा। यहाँ न्याय इसी धरती पर होता है, क्योंकि परमात्मा किसी का कर्जदार नहीं रहता।"
