बेबस तिजोरी: जब पैसा हार गया"
बेबस तिजोरी: जब पैसा हार गया"
शहर की सबसे ऊँची इमारत के तीसवें माले पर, जहाँ से पूरी दुनिया छोटी नज़र आती थी, आर्यन अपनी आलीशान मेज़ पर बैठा था। आर्यन—जिसका नाम ही कामयाबी का दूसरा नाम बन चुका था। उसके पास वो सब कुछ था जो एक इंसान ख्वाब में देखता है—करोड़ों का साम्राज्य, मँहगी गाड़ियाँ और नौकर-चाकर। लेकिन इस चमक-धमक के पीछे एक गहरा सन्नाटा भी था।
सुबह के चार बजे थे। दुनिया सो रही थी, लेकिन आर्यन की आँखों में नींद नहीं, बल्कि अगली बड़ी 'डील' के आंकड़े घूम रहे थे। उसके लिए रिश्तों का मतलब भी अब 'मुनाफा' और 'नुकसान' तक सिमट गया था।
तभी, उसके फोन की थरथराहट ने सन्नाटा तोड़ा। छोटे भाई का फोन था। आर्यन ने झिझकते हुए फोन उठाया, "अमन, तुम्हें पता है न मैं इस वक्त कितना बिजी होता हूँ?"
"भैया..." अमन की आवाज़ में सिसकियाँ थीं, "पापा... पापा की हालत बहुत बिगड़ गई है। डॉक्टर कह रहे हैं कि शायद ये उनकी आखिरी रात है। वो बार-बार आपका नाम ले रहे हैं।"
आर्यन के हाथ से सोने का पेन नीचे गिर गया। उसने तुरंत अपनी मँहगी कार निकाली और अस्पताल की तरफ भागा। रास्ते भर वो खुद से कहता रहा, "मैं दुनिया के सबसे बड़े डॉक्टर बुलाऊंगा, करोड़ों खर्च कर दूँगा, पापा को कुछ नहीं होने दूँगा।"
अस्पताल पहुँचते ही वह सीधा आईसीयू की तरफ बढ़ा। डॉक्टर ने उसे रोका और धीमी आवाज़ में कहा, "आर्यन जी, अब दवा काम नहीं करेगी। उनके पास बहुत कम वक्त बचा है। पैसा यहाँ हार चुका है, अब बस आप उनके पास बैठिए।"
आर्यन जब कमरे के अंदर गया, तो वहां सन्नाटा पसरा था। सिर्फ मशीनों की 'बीप-बीप' सुनाई दे रही थी। उसने देखा, उसके पिता—जिन्होंने उसे कंधे पर बिठाकर पूरी दुनिया दिखाई थी—आज खुद बिस्तर से उठने के काबिल नहीं थे। उनकी आँखें दरवाज़े पर टिकी थीं, जैसे वो आर्यन का ही इंतज़ार कर रहे थे।
आर्यन ने उनका ठंडा हाथ अपने हाथों में लिया और फूट-फूटकर रोने लगा। "पापा, देखिए मैं आ गया! मैं आपको दुनिया के सबसे बड़े अस्पताल ले जाऊंगा। आप जो कहेंगे मैं वो करूँगा। प्लीज, मुझे छोड़कर मत जाइए।"
पिता ने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें खोलीं। उनकी उंगलियों ने आर्यन के हाथ को धीरे से दबाया, जैसे कह रहे हों— "बेटा, मुझे मँहगा इलाज नहीं, तुम्हारा थोड़ा सा वक्त चाहिए था।" और इसके साथ ही मॉनिटर की लकीर सीधी हो गई।
आर्यन उस रात जान गया कि उसकी तिजोरी में रखे करोड़ों रुपये, उसके पिता की एक आखिरी सांस भी नहीं खरीद सकते थे। वह शहर का सबसे अमीर आदमी तो था, लेकिन उस पल दुनिया का सबसे गरीब इंसान महसूस कर रहा था।
सुखविंदर की कलम से: एक संदेश
"दोस्तों, पैसा कमाना और कामयाब होना बुरा नहीं है, लेकिन इतना भी अंधे मत बन जाना कि जब पीछे मुड़कर देखो तो हाथ में सिर्फ नोट हों और पास में कोई अपना न हो। याद रखना, जब वक्त का वार पड़ता है, तो तुम्हारी सारी दौलत एक पल की मोहलत भी उधार नहीं दे सकती।
आज ही अपनों के पास बैठो, उन्हें वक्त दो। क्योंकि रिश्तों की भरपाई पैसों से कभी नहीं की जा सकती।"
