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sukhwinder Singh

Inspirational

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sukhwinder Singh

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नीलाम होती जड़ें और परदेसी रोटियां

नीलाम होती जड़ें और परदेसी रोटियां

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पंजाब की सुनहरी धूप में चमकते वो पांच एकड़ के खेत अब विक्रम की मलकियत नहीं रहे थे। आज सुबह ही तहसील में कांपते हाथों से अंगूठा लगाकर आए थे विक्रम। उनके हाथों की वो गहरी लकीरें उस मिट्टी की गवाह थीं, जिसे उन्होंने अपनी पूरी जवानी और रगों का खून देकर सींचा था। पर आज, उन्हीं हाथों ने अपनी 'माँ' जैसी ज़मीन को एक अनजान दलाल के नाम कर दिया। वजह सिर्फ इतनी थी कि बेटा आर्यन और बहू रिया का वो 'कनाडा' वाला सपना पूरा हो सके। उन्हें लगा था कि परदेस की धरती पर कदम रखते ही गरीबी के सारे पुराने दाग धुल जाएंगे और डॉलर की चमक उनकी हर हसरत पूरी कर देगी, पर वो मासूम ये भूल गए थे कि अपनी जड़ें काटकर कोई भी पेड़ कभी हरा नहीं रहता। ​उधर, सात समंदर पार टोरंटो की उस हाड़ कंपाने वाली बर्फीली ठंड में आर्यन सुबह चार बजे अलार्म की तीखी चीख सुनकर उठता है। कमरा इतना सर्द है कि बाहर निकलती सांसें भी धुआं बन रही हैं। जब वह रसोई में जाकर फ्रिज से निकाली हुई हफ़्तों पुरानी ठंडी और सूखी ब्रेड का टुकड़ा उठाता है, तो उसे अपनी माँ की बहुत याद आती है। उसे याद आता है कि कैसे पंजाब के उस कच्चे चूल्हे पर माँ सुबह-सुबह उपले जलाकर उसके लिए गरमा-गरम परांठे और ताज़े सफेद मक्खन की डली तैयार रखती थी। उसे याद आता है कि कैसे माँ ज़बरदस्ती उसे एक और निवाला खिलाती थी और उसका माथा चूमती थी। आज यहाँ बैंक में डॉलर तो हज़ारों हैं, पर उस एक निवाले जैसा सुकून और माँ की वो ममता भरी झिड़कियां दुनिया के किसी भी आलीशान मॉल में नहीं बिकतीं। ​इधर पंजाब के सूने घर में, विक्रम अब उसी ज़मीन की मुंडेर पर चुपचाप सारा दिन बैठे रहते हैं, जो अब कानूनी तौर पर किसी और की हो चुकी थी। जिस ज़मीन पर कभी वो 'मालिक' बनकर सीना तानकर चलते थे, आज वहां से एक 'मज़दूर' की तरह नज़रें झुकाकर निकलना पड़ता है। रात के सन्नाटे में उन्हें आर्यन और रिया की हँसी की गूँज सुनाई देती है, जो अब सिर्फ यादों का हिस्सा है। उन्होंने अपना बुढ़ापा, अपनी इज्ज़त और अपनी पुरखों की आखिरी निशानी सिर्फ इसलिए बेच दी ताकि उनके बच्चे परदेस में 'बड़े' आदमी कहला सकें। पर क्या वो डॉलर उस बाप के अकेलेपन का इलाज कर पाएंगे? क्या वो कागज़ के टुकड़े उस ज़मीन का वजूद वापस दिला सकते हैं जिसे बेचकर विक्रम ने अपनी रूह ही नीलाम कर दी थी? ​रिया भी वहां के कांच वाले ऊंचे अपार्टमेंट की ठंडी खिड़की से गिरती बर्फ को देखती है और उसे अपने गाँव की वो गुनगुनी धूप और सरसों के खेतों की महक याद आती है। उसे याद आता है कि कैसे शाम को सब साथ बैठकर चाय पीते थे और दिन भर की थकान हंसी-मजाक में मिट जाती थी। आज यहाँ पैसा तो बहुत है, पर आर्यन और रिया के बीच वो पहले वाला प्यार कहीं गुम हो गया है। 'Double Shifts' की थकान और घर की किश्तों के भारी बोझ ने उनकी मीठी बातों में कड़वाहट भर दी है। आर्यन अब अक्सर थका-हारा और चिड़चिड़ा रहता है, और रिया उस सन्नाटे में खुद को अकेला पाती है। वफ़ादारी, जो कभी उनके रिश्ते की सबसे बड़ी पूंजी थी, अब परदेस की इस अंधी दौड़ में कहीं खो चुकी है। रात के अंधेरे में जब आर्यन अपनी फटी हुई जेब से वो डॉलर निकालता है, तो उसे महसूस होता है कि ये कागज़ के टुकड़े बहुत भारी हैं—इतने भारी कि इन्होंने उसके घर, उसके परिवार और उसकी वफ़ादारी का गला घोंट दिया है। उधर विक्रम जी की आँखों से गिरा एक गर्म आँसू उस मिट्टी में जज्ब हो जाता है, जो अब पराई हो चुकी थी। ​सुखविंदर की कलम से: ​"अजीब होड़ लगी है आज मेरे पंजाब के युवाओं में, अपनी माँ जैसी ज़मीन बेचकर वो परदेस की गुलामी करने जा रहे हैं। याद रखना, जिस डॉलर की चमक के पीछे तुम भाग रहे हो, उसके पीछे कई पिताओं की पगड़ी और कई माँओं की ममता कुर्बान हो चुकी है। आज के आर्यन और रिया ने सोचा था कि वो रईस बन गए, पर हकीकत में वो अपनी जड़ों से कटकर सबसे बड़े कंगाल साबित हुए। विक्रम जैसा बाप आज भी उस बिकी हुई ज़मीन की धूल माथे से लगाता है और सोचता है कि काश! मेरे बच्चे कम कमा लेते, पर मेरी नज़रों के सामने रहते। मेरा संदेश उन युवाओं के लिए है जो परदेस की चमक में अंधे होकर अपनों को पीछे छोड़ देते हैं—परदेस में पेट तो भर जाएगा, पर रूह हमेशा भूखी रहेगी। जिस रोटी में माँ का प्यार और मिट्टी की महक न हो, वो रोटी सिर्फ जिस्म पालती है, सुकून नहीं देती। तरक्की ज़रूर करो, पर अपने पुरखों की माटी और अपने बड़ों के बुढ़ापे को नीलाम करके नहीं। क्योंकि दुनिया का सारा खज़ाना मिलकर भी उस एक मुट्ठी ज़मीन का मोल नहीं चुका सकता जहाँ तुम्हारा बचपन बीता है।"


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