रजस्वला
रजस्वला
तुम जब त्योहार होता है ?तब तुम्हारा महीना आ,जाता है।साल भर का बडा तयोहार है और तुम बैठ गयी।कितना काम होता है?अभी माँ को पता चलेगा तो वो भी मुँह बना लेगी।"राहुल ने रीति को बोला।
"तुम तो ऐसे बात,कर,रहे हो,जैसे ये सब हमारे हाथ की बात है।पीरियड हमसे पूछकर नहीं आता,कि आज त्योहार है आऊं कि नहीं ,हद है । माँ जी का मुँह बनाना ,बनता है क्या? वो भी तो औरत है।अब यह रूल तो आप लोगो के हैं ना कि ये मत छुओ, जैसे छूआछूत की बिमारी है।अब घर के बाकी काम भी तो करती ही हूँ ना,ऐसा तो है नहीं अब 5 दिन आराम करूंगी ।वैसे भी मुझे इन दिनों बहुत इरीटेशन होती है, अब ज्यादा ना ही बोलो तो अच्छा है ।"रीति ने राहुल की बात पर अपनी प्रतिक्रिया दी।
"बहु ,अब आज पूजा की तैयारी होगी या नहीं ।सुबह सुबह क्या बहस कर रहे हो तयोहार के दिन ?"कहते हुए बीना जी रीति के कमरे की तरफ बढी।
"माँ जी आप उधर ही रहियेगा ।मैं आज पूजा पाठ के लायक नहीं हूँ ।अब पहले आप पूजा पाठ का का काम कर लिजिये ।मैने नहा लिया है मैं बाद में आती हूँ नाश्ता पानी बनाने किचन में ।तब तक आपको वहां से जो भी सामान चाहिए अलग निकाल लीजिये ।राहुल आपकी मदद् कर देंगे ।"रीति ने अपनी बात को मांजी के सामने रखा।
"बस ,अब हो गया समझो सारा काम।बहु अभी जब तीज थी तब भी तुम हो गयी थी,और आज भी।बताओ तीज तयौहार पर...क्या कहूँ?अब मुझसे भी इतना काम नहीं होता बताओ...कैसें करें?दीपावली पर तो वैसे ही इतना काम होता है।"कहते हुए बीना जी कुछ दूर पर सोफे के पास बैठ गयी ।
"अब ऐसी सिथति में कुछ तो उपाय भी होगा?मेरा भी आफिस का बहुत काम है।मैं भी कितना कर पाऊंगा।"राहुल ने भी जैसे अपने हाथ खड़े कर दिये ।
"अगर आप लोगों को ठीक लगे तो मैं एक बात कहूं, अगर देखा जाये ये एक प्राकृतिक चकृ है औरतों के लिए ।इसमें इस तरह छूआछूत कहाँ तक सही है?पहले की बात और थी बड़े परिवार होते थे ,तो काम निभ ही जाते थे और रजसवला हुईं स्त्री को आराम मिल जाता था ।लेकिन अब घरों में एक या दो स्त्री होती है तो बताओ क्या काम ऐसा है जो वो नहीं करती घर पर या कौन सी ऐसी चीज है जिसे वो बिना छुए काम कर लेगी ।तो मुझे लगता है इसे भी नार्मल तरीके से लेना चाहिए ।"रीति ने व्यवहारिकता से परिपूर्ण बात को तवजजो देते हुए कहा।
"लेकिन पूजा पाठ का परहेज होता ही है ना।क्या करें नियम है ।सारे तयोहार का मजा किरकिरा सा हो जाता है ये काम होते ही।"बीना जी उदासी भरे स्वर में बोली।
"माँ जी ,ये तो हर औरत की कहानी है ।आप भी इस दौर से गुजरी है आप के वक्त में परिवार संयुक्त और बड़े थे तो पता नहीं चलता था ।अब राहुल इकलौते नहीं होते और मेरी देवरानी होती तो शायद इतना नहीं सोचना पड्ता ।लेकिन मैं एक बात पूछती हूँ, आपको याद है हम।कामखया देवी के मंदिर गये थे ,और तब गये थे जब वो रजसवला हुईं थी ।उनका वो कपडा जो उन दिनों में बिछता है हम प्रसाद के रूप में लाये है,यहाँ तक की वो हमारे मन्दिर की दराज में रखा है।अगर यह इतना वीभत्स होता जैसा हम लोगों ने बना दिया है तो क्या वो देवी पूजी जाती वो भी इन दिनों में ।आप ही बताइए ।वास्तविकता यह है कि हम परंपराओं, नियम के बीच ऐसे फंसे है कि हम बिना तर्क के उनहे ढो रहे है सदियों से ।जबकि जानतें है कि वक्त के साथ साथ इनमें बदलाव आते है ,और आना भी चाहिए ।अब आप ही बताओं अभी भी तो सबके खाने का ,यहाँ तक जो भी सामान आपको चाहिए वो बताने के लिये भी मुझे आपके और राहुल के पास खड़ा रहना पडेगा ।अब ऐसे में तो यही है कि नियम माने और तयौहार छोड़ दे कयोंकि मेरे बैठने से तो घर के काम होंगे नहीं ।या फिर इसे एक नार्मल प्रोसीजर की तरह ले और वक्त की व्यवहारिकता को समझते हुए दीपावली पर तार्किक ज्ञान का दीया जलाये और तयोहार हंसी खुशी मनाये।"रीति ने एक तर्कसंगत बात को वक्त की व्यवहारिकता के साथ रखा।
माँ जी ,और राहुल आधा दिन रीति की बातों की व्यवहारिकता को टटोलते रहे,वाकई उन्हे हर बात के लिए रिति को आवाज लगानी पडती ।चाहते हुए भी रीति से अछूता रहना संभव ना था,मांजी की उम्र का तकाजा उन्हे नियमों से बांधकर चलने में असफल रहा ।आखिरकार शाम तक रीति को घर का काम नार्मल तरीके से अपने हाथ में लेना पडा ।हां मांजी बीच बीच में फिर वहीं पहुंच जाती इसे अलग रख दो या यहाँ पर पूजा के दिये रखे है इन्हे मत छूना लेकिन शाम तक वो भी धीमे धीमे खत्म सा हो गया।कयोंकि पुरे घर के लिए दियें तैयार करना भी कमर को बैठा रहा था ,जो फिर रीति को करना पड़ा ।लेकिन अब की दिवाली आगाज थी रजसवला को आज के जमाने में एक नार्मल कुदरती घटना को देखने की ओर ।
दोस्तो, एक औरत के नजरिए से ॠतु स्नान उसके जीवन का एक हिस्सा है जिसे हम उसके लिए एक ऐसी दुविधा बना देते हैं जो कई परिस्थितियों में बेमतलब की परेशानियो का तनाव लाता है ।अगर हम आदमीयो से उममीद करने से पहले इसे स्वयम के लिए व्यवहारिक और तार्किक कसौटी में अपने लिए सहज बना पाये तो शायद हम कई दुविधाओं से बच जाये ।तो एक औरत होने के नाते आगाज करे अपने शारीरिक बदलाव को सहजता से स्वीकार करके ,त्योहारों को सहजता से मनाने का।आपकी इस बारे में क्या राय है?अवश्य बताइयेगा ।
