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astha singhal

Inspirational

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रिश्ता तेरा मेरा

रिश्ता तेरा मेरा

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"कौन संभालेगा ऐसी औलाद को? इससे तो अच्छा तू बेऔलाद ही रहती।" अनामिका की सास ने अपना माथा पीटते हुए कहा। 


"ये मेरी बेटी है। चाहे जैसी भी है, इसे मैं पालूंगी।" अनामिका ने अपनी नन्ही सी जान को अपने सीने से लगाते हुए कहा। 


"अनामिका, तुम पागल हो गई हो क्या?ये लड़की अपाहिज है। दिमाग से बिल्कुल बेकार। इसे हम कैसे पालेंगे?" अनामिका के पति सौरभ ने कहा। 


"तुम इसके पिता होकर ऐसे बोल रहे हो? मुझे तुमसे ये उम्मीद नहीं थी।" अनामिका ने कहा।


अनामिका का ससुराल उसकी अपाहिज, दिमागी रुप से बिमार बच्चे को अपनाने के लिए तैयार नहीं था। अनामिका ने एक बहुत दृढ़ फैसला लिया। उसने सौरभ को और उसके घर को छोड़ दिया। और अपनी बच्ची को लेकर दूसरे शहर में चली गई।


उसके लिए आगे की ज़िंदगी बिल्कुल आसान नहीं थी। अपनी बच्ची गौरी को वह अकेले छोड़ नहीं सकती थी। इसलिए उसने घर बैठे काम करने का फैसला किया। शाम को उसने अपने घर पर बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। सुबह उसने टिफिन सिस्टम शुरू किया। जिसमें उसने आसपास के ऑफिस में अपने टिफिन भिजवाने शुरू किए। साथ ही साथ उसने ऑनलाइन कंटेंट राइटर का कार्य भी आरंभ किया। 


वह हर शनिवार और इतवार अपनी बेटी को शहर के जाने माने मनोचिकित्सक और फिजियोथैरेपिस्ट के पास लेकर जाती थी। अनामिका की मेहनत और ईश्वर के आशीर्वाद से गौरी ने सात साल की उम्र में धीरे - धीरे चलना आरम्भ कर दिया। वैसे उसका दिमाग उम्र के हिसाब से कम था पर अनामिका की मेहनत से वह अब अपने रोज़मर्रा के निजि काम स्वयं कर लेती थी। 


अनामिका का पूरा जीवन उसकी बेटी गौरी के इर्दगिर्द ही घूमता था। उसने गौरी को स्पेशल स्कूल में भी दाखिला दिलवाया। अनामिका गौरी के मेडिकल खर्च को पूरा करने के लिए दिन रात लगी रहती। उसका टिफिन बहुत प्रचलित हो गया था। देखते ही देखते उसने खाने - पीने को ही व्यवसायिक रुप देने का निर्णय किया। 


सरकार से लोन लेकर एक छोटा सा बुक कैफेटेरिया खोला। धीरे- धीरे व प्रचलित हो गया। इधर गौरी भी धीरे-धीरे बड़ी होने लगी। उसकी टांग में हर माह सुधार होने लगा। 


आज गौरी पच्चीस साल की हो गई है। एक मल्टीनेशनल कंपनी में कार्यरत है। आम इंसान की तरह जीवन जी रही है। पर….आज अनामिका उसके साथ होते हुए भी उसके साथ नहीं है। धीरे- धीरे वह अपनी याददाश्त खोती जा रही है। 


पर गौरी ने ठान लिया था कि वह अपनी मां को कुछ नहीं होने देगी। उसने दिन रात एक करके अपनी मां की देखभाल की। नियमित दवाइयों से, और‌ गौरी की प्यार भरी देखभाल से अनामिका धीरे-धीरे ठीक होने लगी। 


आज वह दोनों एक दूसरे के साथ, एकदूसरे की शक्ति बनकर रहती हैं। एकदूसरे के हर दुख तकलीफ़ में एकदूसरे का साथ देती हैं। अनामिका ने अपना पूरा जीवन गौरी को ठीक करने में निकाल दिया। और अब गौरी ने भी अनामिका की छाया बन उसके जीवन के अंतिम पड़ाव तक उसके साथ रहने की कसम खाई है। 


मां और बेटी का रिश्ता जीवन के हर रिश्ते से बड़ा होता है। क्योंकि इस रिश्ते में गिले शिकवे, मन मुटाव हो ही नहीं सकते। क्योंकि ये रिश्ता दिल से दिल का रिश्ता है।

 



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