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सतीश मापतपुरी

Drama


4  

सतीश मापतपुरी

Drama


रेड लाइट, भाग- 15

रेड लाइट, भाग- 15

4 mins 175 4 mins 175

(लखनऊ तक सड़क मार्ग से और फिर हवाई जहाज से निशा और पुष्कर  मुम्बई के लिए रवाना हुए , इस बीच पुष्कर और निशा के बीच कुछ संवेदनशील पहलुओं पर बात हुई। दोनों एक दूसरे से जुदा होने के ख़्याल से मर्माहत थे इसका अंदाज़ा उनके हाव भाव से सहज ही लग जा रहा था ….. अब आगे ) 

पुष्कर को लेकर निशा के दिल ने न जानें क्या - क्या हवाई महल बनाने में मशगूल हो चुका था कि मुम्बई पहुंचने की घोषणा होने लगी। निशा जैसे पहाड़ से नीचे आ गिरी। इतनी जल्दी हम मुम्बई पहुँच गये ? …. कुछ ही घण्टों में पुष्कर उसे छोड़कर वापस चला जाएगा ? पता नहीं क्यों … निशा को मुम्बई पहुँचना अच्छा नही लग रहा था … पुष्कर उसे छोड़कर चला जायेगा यह उसे अधीर किये जा रहा था , उसने कसकर पुष्कर का हाथ पकड़ लिया।

‘ पहली - पहली बार हवाई जहाज में सफर करने पर ऐसा भय लगता है , डरो नहीं।’ पुष्कर ने उसे ढाढ़स बंधाते हुए कहा। निशा कुछ बोली नहीं , सिर्फ एक अर्थपूर्ण नजरों से उसे देखा जिसकी ताब वह सह नहीं सका और मुँह दूसरी तरफ घुमा लिया। पुष्कर को पहली बार निशा की आँखों में एक झील सी गहराई दिखी , वह इस अर्थपूर्ण नज़रों का अर्थ ढूँढने का असफल प्रयास किया पर कुछ न समझ सका। नारी मन सदैव पुरुष के लिए एक अनसुलझी पहेली रही है। हवाई जहाज से पैसेंजर उतरने लगे थे। 

निशा के बड़े भाई अपनी लाड़ली बहन को लेने एयरपोर्ट आये थे। पुष्कर उन्हें देखते ही पहचान गया क्योंकि वह फोन पर उसे बता चुके थे कि वह एयरपोर्ट पर किस जगह खड़े रहेंगे। उन्हें देखते ही पुष्कर ने निशा को समझाया , तुम्हारे भईया सामने खड़े हैं। मैनें तुम्हें जो बताया उससे अधिक कुछ नहीं बताना कि इतने दिन तुम कहाँ थी। निशा से मिलकर उसके भाई की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था। वह बार - बार उसके सर पर हाथ फेर रहे थे , दोनों भाई बहन की आँखों से अविरल आँसू बह रहे थे। ये वो पल होता है जिसमें वाणी की कोई भागीदारी नहीं होती। बहन से मिलने की खुशी में विकास पुष्कर की मौजूदगी को प्रायः भूल ही चुका था , जब वह बहन को लेकर बाहर की तरफ बढ़ने लगा तो निशा के कदम स्वतः थम से गये और तब विकास को अपनी भूल का एहसास हो पाया , वह पुष्कर की तरफ मुड़ते हुए बोला - ‘ अरे साहब , आप रुक क्यों गये ? माफ कीजियेगा , बबली को एक जमाने के बाद देखकर मुझे कुछ होश ही नहीं रहा।

‘ मैं समझ सकता हूँ विकास बाबू , कोई बात नहीं।’ 

' आप दोनों यहीं खड़े रहिएगा, मैं पार्किंग से ड्राइवर को आने के लिए कहता हूँ।' पुष्कर से कहते हुए विकास पार्किंग की तरफ बढ़ गया। 

विकास के जाते ही पुष्कर निशा से बोला- ' तुम्हें तो अपने भाई को देखकर बहुत खुशी हुई होगी ? होगी भी क्यों नहीं, इसीके लिए तो तुम नवाबगढ़ आई थी।'

' मैं तो इसीके लिए आई थी पर आपको मेरा इस तरह जाना अगर अच्छा नहीं लग रहा था तो इतनी जल्दी भाई के पास पहुँचाने को किसने बोला था ? ट्रेन में दो दिन और साथ रहना पड़ेगा ये सोचकर आपने हवाई जहाज पर पैसा खर्च किया।'

'शायद हम दोनों अपनी जगह सही हैं, मैं इतना ही जानता हूँ।'

' आपने इसे भी पुलिस केस की तरह ही लिया है। नब्बे दिन से पहले ही पुलिस डायरी जमा कर दिया। इंस्पेक्टर साहेब कभी दिल के ऊपर लगे बैच को हटाकर दिल की आवाज भी सुनने की कोशिश कीजिए।हर बात …..।' अपने भईया को आते देख निशा चुप हो गई। विकास तबतक निशा और पुष्कर के पास आ चुका था , सामने गाड़ी भी आकर लग चुकी थी। यहाँ से निशा की ज़िन्दगी का एक नया अध्याय प्रारम्भ होने जा रहा था , क्या पता वक़्त और तकदीर की कलम निशा के लिए क्या कुछ लिखने वाली है।पुष्कर बेमन ही विकास से कहा - ' हमें तो आप यहीं से इजाजत दे देते तो मैं अपनी सुविधानुसार अपने लौटने का बंदोबस्त कर लेता।' 

' अरे साहब, ये क्या कह रहे हैं आप ? यहाँ से आपके जाने की व्यवस्था करना मेरा काम है। अभी घर चलकर आराम किजिए।'निशा ने अजीब नज़रों से पुष्कर को देखा।  पुष्कर को यह समझते देर न लगी कि उसका इस तरह जाने की बात कहना निशा को अच्छा नहीं लगा है। निशा बिना विकास के कुछ कहे ही दनदनाती हुई गाड़ी की पिछली सीट पर जाकर बैठ गई 

क्रमशः


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