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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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रामबोला से राममय

रामबोला से राममय

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आखिर इनसे भी अधिक कामयाब शिक्षक कौन हो सकता है ?? शिक्षण का तरीका भी सब का अलग-अलग होता है कोई डांट-डपट से, कोई समझा-बुझाकर, कोई व्यंग्य वाण से कुछ ऐसा कह जाये कि जीवन की दशा, दिशा का मार्ग एक पल में कहां से क्या हो जाये ?? 


मैं एक ऐसे दिशा विहीन पति की कहानी कह रही हूं जिसके घर में भी कोई शिक्षक नहीं था ऐसे भी भाग्य की गति या "गहनों कर्मणा गतिः" किसे कहें?? 12 माह तक गर्भ में रहने के बाद बालक का जन्म हुआ जन्म के दूसरे दिन ही मां का स्वर्गवास हो गया। पैदाइशी 32 दांत होना, रोने की जगह मुंह से राम का नाम निकलना कितने कुतर्क ?? क्या कहें भाग्य या दुर्भाग्य?? नाम ही रामबोला हो गया।


बालक के 8-9 वर्ष का होते- होते पिता भी राम को प्यारे हो गये। चुनिया नाम की दासी, पति का विरोध करने पर भी अपने घर ले जाकर के पालन पोषण करने लगी। घर तो लेकर आई पर 15 वर्ष का होते -होते दासी भी परलोक- गामिनी हो गई।

दासी के पति ने मनहूस कह बच्चे को घर से निकाल दिया अब आप सभी समझ ही गए होंगे किसका कथाक्रम चल रहा है। जमींदार का पुत्र, पारिवारिक जनों ने संपत्ति हड़प ली बालक इधर-उधर भटकने लगा, दाने-दाने को मोहताज। गलत संगत भी हो गई।

दासी के पति के घर से निकाले जाने पर भटकते- भटकते पास के गांव में एक मंदिर में पहुंच गया वहां गुरु नरहरि दास जी की कथा चल रही थी उसे वहाँ वह मिले। वह बालक की विद्वता देख उसको अपने साथ अयोध्या ले गए वहां विद्या अध्ययन करा योग्य बनाया।


उसका नाम तुलसीदास रख दिया। तुलसीदास जी भगवत कथा वाचन कर के अपना समय व जीवन दोनों निर्वाह करने लगे। इनकी विद्वता से प्रभावित हो कर, यमुना नदी के उस पार महेवाघाट के भारद्वाज गोत्र के दीनबंधु पाठक ( दयावती माँ ) ने अपनी पुत्री रत्नावली का विवाह तुलसीदास जी से कर दिया।


रत्नावली बहुत ही सुंदर, आकर्षक व विदुषी स्वभाव की महिला थीं। तुलसीदास जी उन पर अत्याधिक आसक्त थे। तुलसीदास जी को बचपन से ही किसी का प्रेम नहीं मिल पाया था रत्नावली से प्रेम क्या मिला आसक्ति में ही बदल गया। प्रेम तो रत्नावली भी करती थी पर उनका प्रेम सात्विक था।   


तुलसीदास जी की पत्नी भक्ति निष्ठा दिव्यता का उल्लंघन कर वासना और आसक्ति की ओर उन्मुख हो चुकी थी। एक बार तुलसीदास जी की पत्नी मायके गई हुई थी अब तुलसीदास जी को उनके बिना कुछ भी अच्छा न लगता रात की नींद और दिन का चैन गायब था।


उन्हें कामज्वर परेशान करने लगा इतने कामासक्त हो गये कि पत्नी के मायके जाते दूसरे दिन ही मूसलाधार, घनघोर बारिश की काली अंधेरी रात में, तुलसीदास जी रत्ना के प्रेम में ऐसे विह्वल हुए कि कुछ सोचने -समझने की शक्ति ही न रही।  

रास्ते में उफनती अथाह, अगम यमुना की जल राशि फिर भी उन्हें नदी तो पार करनी ही थी। कहीं दूर-दूर तक कोई नाव नहीं थी, एक मुर्दा बह रहा था उन्हें कामांधता में मुर्दा लकड़ी का पटरा समझ आया बस क्या था उसी के सहारे नदी पार कर उस पार, कीचड़ में पैर रखते रखाते ससुराल पहुंच गए। अब दरवाजा कैसे खटखटायें, पड़ोसी न पूंछ-तांछ करने आ जायें। घर के परिवारी जन कहीं जाग जायें तो भगा ही ना दें।  


रत्नावली के रहने का स्थान ऊपर के कोठार में था उन्होंने देखा रत्नावली के द्वार पर एक मोटा सा रस्सा पड़ा हुआ है मन में बहुत प्रसन्न हुए कि दोनों तरफ आग बराबर लगी है। चढ़ने को रस्सी डालकर रखी है। हाथ से रस्सा पकड़ तेजी से ऊपर चढ़ गये।


तुलसीदास जी के पहुंचने की आहट से रत्नावली जाग गई बोली, "स्वामी आप यहां और आये कैसे इतनी उफनती यमुना कैसे पार की और फिर मेरे कोठार तक कैसे चढ़कर आए ??? तुमने ही तो बाहर मोटा रस्सा डाल रखा है उसी से चढ़कर आ गया इसमे आश्चर्य चकित होने की क्या बात है।

अब रत्नावली के चौंकने की बारी थी, उसने बाहर झांक कर देखा बाहर एक मोटा ताजा सांप नीचे को पूंछ किये लटक रहा था।  

पहले ही बताया है रत्नावली बहुत ही विदुषी महिला थी उनका उच्च कोटि का प्रेम था, अपने पति के कामांध प्रेम से वह बहुत लज्जित हुयी। बहुत गुस्से में उनसे बोली,

" लाज न आई आपको, दौरे आयहु नाथ धिक- धिक ऐसे प्रेम को, कहा-कहौं मैं नाथ।

अस्थि चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति तैसी जो श्री राम महं, तौ होति न भवभीति"। 


इतनी रात में चुपचाप मेरे मायके आने में आपको लाज नहीं आई। हड्डी चमड़ी की इस देह की बजाय राम जी से इतनी प्रीति करते तो आप भवसागर से पार उतर जाते।


रत्नावली के इन शब्दभेदी वाणों ने तुलसीदास के जीवन की दशा और दिशा दोनों बदल डाली। राम भक्ति में ऐसे डूबे की अनन्य भक्त हो गए पत्नी के एक ताने ने साधारण राम बोले को महान संत बनने का मार्ग प्रशस्त कर दिया।  


तुलसीदास जी के जीवन में अभूतपूर्व परिवर्तन हुआ उन्होंने पत्नी को उसी क्षण त्याग दिया मतलब कामासक्ति पर नियंत्रण कर लिया। लोहा गरम था व्यंग्य की चोट मर्म को भेद आत्मा तक पहुंची, राम की भक्ति में लीन हो गए उसी राम के अगाध प्रेम में उन्होंने रामचरितमानस की रचना की रामचरितमानस ने उन्हें विश्व में प्रसिद्ध कर संत तुलसीदास बना दिया।

रामबोला को तुलसीदास बनाने का श्रेय उनकी पत्नी विदुषी रत्नावली को ही दिया जाता है।


ऐसी रत्नावली कहाँ से आवें जो तुलसी का निर्माण करें।

    


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