Padma Agrawal

Drama


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Padma Agrawal

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राजकुमार लाओगी न

राजकुमार लाओगी न

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“चेष्टा, पापा के लिये चाय बना देना। हो सके,तो सैण्डविच भी बना देना।  मैं जा रही हूं, मुझे योगा के लिये देर हो रही है। “कहती हुई योगिता जी स्कूटी स्टार्ट कर चली गईं। उन्होंनॆ पीछे मुड़ कर भी नहीं देखा, न उन्होंने चेष्टा के उत्तर की प्रतीक्षा की।

योगिता जी मध्यमवर्गीय सांवले रंग की महिला हैं, पति योगेश बैंक में क्लर्क हैं। अच्छी खासी तनख्वाह है। उनका एक बेटा है, उसका नाम युग है। घर में किसी चीज की कमी नहीं है।

 जैसा कि सामान्य परिवारों में होता है, घर पर योगिता जी का राज था। पति य़ोगेश उनके इशारों पर नाचते थे। बेटा युग भी। बैंक की परीक्षा पास करके अधिकारी बन गया था। बेटी चेष्टा प्राइवेट स्कूल में अध्यापिका बन गई थी

 कालेज के दिनों में ही युग की दोस्ती अपने साथ पढने वाली उत्तरा से हो गई। उत्तरा साधारण परिवार परिवार से थी। उसके पिता बैंक में चपरासी थे। इसलिये जीवन स्तर सामान्य था। उत्तरा की मौं छोटेछोटे बच्चों को ट्यूशन पढाने के साथ साथ सिलाई का काम करके कुछ पैसे कमा लेती थी।

उत्तरा के माता पिता ईमानदार और चरित्रवान थे, इसलिये वह भी गुणवती थी। वह पढने में काफी तेज थी। उसका व्यक्तित्व आकर्षक था। लंबी, दुबली पतली, सांवली उत्तरा सदा हंसती मुसकुराती रहती थी। उसके कंठ में सरस्वती जी का वास था। वह सुमधुर स्वर लहरी में गीत गाती तो लोग उसमें खो जाते। कॉलेज के सभी कार्यक्रम में उद्घोषणा का कार्य वही करती थी। उसकी बड़ीबड़ी कजरारी आंखों में गजब का आकर्षण था।उसकी हंसी में युग ऐसा बंधा कि अपनी मां के तमाम विरोध के सामने भी उसके कदम नहीं डगमगाये और वह उत्तरा के प्यार में मां बाप को भी छोड़ने को तैयार हो गया।

योगिता जी को मजबूरी में अपनी नाक बचाने के लिये युग को शादी की इजाजत देनी पड़ी। कोर्ट मैरिज कर चुके युग और उत्तरा के विवाह को समाज की मंजूरी दिलाने के लिये उन्होंने एक त्रव्य पार्टी का आयोजन किया। समाज को दिखाने के लिये, बेटे की जिद् के आगे योगिता जी झुक तो गईं लेकिन दिल में एक बड़ी सी गांठ थी कि उत्तरा चपरासी की बेटी है।

दहेज में मिलने वाली नोटों की भारी गड्डियां और दहेज में ट्रक भर सामान आने का अरमान मन के अंदर कांटे की तरह चुभता था। अपनी कुंठा के कारण वह उत्तरा को तरह तरह से सतातीं। उसके मातापिता के बारे में उल्टा सीधा बोलतीं रहतीं। उसके हर काम में मीनमेख निकालना उनका नित्य का काम है।

 उत्तरा भी बैंक में नौकरी करती थी ... सुबह पहले पापा की चाय ब्रेड, फिर दोबारा मम्मी जी की चाय,फिर युग और चेष्टा को नाश्ता देने के बाद वह सबका लंच बनाकर अलग अलग पैक करती। मम्मी पापा का खाना डायनिंग टेबिल पर रखने के बाद ही वह घर से निकलती थी। इस बगदौड़में उसे अपने मुंह में अन्न का दाना डालने का भी समय नहीं मिलता था।

 यद्यपि युग अक्सर उससे कहता कि क्यों तुम इतना काम करती हो, लेकिन वह हमेशा हंस कर कहती,’’यहां पर काम ही कितना है। मुझे तो हमेशा से काम करने की आदत है। काम करने से मैं फिट रहती हूं।‘’

योगिता जी के अलावा सभी लोग उत्तरा से बहुत खुश थे। योगेश जी तो उसकी तारीफ करते नहीं अघाते थे। सभी से कहते रहते, ‘’बहू हो तो उत्तरा जैसी ....मेरे बेटे ने बहुत अच्छी लड़की चुनी है। हमारे तो भाग्य ही जग गये,जो उत्तरा जैसी लड़की हमारे घर में आई है। “

चेष्टा भी अपनी भाभी के साथ घुल मिल गई थी वह और उत्तरा अक्सर आपस में खुसुर फुसुर करती रहतीं थीं। दोनों छुट्टी वाले दिन एक दूसरे के साथ घंटों बातें करती रहतीं। सुबह भाभी को अकेले काम करते देख कर वह भी उनकी मदद करने पहुंच जाती। उत्तरा को बहुत अच्छा लगता। नंद भाभी मिलकर सब काम जल्दी से निबटा लेतीं। उत्तरा बैंक चली जाती और चेष्टा स्कूल ....

 योगिता जी कबेटी को बहू के हंस हंस कर काम करते देखतीं तो कुढ कर रह जातीं .... फौरन चेष्टा को आवाज देकर अपने पास बुला लेतीं। यही नहीं बेटी को तरह तरह से उत्तरा की झूठ मूठ बातें कह कर भड़कातीं और उसे उल्टी सीधी पट्टी पढातीं।

उत्तरा की दृष्टि से कुछ छिपा नहीं था लेकिन वह सोचती कि कुछ दिनोंसके बाद सब नॉर्मल हो जायेगा।

कभी तो मम्मीजी के मन में उसके प्रति प्यार का पौधा पनपेगा। वह यथासंभव अच्छी तरह से काम करने की कोशिश करती रहती। लेकिन योगिता जी को खुश करना बहुत कठिन था। रोज किसी न किसी बात पर नाराज होना आवश्यक था। कभी सब्जी में मसाला तेज तो,कभी रोटी कड़ी, कभी दाल में नमक ज्यादा तो कभी चाय ठंडी है, दूसरी ला आदि....

 युग इन बातों से अनजान नहीं था वह मां के हर अत्याचार को नित्य देखता रहता था पर उत्तरा की जिद् थी कि मैं मम्मी जी का प्यार पाने में एक दिन अवश्य सफल हो जाऊंगीं। और वह उसे अवश्य अपना लेंगीं।

 योगिता जी को घर के कामों से कोई मतलब नहीं रह गया था। क्योंकि उत्तरा ने घर के पूरे काम को पूरी तरह से संभाल लिया था।।इसलिये वह कई सभा संगठनों से जुड कर समाज सेवा के नाम पर यहां वहां घूमतीं रहतीं थीं।

योगिता जी चेष्टा की शादी के लिये परेशान रहतीं थीं, लेकिन उनके ख्वाब बहुत ऊंचे थे। कोई भी लड़का उन्हें अपने स्तर का नहीं लगता था। उन्होंने कई जगह बेटी की शादी के लिये प्रयास किये लेकिन कहीं चेष्टा का सांवला रंग, कहीं दहेज का मामला .....बात नहीं बन पाती थी।

योगिता जी के ऊंचे ऊंचे सपने चेष्टा की शादी में आड़े आ रहे थे। धीरे धीरे चेष्टा के मन में कुंठा जन्म लेने लगी। उत्तरा और युग को साथ में देख कर उसे ईर्ष्या होने लगी थी। चेष्टा अक्सर झुंझला उठती ...उसके मन में भी अपनी शादी की इच्छा होती थी।चेष्टा को तैयार होकर घर से निकलते देख कर योगिता जी की आंखें टेढी होने लगतीं .....कहतीं, ‘’शादी के बाद सजना धजना .....कुंआरी लड़कियों का सजना संवरना ठीक बात नहीं .....’’

चेष्टा मां की बात सुनकर उबल पड़ती,लेकिन उनके गुस्से के डर से कुछ बोल न पाती। वह मां के कड़े अनुशासन की बेड़ियों में जकड़ी रहती। योगिता जी उसके पल पल का हिसाब रखतीं। वह उससे पूछतीं, कि स्कूल से आने में देर क्यों हुई ?….कहां गईं थीं ....और किससे मिलने गई थीं ....

योगिता जी के मन में हर क्षण संशय। का कांटा चुभता रहता था। उस कुंठा के कारण वह उत्तरा को अंटशंट बकने लग जातीं थीं। उनकी चीख चिल्लाहट से पूरा घर गूंज उठता। वह हर समय उत्तरा पर यही लांछन लगातीं कि यदि तू अपने साथ ढेर सारा दहेज लेकर आती तो वही दहेज देकर वह अपनी बेटी के लिये अच्छा सा घर वर ढूंढ सकतीं थीं।

दरअसल योगिता जी के दो चेहरे थे ....घर में उनका व्यक्तित्व बिल्कुल अलग था लॆकिन समाज में वह अत्यंत मृदुभाषी थीं। सबके सुखदुःख में शामिल होतीं थीं। यदि कोई उनकी बेटी या बहू के बारे में बात करता तो वह अच्छा बुरा कुछ न कहतीं और चुप रह जातीं। इसलिये उनकी पारिवारिक स्थिति के बारे में ज्यादा कुछ कोई नहीं जानता था। उनके बारे मेंसमाज में लोगों की अलग अलग धारणा थी...कोई उन्हें सहृदय महिला तो कोई पूरी घाघ कहता।

एक दिन योगिता जी अपने चिरपरिचित अंदाज में उत्तरा पर अपने मन की भड़ांस निकाल रही थीं। उसे चपरासी की बेटी कह कर अपमानित कर रहीं थीं, तभी युग बाहर से आ गया और क्रोधित होकर बोला, ‘’उत्तरा उठो, मैं अब यहां एक पल भी नहीं रह सकता। “

घर में कोहराम मच गया। चेष्टा रो रोकर बेहाल हो रही थी, योगेश जी बेटे युग को समझाने का भरपूर प्रयास कर रहे थे। परंतु युग रोज रोज की किच किच से तंग आ चुका था। उसने किसी की कुछ नहीं सुनी, दो चार कपड़े बैग में डाले और उत्तरा का हाथ पकड़ कर घर से निकल गया।

योगिता जी के तो हाथ के तोते उड़ गये। वह स्तब्ध रह गईं .... कुछ कहने सुनने को बचा ही नहीं था। उनका लाडला युग उत्तरा को लेकर जा चुका था। योगेश जी पत्नी की तरफ देख कर बोले,’’अच्छा हुआ, उन्हें इस नर्क से छुटकारा तो मिला।‘’

योगिता जी एकदम आपे से बाहर होकर अनर्गल प्रलाप करने लगीं। सब रोते धोते भूखे पेट सो गये।

सुबह हुई तो योगेश जी ने अपने हाथों चाय बनाई ...बेटी और पत्नी को देने के बाद घर से निकल गये। चेष्टा ने जैसे तैसे अपना लंचबॉक्स पैक किया और दौड़ते भागते स्कूल पहुंची।

घर में सन्नाटा पसरा रहता, सब एक दूसरे से मुंह चुराते। चेष्टा सुबह शाम रसोई में लगी रहती, घर के कामों का मोर्चा उसने संभाल लिया था। इसलिये योगिता जी की दिनचर्या में कोई कास असर नहीं पड़ा था। वे वैसे भी अपने सामाजिक कार्यों में व्यस्त रहतीं थीं, घर की परवाह ही उन्हें कब थी ....

योगेश जी से जब भी योगिता जी से बातचीतहोती तो चेष्टा की शादी को लेकर आपस में बहस हो जाती। उनका सोचना था कि मेरी एक ही बेटी है तो दामाद इंजीनियर, डॉक्टर या सी . ए . हो ....उसका बड़ा सा घर हो ....लड़का राजकुमार की तरह सुंदर हो....परिवार छोटा हो ...आदि आदि पर ये तमाम शर्तें पूरी होना असंभव नहीं तो मुश्किल अवश्य था।

चेष्टा की उम्र 32 हो चुकी थी, शादी की राह देखते देखते उसका सांवला रंग काला पड़ता जा रहा था। कुंठा और तनाव के कारण चेहरे और स्वभाव में रूखापन झलकने लगा था। चिड़चिड़ेपन के कारण उम्र भी ज्यादा दिखने लगी थी।

उत्तरा के जाने के बाद चेष्टा गुमसुम हो गई थी। घर में उससे बात करने वाला कोई नहीं था। कभी कभी टी.वी. देखती लेकिन मन ही मन मां के प्रति क्रोध की आग में झुलसती रहती । तभी उसक3 मुलाकात चैतन्य से हुई, उसकी दुकान स्कूल के पास में थी, वह किताब कॉपी और स्टेशनरी रखता था। स्कूल आते जाते चेष्टा की आंखें चार होतीं ....उसके कदम अनायास ही वहां आते ही थम जाते ... वह कभी बेमतलब पेन खरीदने पहुंच जाती तो कभी मोबाइल रिचार्ज करवाने के लिये खड़ी हो जाती थी।

उसकी और चैतन्य के बीच दोस्ती बढने लगी। आंखों ही आंखों में प्यार पनपने लगा। वह मन ही मन चैतन्य के लिये सपने बुनने लगी थी। दोनों चुपके चुपके मिलने लगे। कभी कभी एक साथ शाम भी गुजारते... वह चैतन्य के प्यार में खो गई ....उसके चेहरे पर रौनक लौट आई थी।

 यद्यपि चैतन्य भी उसे प्यार करता था लेकिन अपनी आर्थिक स्थिति को जानते हुये उसमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि वह अपने प्यार का इजहार कर सके।

चेष्टा अपनी मां से कुछ बताती, इसके पहले ही योगिता जी को चेष्टा और चैतन्य के बीच प्यार होने का समाचार नमक मिर्च के साथ मिल गया। योगिता जी तिलमिला उठीं थीं। अपनी बहू उत्तरा के कारण वैसे ही उनकी बगुत हेठी हो चुकी थी .... अब बेटी भी एक छोटे दुकानदार के साथ प्यार की पेंग बढा रही है। यह सुनते ही वह अपना आपा खो बैठी और बेटी पर लात घूंसों की बौछार कर दी।

क्रोध से तड़प कर चेष्टा बोली,’’आप कुछ भी करो ...मैं तो चैतन्य से मिलूंगी और जो मेरा मन होगा वही करूंगीं।‘’

योगिता जी बहुत तेज महिला थीं ...बात बिगड़ते देख कूटनीति से काम लिया। वह उसपर प्यार बरसाती हुई बोलीं,’’ मैं तो तेरे लिये राजकुमार ढूंढ रही थी। ठीक है, वह तुम्हें पसंद है तो मैं उससे मिलूंगीं।‘’

 चेष्टा मां के बदले रुख से पहले तो हैरान हुई फिर मन ही मन अपनी जीत पर खुश हो गई। चेष्टा योगिता जी के छल को नहीं समझ पाई।

अगले दिन योगिता चैतन्य के पास गई और उसको धमकी दी,’’ यदि तुमने मेरी बेटी चेष्टा की ओर देखा तो तुम्हारी व तुम्हारे परिवार की जो दशा होगी, उसके बारे में तुम कभी सोच भी नहीं सकती।‘’

इस धमकी से सीधा सादा चैतन्य डर गया। उस दिन के बाद से वह चेष्टा से नजरें चुराने लगा। चेष्टा के बार बार पूछने पर भी उसने कुछ नहीं बताया वरन् यह बोला कि तुम्हारी जैसी लड़कियों का क्या ठिकाना, आज मुझमें रुचि है और कल किसी और में होगी। चेष्टा समझ नहीं पाई कि आखिर चैतन्य को क्या हो गया, वह क्यों बदल गया है ......चैतन्य ने तो सीधा उसके चरित्र पर ही लांछन लगाया है।वह टूट गई....वह रोती रही ... अकेलेपन के कारणवह विक्षिप्त सी रहने लगी। इस मानसिक आघात से वह उबर नहीं पा रही थी। दिन भर वह मन ही मन अकेले प्रलाप करती रहती थी।चैतन्य से उसका सामना न हो इसलिये उसने स्कूल जाना भी बंद कर दिया।

योगिता जी बेटी की दशा देखकर चिंतित हुईं। वह उसको तरह तरह से समझाकर कहतीं कि मेरी बेटी मैं तुम्हारे लिये राजकुमार ढूढ कर लाऊंगीं। जब उसकी हालत नहीं सुधरी तो वह उसे डॉक्टर के पास लेकर गईं। डॉक्टर बोला, ‘’आपकी लड़की डिप्रेशन की मरीज है’’l उन्होंने कुछ दवाईयां दी और कहा कि आप अपनी बेटी का खास ध्यान रखें, इसे अकेले बिल्कुल न छोड़िये ... हो सके तो इसका विवाह कर दीजिये।

थोड़े दिनों तक तो योगिता जी बेटी के खाने पीने का ध्यान रखती रहीं। फिर जैसे ही चेष्टा थोड़ी ठीक हुई, योगिता जी अपनी दुनिया में मस्त हो गईं .। जीवन से निराश चेष्टा अकेले बैठी बैठी मन ही मन घुटती रहती।

उसके मन में यह बात घर कर गई कि उसका जीवन बरबाद करने वाली उसकी मां ही है। उसका डिप्रेशन इतना बढ गया कि उसने अपने कमरे का सारा सामान तोड़फोड़ डाला। जब योगिता जी लौट कर आईं तो कमरे की दशा देख कर अपना होश खो बैठीं और आव दे खा न ताव, चेष्टा को पकड़कर थप्पड़ जड़ती हुई बोलीं,’’ क्या हुआ चैतन्य ने मना कर दिया है तो क्या हुआ ....मैं तुम्हारे लिये राजकुमार जैसा वर लाऊंगीं।‘’

यह सुनते ही चेष्टा समझ गई कि यह सब इन्हीं का किया धरा है ....कुंठा, तनाव, क्रोध, डिप्रेशन की पराकाष्ठा , प्रतिशोध की आग में जलती हुई चेष्टा में जाने कहां की ताकत आ गई। योगिता जी कुछ समझ पातीं, उन्हें तो ऐसा कुछ अनुमान ही नहीं था कि उनकी अपनी बेटी उनके साथ ऐसा भी कर सकती है ...चेष्टा ने उनकी गर्दन पकड़ ली और उसे दबाती हुई बोली .....अच्छा ...आपने ही चैतन्य को मेरे खिलाफ भड़काया है .....

उसे खुद नहीं पता था कि वह क्या कर रही है।क्योंकि वह इस समय होश में नहीं थी .... उसके क्रोध ने अनहोनी कर दी। योगिता जी की आंखें आकाश में टंग गईं। चेष्टा विक्षिप्त होकर चिल्लाती जा रही थी,’’मेरे लिये राजकुमार लाओगी न’’

योगेश जी कमरे का दृश्य देख फूट फूट कर रो पड़े।


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