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Dr. Madhukar Rao Larokar

Drama Romance

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Dr. Madhukar Rao Larokar

Drama Romance

प्यार तो प्यार है

प्यार तो प्यार है

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वे बचपन के साथी थे। साथ खेले, साथ बड़े हुए। साथ ही पढ़े भी। एक दूसरे को समझने-समझाने में, उसे निभाने में, उनका कोई सानी नहीं था।पड़ोसी होने के कारण, वै एक -दूसरे के घर पर, आसानी से आना- जाना करते थे।

मुरली अपने अतीत में खो गया। अनायास ही मुस्कुरा देता था,कभी रोता था, कभी हँस देता था। उन क्षणों को याद कर, जो उसने मधु के साथ व्यतीत किए थे, प्यार में।

एकाएक उसकी तन्द्रा टूटी। जब उसे एहसास हुआ कि उसके कानों में, जैसे किसी ने पिघला हुआ सीसा, उड़ेल दिया हो। सुनाई दिया "पापाजी कब से आपको पुकार रही हूँ। आप हैं कि सुन नहीं रहे हैं। मुझे देर हो रही है। मुझे स्कूल छोड़ दीजिए। आज मेरी एग्जाम है।

मुरली एकाएक उठा और कहने लगा "सारी बेटा,हमें याद नहीं रहा।जल्दी चलो।" पांच वर्ष की मासूम गुडिया जैसी,अपनी बेटी को मुरली ने ,स्कूल छोड़ने कार निकाली।

उसने अपने अतीत को याद, करना बंद कर दिया था। उसका सिर ,खूब भारी सा,महसूस होने लगा,मानो कि उसके सिर में, किसी ने वजनी पत्थर बांध दिया हो।

आफिस से भी मुरली ,घर जल्दी चला आया था। उसका माथा फटने को ,हो रहा था।रहा नहीं गया तो ,उसने अपनी पत्नी को आवाज दिया " संगीता यहां आओ।" कुछ समय ही बाद संगीता के आने पर उससे कहा " संगीता मेरा सिर, बहुत दर्द कर रहा है, अमृतांजन लगा दो।"

सिर की मालिश होने के बाद भी,उसे राहत नहीं मिली और अतीत में फिर से विचरण करने लगा।

वह मधु के साथ, गार्डन में घूम रहा था।बहुत से लोग थे और सभी मुरली और मधु को साथ देख ,उनकी अच्छी जोड़ी को,सभी उन्हें कौतूहलवश देख रहे थे। कुछ मुस्कुराकर ,कुछ हॅसकर उनकी जोड़ी की सराहना कर रहे थे।

इन सभी से दूर वे,एक दूसरे के हाथों में हाथ रखकर ,धीरे - धीरे चल रहे थे। एक- दूसरे को देखते हुए। ना कोई वार्ता ,ना ही जुबान का कोई काम।बस एक- दूजे आखों के माध्यम से, बतियाने लगे।हर लम्हा जैसे उनके प्यार में, डूबकर शोख हो गया हो।

मुरली और मधु तब कालेज में पढ़ाई कर रहे थे। कालेज में उनके प्यार को उनके मित्र " आधुनिक हीर रांझा " के प्यार की संज्ञा देते थे।ना कोई जलन, ना ही किसी तरह का ,उनके प्रति कोई षड्यंत्र। बस सभी ने ,हृदय से उनके प्यार को, स्वीकार कर लिया था।

कहते हैं ना कि सच्चे व्यक्ति को ,सच्चे लोग जीवन में मिल ही जाते हैं। मुरली अपनी बाईक से मधु को कालेज ले जाता और साथ ही वापस ले आता था।क्योंकि वे पड़ोस में ही रहते थे और एक ही कक्षा में, पढ़ते भी थे।

एक दिन कालेज से वापसी में, मुरली मधु को बगीचे में ले आया।उसने दिल में छिपे हुए, प्यार के एहसास को,जुंबा पर ले ही आया और कहा " मधु आज मैं, अपने दिल की बात, तुम्हें कहना चाहता हूँ। आज्ञा हो तो कहूँ। "

मधु समझ तो गयी थी, किन्तु अनजान सी बनी रही और बोली " हाँ मुरली बोलो ,क्या कहना चाहते हो। मुझसे कहने के लिए तुम्हें आज्ञा ,लेने की जरूरत, कब से पड़ने लगी है। "

मुरली ने अपने दिल की बात, मधु से कही " मैं तुमसे बेइंतिहा प्यार करता हूँ और तुमसे शादी करना चाहता हूँ। तुम्हारे साथ हर पल साथ रहना चाहता हूँ। तुम्हें मंजूर हो तो कहो ।मुझे कोई जल्दी नहीं है। आराम से मुझे सोच- समझकर बताओ।अगर तुम किसी और के साथ, प्यार करती हो या किसी और से शादी करना चाहती हो तो भी ,मुझे स्पष्ट रूप से बता देना।"

बात आयी- गयी हो गयी।घटना को छह माह बीत गये। मधु ने मुरली को कोई, जवाब नहीं दिया था।मुरली ने भी दूसरी बार,मधु से कहा भी नहीं, ना ही जवाब मांगा।

वो दिन भी आया जब उनके, फाइनल ईयर का परीक्षा परिणाम आया।मधु और मुरली दोनों ही, प्रथम श्रेणी से स्नातक हो चुके थे। खुशी का इजहार करने वे,कालेज के ही गार्डन में, पेड़के नीचे बैठ गये थे। मुरली मधु के समीप ही बैठकर,उसे निरंतर निहार रहा था।फिर एकाएक, मधु ने उससे कहा " अब क्या ?"

मुरली ने जवाब दिया " अब क्या से क्या मतलब?" मधु " मैं यह कह रही हूँ कि, आगे क्या करना है। "

वक्त का तकाजा समझकर मुरली ने कहा" याद है मधु,तुम्हें मैंने कुछ कहा था और तुमने मुझे अभी तक जवाब नहीं दिया है। " मधु ने कहा " कौन सी बात " मुरली " तुम्ही सोचो,कौन सी बात।"

" हाँ, याद आया,मुझसे तुमने कुछ मांगा था।"

मुरली " अच्छा क्या मांगा था, कहो तो?" मधु" मेरे भोले बालमा ,मेरा प्यार और क्या?" मुरली " तो अब कहो।" मधु सोचती रह गयी,कैसे कह दूँ, क्या कहूँ, हां ऐसा कहना ठीक रहेगा। फिर बोली " मुरली ,मैं भी तुमसे बेहद प्यार करती हूँ। " मुरली " फिर आगे क्या?" मधु " आगे क्या, क्या तुम मुझसे ,विवाह नहीं करना चाहते?"

मुरली " देखो मधु,यह ठीक है कि मैं तुमसे प्यार करता हूँ और तुम्हें अपनी पत्नी बनाना चाहता हूँ। पर मेरे पास ,तुम्हारी इच्छाओं को पूरा करने, तुम्हें खुशियाँ देने के लिए, कुछ भी तो नहीं है। "

मधु " तो क्या हुआ, वह सभी एक दिन तो आ ही जायेगा।हम दोनों ही नौकरी के लिए कोशिश करेंगे और उसके बाद विवाह कर लेंगे। परंतु पहले तुम पिताजी से मिलो,मेरा हाथ मांगों, शादी की बात करो।"

मुरली " तुम्हारी हर बात ठीक है, परंतु क्या तुम्हारे पिताजी हमारे, विवाह के लिए, राजी हो जायेंगे?क्योंकि मुझसे ज्यादा तो ,तुम्हारे पिताजी तुम्हें जानते और समझते हैं। उनकी सोच कैसी रहेगी।"

मधु " देखो मेरे पिताजी सीधे- साधे व्यक्ति हैं। मैं उनकी एक ही बेटी हूँ। वे मुझे बहुत चाहते हैं। मैं कल उनसे बात करूंगी और तुम्हें फोन पर बताऊंगी,वैसे ही तुम अपनी मां को लेकर हमारे घर पर आना।"

दिन बीतते गए और मधु का फोन, नहीं आया।पता करने वह मधु के घर भी गया।मालूम हुआ कि मधु का परिवार, कहीं चला गया है।

और चलचित्र की तरह मध्यान्तर का ब्रेक आ गया। मुरली को उसके बास ने आवाज दी, चपरासी के माध्यम से। बाॅस के कक्ष में प्रवेश करते ही,बाॅस ने उसे सामने कुर्सी पर बैठने का इशारा किया।

फोन से फ्री होकर बाॅस ने मुरली से कहा" आज हमारी बिटिया की, मंगनी है। तुम शाम को जल्दी ही, हमारे घर पर आ जाना और सुनो वहां तुम्हें देर होगी,इसलिए तुम अपनी मां को भी साथ लाना।"

मुरली के घर पर ,मां के अलावा कोई नहीं था,यह उसके बास जानते थे।"ठीक है सर" कहकर मुरली अपनी टेबल पर चला गया। बास की लड़की, की मंगनी (रिंग सेरेमनी) में बड़े- बड़े लोग आये थे।वहां उसे अपना प्यार, मधु भी नजर आई,वह आश्चर्यचकित हो गया और खुश भी।मधु ने बताया कि वह अपने पिताजी के साथ आयी थी।मुरली उनसे मिलने चला गया। बोला" अंकल आप लोग कब चले गये, पता भी नहीं चला किसी को। "

मधु के पिताजी ने कहा " हम लोग, अपने भाई के पास ,बनारस चले गये थे। वहां हमने मधु की शादी भी कर दी थी। कुछ दिनों बाद दामाद, प्लेन क्रेश में चल बसे।वहां मन नहीं लगा तो इसी शहर में, फिर चले आये।व्यापार अच्छा चल रहा है। कभी आओ घर पर ।"

बातचीत के दौरान मधु,गुमसुम सी, बेजान सी,खड़ी रही।कुछ ना बोली।शायद कहने को ,कुछ भी नहीं था,उसके पास। लग रहा था कि जैसे वह ,विवेक शून्य सी हो गयी है।

मुरली मधु से ,बहुत कुछ कहना चाहता था ,किन्तु कुछ भी ना कह पाया।मुरली के बास ने ,उसे कुछ काम सौंपा था।सो वह भी व्यस्त हो गया।

बहुत दीनों बाद ,एकाएक प्रातः ही दरवाजे की कालबेल बजे उठी।उठकर देखा तो ,सामने मधु खड़ी थी।उसकी आंखों पर सहसा,विश्वास नहीं हो पा रहा था।

उसने मधु को ,अंदर आने कहा।मां भी आ गयी कि,कौन सुबह आया है। मधु मां को देखकर उसके गले से, लिपट गयी। आपबीती सुनाने लगी।चाय,नाश्ते के लिए मां अंदर चली गयी।

मुरली से मधु ने कहा " शादी नहीं की,अभी तक। " मुरली "मैं तो ,आज तक तुम्हारे फोन का ही,इंतजार कर रहा हूँ। विवाह करके क्या करूंगा। तुमने तो मुझे कुछ भी, बताना उचित नहीं समझा। इतना कष्ट अकेले, झेलने पर भी मेरी,याद नहीं आयी तुम्हें। मुझे फोन ही कर सकती थी। "

मधु" मुझसे मेरे अतीत के बारे में मुरली,कुछ भी ना बोलो,ना ही पूछो।तुम्हें मेरी कसम।अगर तुमने मुझे कभी,थोड़ा भी प्यार किया था तो।"

मुरली " ठीक है, कुछ नहीं पूछूंगा। कुछ नहीं कहूँगा। परन्तु क्या मैं, जबकि तुम विधवा हो चुकी हो,तुमसे शादी कर सकता हूँ। "

मधु" समझा करो मुरली, अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रही। मैं अपने प्यार को सिर्फ प्यार, ही रहने देना चाहती हूँ। तुम हमेशा ही मेरा प्यार बने रहोगे क्योंकि प्यार लेने का नहीं, देने का है नाम। परंतु मैं शादी नहीं कर सकती तुमसे।तुम्हें अच्छी से अच्छी लड़की मिल जायेगी।योग्य भी और कुंवारी भी।बस अब कुछ नहीं बोलना है।अब मैं जा रही हूँ। आज के बाद मैं, तुम्हें कभी नहीं मिलूंगी। अपना संसार बसाओ खुश रहो।और हां, अपनी पत्नी को खूब प्यार करना,मेरे हिस्से का भी।उसकी आंखों में आंसू मत आने देना।जैसा कि तुम कभी, मेरी आंखों के आंसू, नहीं देख सकते थे। गुड बाध्य,डियर मुरली।"

मुरली समझ गया कि अब,मधु को कुछ भी कहना- सुनना उचित नहीं है। क्योंकि अगर वह कोई निर्णय लेती थी तो फिर किसी की नहीं सुनती थी।

मुरली अंतिम बार मधु को ,जाते हुए देखता रहा। उसे लगा जैसे उसके प्राण उसके शरीर से निकले जा रहें हों। एकाएक उसे समय का एहसास हुआ और वह आफिस जाने के लिए फटाफट तैयार होने लगा। मुरली ने मधु के प्यार को अपने सीने में हमेशा के लिए दफ़न कर लिया।


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